दिल आज फिर भूला कि वो पराये हैं....


कितनी ही बार मैंने ख़्वाब जलाये हैं
हाल-ए-दिल पूछने वो वापस आये हैं

उन फिजाओं की रौनक अब क्या कहिये
जहाँ प्यार के नगमें अजी गुनगुनाये हैं

सदियों की थी वो दूरी हम नाप आये हैं
वहाँ नजदीकियों के भी मगर चंद साए हैं

ज़ख्म की उम्मीद में गुलों से टकरा गए
इन फूलों ने फिर मेरे हौसले बढ़ाये हैं

दिल टूटा था और बस नुमाइश लग गयी
आँखों ने फ़िर वही कहकहे लगाये हैं

नज़रें झुकीं 'अदा' की हया से भरीं हुईं
दिल आज फिर भूला कि वो पराये हैं

एक सवाल ...



माँ का फ़ोन आया.....
हेल्लो, हाँ माँ .....आज कैसे फ़ोन कर रही हो?? आज तो बुधवार है....सब ठीक तो है ...?

हाँ ....अब क्या ठीक होना है...बुढ़ापा है...कभी ठीक हैं तो कभी ना ठीक....

माँ क्या हुआ तुम ठीक तो हो ??? और बाबा कैसे हैं ?? बहुत ज्यादा चिंता रहती है तुमलोगों की ...अब ठंडा गया है अपना ध्यान रखना ...

हाँ वो भी ठीक हैं बस खाँसी अब बढ़ गयी है.... ठण्ड जो बढ़ रही है...

अच्छा वो दवा मंगवा ली जो हम लाये थे और बाबा एकदम ठीक हो गए थे ....

नहीं कहाँ मंगवा पाए हैं....

माँ हमको इसी बात से गुस्सा आता है ....हर बार तुमसे कहते हैं और तुम सुनती नहीं हो.....हम जानते थे तुम दवा नहीं मंगवाई होगी ......एक साल हो गया अभी तक तुम नहीं मंगवाई हो.....सच में माँ तुम भी ...सिर्फ जगदीश (ड्राईवर) से कहना ही तो होता है.... वो भी नही करती हो...

अरे बाबा कल जगदीश आएगा तो मंगवा लेंगे.....

खैर ये तो हम पिछले एक साल से सुनते रहे हैं..और हर बार मेरा मूड ऑफ़ हो जाता है..... जगदीश के पास भी एक फोन नहीं है.....दुनिया रखती है फोन क्यूँ नहीं रखता है....खैर अब बताओ फ़ोन कुछ बोलने के लिए की ....की ऐसे ही की हो ???

बेटा तुम चिंता मत करो कल ज़रूर मंगवा लेंगे दवा......हाँ बताना था कि तुम्हारे सचिन चाचा अब नहीं रहे ....

कौन सचिन चाचा ??

वही तुम्हारे बाबा के चचेरे भाई.....जो वकील थे....

अच्छा वो जो बहुत अंग्रेजी बोलते थे...

हाँ हाँ वही.....

अच्छा तो बहुत बुरा हुआ....क्या हुआ था...?

शायद हार्ट फेल हुआ है ...हमलोग ठीक से नहीं जानते हैं....पता नहीं शायद - साल से तो मुलाक़ात भी नहीं थी....

अच्छा...फिर कैसे पता चला कि ऐसा हुआ है.....?

गाँव से जया (मेरी चचेरी बहन) का फोन आया कि ऐसा दुःख का खबर है....सो घर में छुतका हो गया है...

घर में छुतका का माने ?

अरे अब दस दिन तक हल्दी-तेल नहीं बनेगा ....

अरे काहे....? काहे नहीं बनेगा ??? माँ तुम भी इतनी पढ़ी लिखी होकर ऐसी बात करती हो.....उनलोगों से कभी मिलना जुलना... बात ना चीत फिर आप रांची में काहे छुतका मानेंगी....?

अरे तुमको नहीं करना है सब....सलिल (भाई) करेगा..उसको भी बोल दिए हैं.....तुमसे पाहिले उसी से बात किये कनाडा में...

अरे माँ......सलिल काहे करेगा दस दिन इसका पारण बताओ तो.... तो सचिन चाचा से बार से ज्यादा मिला भी नहीं होगा... और कनाडा में इसका पारण करने का माने... तो बेवकूफी हैं ?? हम
रांची में इसका पारण बेवकूफी सोचते हैं और तुम कनाडा में करवा रही हो.....??

