Sunday, October 31, 2010

साँस का कच्चा घड़ा, पर तूफ़ान में टूटा न था.....


था वो मंजर कुछ गुलाबी, रंग भी छूटा न था
दिल में इक तस्वीर थी और आईना टूटा न था

हादसे होते रहे कई बार मेरे दिल के साथ
आज से पहले किसी ने यूँ शहर लूटा न था

चुभ गए संगीन से वो तेरे अल्फ़ाज़ों के शर 
सब्र का प्याला मगर ऐसे तो फूटा न था

रौनकें पुरनूर थीं और गमकता था आसमाँ
झाँक कर देखा जो दिल में एक गुल-बूटा न था

मंजिलें दरिया बनीं और रास्ते डूबे 'अदा'
साँस का कच्चा घड़ा, पर तूफ़ान में टूटा न था

16 comments:

  1. मरते मरते बच गए कितने लोग इसीलिए ,
    सब गया, पर दामन-ए-उम्मीद छूटा न था...

    बहुत अच्छे, लिखते रहिये ....

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  2. बस यही दुआ है की ये कच्चा घड़ा ना टूटे .सुंदर रचना.

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  3. खूबसूरत गज़ल ....रौनकें पुरनूर थीं ....बहुत सुन्दर लगा यह शेर

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  4. वाह वाह ...बहुत खूब..सारे शेर सटीक पड़े हैं....

    मज़ा आ गया...यह रचना तो बगल वाली तस्वीर में भी दिख रही है.....

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  5. साँस का कच्चा घड़ा, पर तूफ़ान में टूटा न था
    -- सबसे दमदार पंक्ति !!

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  6. अब शिकवे भी इतने सारे :)

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  7. हर तूफ़ान झेल जाये ये घड़ा, यही कामना है। तूफ़ानों से तो नरमी की उम्मीद रख नहीं सकते।
    बहुत खूबसूरत पोस्ट।
    आभार।

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  8. गहराई लिये सागर की, जीवटता घड़े की।

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  9. हादसे होते रहे--- वाह वाह उमदा शेर हैं। बधाई।

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  10. hum to fan ho gaye hai aapke...aap to kamal hai...bahot khubsurat rachna...

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  11. दीदी,

    लो जी मैं फिर आ गया करने परेशान आपको

    "गमकता" ,"गुल-बूटा" क्या होता है ??

    मौ सम कौन जी का कमेन्ट मेरा मानिए

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  12. ‘हादसे होते रहे कई बार मेरे दिल के साथ
    आज से पहले किसी ने यूँ शहर लूटा न था’

    दिल शहर हुआ तो दिलबर शहरबदर :)

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  13. ओह सोरी सोरी दीदी

    गुल-बूटे=फूल, कलियाँ

    ये एक पिछली रचना में बताया था आपने

    गमकता भी महकने जैसा ही कुछ होता होगा

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  14. तूफ़ानों के सम्मुख भी डटे रहना, और उससे जूझने का हौसला रखना, यही तो हमारे साधारण से जीवन को भी असाधारण बना देता है. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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