लोग गोतिया हैं अपना खून हैं.....तो मानना तो पड़ेगा ....और तुम काहे परेशान हो तुमको नहीं करना है....

हाँ ..जानते हैं....अगर करना भी होता तो नहीं करते...
हम फिर से कहते हैं...जीते जी तो कभी भर मुंह बात नहीं कि हो और अब छुतका मान रही हो...... बात हम नहीं समझे......चलो तुमलोगों की जैसी मर्जी....
अच्छा माँ बताओ...अगर हमको कुछ हो गया..... हम नहीं रहे तो तुम दस दिन का हल्दी-तेल बर्जोगी कि नहीं ..??

....................

माँ !!!

माँ !!!
अरे सुन रही हो की नहीं ??? हम का पूछ रहे हैं ...अगर हमको कुछ हो गया तो तुम दस दिन का तेल-हल्दी बर्जोगी कि नहीं.....कि खैईते रहोगी......बोलो ???

का बेहूदा सवाल है...ऐसे कोई बात करता है.....

माँ जवाब दो.....

हम फालतू बात का जवाब नहीं देते हैं...तुम हमेशा उल्टा-पुल्टा बात करती हो....लो
अपने बाबा से बात करो....

माँ बोलो माँ ...बताओ ना... हम सिर्फ़ जानना चाहते हैं...कुछ हो थोड़े ही रहा है...


ाँ हल्लो.....मुन्ना (मैं लड़की हूँ लेकिन
,मेरा
घर में पुकारू नाम)....
हल्लो..!!
मुन्ना....???
मुन्ना....???

हां बाबा प्रणाम....कैसे हैं.?.......
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ठीक है बाबा अब रखते हैं.....अच्छा बाबा प्रणाम....
टिन...


मैं कौन हूँ ??????

कब आओगे ..??


बात तब की है जब मैं मुंबई में थी....एक television production कंपनी में assistant प्रोडूसर के पद पर काम कर रही थी...कम्पनी का नाम S.M.Isa Production था....हमलोग Scandenavian televison के लिए दो documentaries बना रहे थे...एक थी मुंबई के मछुआरों पर और दूसरी मुंबई के फिल्म स्टार्स की अपनी जिंदगी पर...अर्थात स्टूडियो के बाहर उनकी ज़िन्दगी कैसे बीतती है....मैं मुंबई सेंट्रल के करीब ही Salvation Army के girls hostel में रहती थी...मेरा ऑफिस जुहू में था...रोज रोज मैं local trains में सफ़र करती थी.....इन दिनों सिर्फ मुंबई के मछेरों की ही शूटिंग चल रही थी...फिल्म स्टार्स की फिल्म की स्क्रिप्ट कर काम हो रहा था....दिन भर हमलोग मछेरों की बस्ती में ही घुसे रहते....कितने राज और कितनी बातों का खुलासा होता रहा बता नहीं सकती ....

ज्यादातर मछेरे सिर्फ मछेरे नहीं थे.....मछली पकड़ने के साथ साथ तस्करी भी इनके काम में शामिल था.....आपको बता नहीं सकती हर बार हम कितने हैरान हो जाते थे...इन मछेरों की झुग्गियों में आपको दुनिया का हर सामन मिल सकता है....सोना, इलेक्ट्रोनिक्स, कीमती पत्थर, चरस गांजा, यहाँ तक कि विदेशी गाड़ियाँ भी इन्ही झग्गियों के अन्दर देखा है मैंने ....कितना वैभव हैं इन झुग्गियों में इसका अंदाजा भला कोई कैसे लगा सकता है ???.....

खैर...मछुवारों की फिल्म की समाप्ति के बाद हमलोगों ने दूसरी फिल्म 'रियल स्टार' जो कि फिल्म स्टार्स के निजी जीवन पर आधारित थी...पर काम करना शुरू किया.....इसके लिए हम लोग फिल्म studios में ही जाया करते थे...जहां फिल्म स्टार्स शूटिंग किया करते थे....और क्यूंकि यह फिल्म विदेशी टेलीविजन के लिए बन रही थी इस लिए स्टार्स भी हमसे बात करने और हमें समय देने में कोई कोताही या नखरा नहीं करतेथे ...

अँधेरी में कई फिल्म स्टडियो थे और मुझे अक्सर लौटने में काफी रात हो जाया करती थी ....इसलिए मैंने सोचा ...अँधेरी में ही अगर कोई जगह मिल जाए.... रहने के लिए तो बेहतर होगा....मैंने ऐसी जगह कि तलाश शुरू कर दी.....और मुझे एक जगह मिल ही गयी...

जिया लोबो...नाम था उस गोवन महिला का..... वो अँधेरी ईस्ट में एक चाल में अकेली रहती थी...उनके घर में दो कमरे थे....एक किचन.....उसी में एक कोने में नहाने की जगह.....और टोइलेट सामूहिक बाहर था.....उनके पति साउदी में काम करते थे ...मेरे लिए यह arrangment अच्छा था ...जिया आंटी ने मेरी खाने की भी जिम्मेवारी ले ली थी .... जो कि सोने पर सुहागा था.... जेमिनी , नटराज , फिल्मिस्तान इन studios तक पहुंचना अब आसान था ...बस हम स्टार्स से appointment लेते ...वहां उनकी शूटिंग करते उनके घरों में शूटिंग करते....कहने का तात्पर्य मेरी ज़िन्दगी थोड़ी सी आसन हो गयी....जिया आंटी के जीवन में भी मेरे आ जाने से बहुत खुशियाँ आ गयी....उनके कोई बच्चा नहीं था ..इसलिए मुझे ही बेटी बना लिया था .....मुंबई के जीवन में भी धीरे-धीरे रमने लगे हालांकि आसन नहीं था.....'गणपति' जी के त्यौहार भी आया इसी दौरान .... सड़कों पर बड़े बड़े स्क्रीन लग जाते और हमलोग सड़क पर बैठकर फिल्म देखते रात को....और नाम सुनते जाते कि फलाने ने इतना पैसा दिया इस फिल्म को दिखाने के लिए... धीरे-धीरे दूसरे चाल वालों के साथ मेरी बहुत अच्छी पहचान हो गयी....और सभी मुझे बहुत प्यार भी करने लगे....

एक दिन मैं ऑफिस से आई तो घर लोगों से भरा था....अजीब सनसनी का वातावरण था ...सब दुखी से बैठे थे....और जिया आंटी....को लोग सम्हाल रहे थे वो रो रही थी....जिया आंटी की माँ भी आ गयी थीं....मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया....मैंने एक और आंटी जिनका नाम मुझे इस वक्त याद ही नहीं आ रहा ....एक नाम दे देरही हूँ ....'प्रभा' ...काफी हंसमुख औरत थी....हर वक्त हँसना और हँसाना ही उनका काम था....उनको इशारे से बुला कर पूछा....क्या हुआ है...???
उन्होंने बताया ...जिया का मरद साउदी जेल में है......मैंने पूछा क्यूँ ?? उन्होंने बोला ..अबी नै तेरे कूँ बाद में बोलती मैं....मैंने कहा ठीक है.....

शाम होने लगी अब लोग आपने-अपने घरों को जाने लगे....बस मैं...जिया आंटी, जिया आंटी की माँ और प्रभा आंटी ही रह गए.....जिया आंटी अब भी बेहाल थीं....अपनी माँ से चिपक कर बैठीं थी....कितना सच है...इंसान कितना भी बड़ा हो जाए....सुकून उसे माँ की गोद में ही मिलता है....मेरा मन अभी भी उद्विग्न था असल बात क्या है मुझे अभी तक पता नहीं चला था....और जानने की बहुत ही प्रबल इच्छा थी...मैंने प्रभा आंटी से कहा कि अब तो बताओ...उन्होंने इशारे से मुझे मेरे कमरे में चलने को कहा...और हम दोनों मेरे कमरे में आ गए...बिस्तर पर बैठ कर जो प्रभा आंटी ने मुझे बताया वो कुछ इस तरह था....

जिया आंटी के हसबैंड का नाम फर्नान्डो था...वो साउदी में किसी शेख के यहाँ ड्राईवर की नौकरी करते थे....शेख के महल में और भी भारतीय नौकर थे ..शेख के घर एक रसोईया भी था इकबाल भारत का ही रहने वाला था....वो हैदराबादी मुसलमान था...तकरीबन २५ वर्ष का इकबाल देखने में खूबसूरत और खाना बनाने में माहिर था...हर तरह का खाना बनाने में प्रवीण इकबाल की वजह से ही शेख साहब की पार्टियां कामयाब होती थी....पड़ोस में ही एक और शेख थे उनके घर में नाजनीन नाम की आया घरेलु कामों के लिए थी ....... वो भी भारत के शहर हैदराबाद की ही लड़की थी..... उसकी भी शादी नहीं हुई थी....पास -पड़ोस में होने की वजह से इकबाल और नाजनीन आपपास में कई बार टकराए....और उनके बीच प्रेम हो गया....दोनों को ही इसमें कोई समस्या भी नहीं लगी क्यूँकी ...जात एक...प्रान्त एक....मज़हब एक और दोनों एक दूसरे को पसंद तो करते ही थे....इकबाल ने अपने घर में भी बता दिया अपनी अम्मी से कि .....कोई लड़की देखने कि ज़रुरत नहीं...मैं यहाँ तुम्हारी बहू पसंद करचुका हूँ....

इकबाल ने अपने प्रेम की बात फर्नान्डो अंकल को बता दी....फर्नान्डो जी को बहुत ख़ुशी हुई और इस सम्बन्ध के लिए अपनी सहमती भी जताई....अब इकबाल और नाजनीन एक दूसरे से मिलने की जुगत में रहते.....और इसमें फर्नान्डो अंकल ने उनका साथ दिया....उन्होंने कभी-कभी अपना कमरा दोनों को देने में कोई बुराई नहीं समझी.....चोरी छुपे वो मिलने लगे.....लेकिन यह चोरी जग जाहिर हो गयी जब नाजनीन....में माँ बनने के आसार नज़र आ गए....यह साउदी में इतना बड़ा गुनाह था कि बस दोनों मासूमों पर कहर ही टूट पड़ा....
नाज़नीन और इकबाल को कैद कर लिया गया.... साथ ही फर्नान्डो अंकल भी गिरफ्तार हुए ...उनका साथ देने के कारण.....इकबाल और नाजनीन को मौत कि सजा सुना दी गई है .....फिलहाल तीनों जेल में हैं ....और यही खबर आई थी उस दिन....


उस दिन के बाद से घर का माहौल बहुत ही दुखी रहा ....कोई कुछ भी नहीं कर सकता था....सब बस हाथ पर हाथ धरे बैठ गए.....दिन बीतते गए ....हमारी फिल्म पूरी हो गयी....और मुझे वापस आजाना पड़ा....
शुरू-शुरू में मैं लगातार जिया आंटी को ख़त लिखा करती थी और जानना चाहती थी कि क्या हुआ.....लेकिन उनके पास भी बताने को कुछ था नहीं......काफी समय बीत गया...एक बार मुझे मुंबई जाना पड़ा किसी काम से .....तो मैंने सोचा जिया आंटी का हाल-चाल पूछ लूं ....और पहुँच गई....प्रभा आंटी रास्ते में ही मिल गयी और मुझे पहचान भी लिया....उन्होंने रास्ते में ही मुझे बताना शुरू कर दिया....फर्नान्डो आ गया है.....मुझे इतनी ख़ुशी हुई मैं ..चिल्लाने लगी....कहने लगीं वो...लेकिन अब ये वो फर्नान्डो नहीं है...किसी से बात ही नहीं करता है...बहुत चुप रहता है.....मैंने पुछा और इकबाल-नाज़नीन का क्या हुआ.....उन्होंने बताया.....इकबाल को तो तुरंत ही मार डाला गया था....बस हमलोगों को पता नहीं चला.......उसे ज़मीन में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया था ....और लोगों ने पत्थर मार मार कर उसको मारा था .....नाजनीन को उसके बच्चे के पैदा होने तक ...जेल में रखा गया था....बच्चे के जन्म के बाद ....उसे भी उसी तरह ज़मीन में गाड़ कर ...पत्थरों से मारा गया ....और उन दोनों का बच्चा अभी भी साउदी सरकार के पास है.....उस बच्चे कि परवरिश कि सारी जिम्मेवारी साउदी सरकार ने ले ली है.....फर्नान्डो को छोड़ दिया गया....फर्नान्डो अपने मुलुक तो वापिस आ गया है....लेकिन जिया के पास वापिस कब आयेंगा मालूम नई.....गणपति बाप्पा जिया का इंतज़ार कब ख़तम होयेंगा.....???

तो सोचिये न.....!!!


बात कनाडा की ही है....
एक दिन दरवाज़े की घंटी बजी...
दरवाज़ा खोला तो ३ white लोग, १ पुरुष और २ महिलाएं दरवाज़े पर खड़े थे....हाथों में कुछ पुस्तकें थी.. मुझे लगा कि शायद ये किताबें बेचने के लिए आये हुए हैं...तीनों ने बहुत ही शिष्टता से कहा कि हम आपको एक पुस्तक देना चाहते हैं पढने के लिए.... आप इसे पढ़िए...आपके जीवन में जरूर बदलाव आएगा...ईसा मसीह का सन्देश है इसमें और ....यह सन्देश आपके ह्रदय में घर कर जाएगा...बात टालने के लिए मैंने पूछ ही लिया....so how much should I pay for this book ?? उन्होंने ने कहा नहीं- नहीं कुछ भी नहीं बस आप पढ़िए... हम फिर आयेंगे २-३ दिन के बाद और इसे वापिस ले जायेंगे....मुझे भला क्या आपत्ति होती....किताब फ्री थी और मर्जी मेरी...पढू ना पढूं....२-३ दिन बाद दे दूंगी वापस....मैंने कहा OK ... फिर उस पुरुष ने मुझे कुछ पन्नों पर ख़ास ध्यान देने की बात कही...और दिखा भी दिया...
मैंने उनका शुक्रिया अदा किया...और किताब लेकर अन्दर चली आई.....

दूसरे दिन उस किताब को पढ़ने की कोशिश भी की....और जैसा की आप जानते हैं...मिशन स्कूल में पढ़ने की वजह से लगभग सभी प्रार्थनाएं मुझे याद हैं... ईसा मसीह और उनके अनुयायुओं की भी थोड़ी बहुत जानकारी है.....पढ़ना तो चाहा पर मेरा मन उचाट हो गया और किताब उठा कर किनारे रख दिया..... फिर मैं उस किताब को एकदम भूल ही गई....

कई दिनों बाद फिर घंटी बजी...खोलने पर वही लोग सामने खड़े थे.....मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी क्यूँकी मुझे अब बिलकुल भी याद नहीं आ रहा था... मैंने वो किताब कहाँ रख दी...उनको बाहर खड़ा करके मैंने ढूँढा ....मुझे किताब नहीं मिली...अब मुझे पसीना आने लगा...कितनी देर उन्हें बाहर खड़ा रखती...उन तीनों से कहना पड़ा कि आप लोग अन्दर आ जाइए.....तीनों को ड्राइंग रूम में बिठा कर मैं फिर किताब की तलाश करने लगी....देर फिर भी हो रही थी...इसी बीच मैं उनसे बात करती जाती....अब क्यूंकि देर हो रही थी...हम हिन्दुस्तानी चाय-पानी पूछ ही लेते हैं...ये सब उनके लिए थोडा अट-पटा था लेकिन वो भी खुश हो गए...अब मैंने बेटे को किताब ढूँढने में लगा दिया और उनको चाय बना कर पिलाने लगी....वो तीनों भी अब काफी गप्प के मूड में आ गए थे....मैं भी उनके साथ ही आकर बैठ गयी और बातें करने लगी....उनकी बातों से यही महसूस हो रहा था कि....चलो एक बकरी मिली है धर्म-परिवर्तन के लिए....पुरुष ने अपना सारा ज्ञान बघारना शुरू कर दिया....बात के दौरान उसने अपना नाम मार्क बताया...अब उससे जो बात हुई है वो सुनिए...

उसने मुझसे पुछा कि मैं किस धर्म को मानती हूँ ???....मैंने कहा हिन्दू.....उसका कहना था....संसार में हर व्यक्ति के मुक्ति का एक ही रास्ता है ....बप्तिस्मा.....बिना बप्तिस्मा के आपको मुक्ति नहीं मिल सकती है...भगवान् आपको तभी मुक्ति देंगे जब आप बप्तिस्मा ग्रहण करेंगे.....

उसने मुझे ये भी कहा कि ....आपको उस दिन के बारे में भी सोचना चाहिए जिस दिन क़यामत आएगी और सबको हाज़िर होना होगा उस परम-पिता परमेश्वार के सामने अपने पापों का लेखा जोखा देना होगा....और उस दिन जिसने भी बप्तिस्मा लिया हुआ होगा ...उसे बिना शर्त....स्वर्ग में प्रवेश दिया जाएगा.....मेरा दीमाग बहुत तेजी से काम करने लगा....मुझे लगा इससे बेहतर और क्या हो सकता है...न हींग लगे न फिटकरी और रंग भी आये चोखा.....यह भी बताया उसने कि .....कितने भी घोर पाप आप करें बस... उसे चर्च में पादरी के सामने स्वीकार करने की आवाश्यकता है और ... आपका पाप क्षमा कर दिया जाएगा....छोटे-मोटे पाप तो माफ़ किये ही जाते हैं.....वो पाप भी माफ़ किये जाते हैं...जिनसे आपकी आत्मा तक मर जाती है....अब मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा था....और अब मैंने उसे.. उसकी एक-एक बात में फीचने का निर्णय ले लिया....और फीचाई शुरू कर दी...

मैंने पूछा मार्क .... बप्तिस्मा कि आवाश्यकता क्यूँ है ???
उसका जवाब था....क्यूंकि जब बच्चा पैदा होता है तो वो पाप के साथ पैदा होता है...मुझे लगा किसी ने एक घूँसा मारा हो मुझे.....इससे घटिया बात और क्या हो सकती है...एक नवजात बच्चा जो अभी अभी दुनिया में आँख खोल रहा है वो पापी है !!!!! ऐसा कैसे भला ????......Mark ! How the hell this is possible ???? उसने कहा क्यूंकि....आदम और हौवा ने वर्जित फल खाया था....इसलिए.......मतलब कि 'खेत खाए गधा और मार खाए जोलहा'.....मेरी हंसी निकल गयी.....मैंने कहा इससे वाहियात बात मैंने आज तक नहीं सुनी.......वो सकपका गया......उसके सकपकाने से मेरा हौसला बढा....मैंने कहा मिस्टर मार्क....भगवान् और इंसान का रिश्ता पिता और पुत्र का होता है.....और इस तरह के प्रेम में किसी सी प्रकार की शर्त, if then else नहीं होती....इसलिए अगर आपका भगवान् यह कहता है कि 'अगर' तुम बप्तिस्मा (जो कि एक गिलास पानी और दो चमच तेल से किया जाता है ) नहीं लोगे तो तुम मेरे प्यार के काबिल नहीं हो तो ऐसा भगवान् मुझे चाहिए ही नहीं....

फिर मैंने उससे पूछा मार्क....ईसा मसीह ने बप्तिस्मा कब लिया था....??? क्यूंकि मुझे मालूम था...ईसा ने ३० वर्ष कि उम्र में अपने चचेरे भाई जोन से बप्तिस्मा लिया था.....मार्क ने भी यही बताया....मैंने पुछा तो क्या उस बप्तिस्मा से पहले ईसा मसीह सही इंसान या भगवान् के बेटे नहीं थे....वह बगलें झाँकने लगा.....उसके साथ आई स्त्रियों को भी अब पसीना आने लगा था ...

लेकिन मैं उसे कहाँ छोड़ने वाली थी ...मार्क अब बात करते हैं...पाप स्वीकार और स्वर्ग के अन्दर प्रवेश की...जब सब कुछ इतना आसान है तो फिर किसी भी देश में ...या दूसरे देश को मारो गोली कनाडा में इस जस्टिस सिस्टम की क्या ज़रुरत है....और इन जेलों की भी....कनाडा के जेल अटें पड़े हैं अपराधियों से ...इस हिसाब से जितने भी ईसाई अपराधी इतने सारे जेलों में भरे पड़े हैं....उनको सजा देने का कोई तुक भी नहीं बनता क्यूंकि उनको स्वर्ग तो जाना ही है....सजा देने की जगह सबसे 'पाप स्वीकार' करवा लिया जाए और छोड़ दिया जाए ...बेकार में हम टैक्स पेयर्स के इतने पैसे बर्बाद हो रहे हैं...इन क्रिमिनल्स को जेल में रखने में....मैं तो कल ही लिखती हूँ हमारे प्राइम मिनिटर को और चाहती हूँ की आप सब और आपका मिशन भी इसमें हस्ताक्षर करे....अब तो वो बैठना ही नहीं चाहता था....तीनो के चहरे का रंग अजीब सा होने लगा था...मुझे अपनी विजय बहुत करीब नज़र आ रही थी लेकिन अभी मेरा लास्ट बाल बाकी था.....

मिस्टर मार्क...अपने मुझसे ये भी कहा कि.... मुझे उस दिन के बारे में भी सोचना चाहिए जिस दिन क़यामत आएगी.....सबका न्याय होगा.....और क्यूंकि न तो मैं ईसाई हूँ ना ही बप्तिस्मा किया है ....न ही चर्च जाती हूँ और ना ही अपने पापों को स्वीकार किया है ...तो मेरा तो स्वर्ग में प्रवेश का सवाल ही नहीं उठता है.....अब मुझे ये बताइए.....ईसा मसीह को ही जन्मे...२००० साल हो गए ....इस पृथ्वी को ही आस्तित्व में आये हुए ना जाने कितने लाख वर्ष हुए हैं....'क्या अभी तक कयामत का दिन आया नहीं है???' अगर नहीं तो कब आएगा ???? और अगर आ भी गया तो मेरा नंबर कब आएगा हिसाब-किताब में ...मुझे लगता है वो तो बहुत बाद में आएगा ना .....मुझसे पहले तो ना जाने कौन-कौन और कितने हैं.....तो क्या उसकी फ़िक्र अभी से करना उचित है.....??? अब मार्क बैठने की स्थिति में ही नहीं था.....तीनों ही उठने लगे और मैंने रोकने की कोई चेष्टा नहीं की .....वो सिर्फ इतना ही बोल पाया ...मैंने कभी ऐसे सोचा नहीं.....और तब मैंने कहा .....तो सोचिये न.....!!!

हम हिन्दुस्तानी...!!!


आज ६ दिसम्बर है.....हर जगह ब्लॉग पर बड़ी सरगर्मी सी नज़र आरही है...कोई इसे 'काला दिवास' कहता है कोई 'शौर्य दिवस' ...अपना-अपना नजरिया है...
मेरे लिए भी इस दिवस की अपार महत्ता है...मेरे लिए ये 'शौर्य दिवस' है और मेरे 'उनके' लिए 'काला दिवस'....हमारी शादी जो हुई थी.....!!:):)

खैर....इस तरह की बातें सिर्फ इस लिए उठ रहीं हैं ...क्यूंकि आज के दिन एक विवादित 'ढांचा' गिराया गया था.....उसको गिराने के पीछे एक ही मंशा रही होगी न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी......
लेकिन हम भारतीय बाल की खाल निकालने में माहिर हैं और इसी बात पर आज कई पोस्ट का अम्बार लग गया और ना जाने कितने पोस्ट पढ़ गए हैं इसी घटना पर....पढने के बाद मन में कुछ ख्याल आया और जैसा कि आप जानते हैं...आज हम भी बीजी होंगे...ज्यादा कुछ कह नहीं पायेगे...तो सोचा जहाँ 'मुर्दे पर नौ मन उहाँ दस मन' का फर्क पड़ता हैं ...एक छोटी सी पोस्ट लिखही देते हैं....कल हाज़िर होंगे अपने कुछ और संस्मरण के साथ.....
हाँ तो हम कह रहे थे कि उन पोस्ट्स को पढ़ कर मन में कुछ विचार आये ...कि आखिर हम भारतीय औरों से अलग क्यूँ है.....और विश्वास कीजिये हम बहुत अलग हैं.....इसके लिए भी मेरे पास संस्मरण है....जो आपसे हम ज़रूर बाटेंगे.....हाँ तो हम कैसे अलग हैं आखिर वो क्या बात है...??? तो कुछ गुणों का ख्याल आया मेरे मन में सोचा आपसे भी कह दें....आपलोग फ्री हैं मुझसे इत्तेफाक नहीं रखने के लिए....
मेरे हिसाब से हमलोगों में कुछ विशिष्ठ गुण हैं जो हमें औरों से बिलकुल अलग करता है.....और ये कुछ गुण (सभी नहीं) निम्नलिखित हैं.... :

१. हम भूतकाल में जीना पसंद करते हैं.....अकसर आप सुनेंगे ...अरे हमारे दादा जी की कोठी इतनी बड़ी थी और उसमें वो इतना बड़ा बांस रखते थे...की जब भी बारिश नहीं होती...बादलों को डंडे से हिला देते और बारिश हो जाती....बेशक आज उनके घर के नलके की टोंटी ही काम न करती हो...

२. हम दुश्मनी को हमेशा पाल कर रखते हैं....उसकी पूरी देख भाल करते हैं....दोस्ती रहे कि न रहे ..दुश्मनी को हमेशा ही तंदरुस्त रहना चाहिए....अपने जीवन का अधिकाँश हिस्सा दुश्मनी को याद करने और उसको अच्छी तरह निभाने में बिताते हैं......

३. हम हमेशा अपनी जड़ काटने में विश्वास रखते हैं....आपने 'कालिदास' के कवि के बारे में पढ़ा ही होगा....की वो जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे.....लेकिन 'कालिदास' बाद में बेवकूफ हो गए और 'मेघदूत' लिख गए...परन्तु हमारे यहाँ अधिकाँश अपनी होशियारी ता-उम्र बचा कर रखने में विश्वास करते हैं....लिहाज़ा अपनी जड़ खोदते ही रहते हैं....हम दूसरों की जड़ काटने में भी विश्वास रखते हैं....और आरी हमेशा तैयार रखते हैं...ताज़ा-तरीन उदहारण हैं 'सलीम मियां और एक और साहब हैं मुझे नाम याद नहीं क्यूंकि....फालतू की बातों में समय नष्ट करने से क्या फायदा...

४. हमलोग बात की तह तक जाने की ज़रुरत ही नहीं समझते हैं.....क्यूँ ?? क्यूंकि उसमें टाइम ख़राब होगा ....हमें तो बस फटा-फट अपनी बात कहनी है....नहीं तो कोई और कह देगा.....फिर चाहे उसका मतलब ही क्यूँ न बदल जाए.....
जहाँ जरूरत है कहने की......'रोको, मत जाने दो ...' तो हमें तो बस बात कहनी है इस लिए हम .....'रोको मत, जाने दो' ...कह कर खुश हो जाते हैं.....क्या फर्क है भला.....बात तो एक ही है...

५. हम कभी भी किसी को भी दांव पर लगा सकते हैं...फिर चाहे वो देश हो या धर्म....की फर्क पैंदा है....अब देखिये कसब अभी तक न सिर्फ जिंदा है....हम से आपसे ज्यादा ऐश कर रहा है...

६. हम कभी भी चुप-चाप नहीं बैठ सकते.....'कुछ न कुछ किया कर काम न मिले तो पायजामा फाड़ कर सिया कर' इसे हम सभी पूरी तरह अमल में लाते हैं....और कुछ नहीं तो.....बिन मांगे अपनी सलाह ही दे देते हैं...

७. हम सभी और किसी बात में सक्रीय हों की न हों राजनीति में बहुत सक्रीय हैं......चाहे वो घर की राजनीति हो, गाँव की , शहर की या फिर देश की.....हम सभी सक्रियता से उसमें हिस्सा लेते हैं.....एक minut में किसी भी पार्टी किसी भी नेता को, किसी भी अभिनेता , खिलाड़ी को आसमान में बिठा देते हैं और एक मिनट मेंउसको उसकी जगह दिखा देते हैं.....मंदिर तक बना दिए हमने कितनो के....देवी जय ललिता...???? और न जाने कौन कौन....हम अपने दिमागी दीवालियेपन के लिए कोई भी सीमा निर्धारण में यकीन ही नहीं रखते हैं.....वो असीमित हो सकती है....

८. हमारा देश एक विशाल देश है....बचपन से सुनते आये हैं.....भारत 'अनेकता में एकता का देश है'....बस अब बात ज़रा सी ही बदली है....भारत 'अनेकता में अनेकता' का देश है....अब जब सब डफली बजाने में माहिर हैं....तो सबबजाते हैं....अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग...

९. हम हमेशा इस बात से परेशान हो जाते हैं.....उसकी साडी मेरी साडी से सफ़ेद कैसे??' फिर उस सफेदी के लिए हम 'साम दाम दंड भेद' कुछ भी अपना सकते हैं...

१०. वाद-विवाद हमारा पसंदीदा टाइम पास है .....फिर चाहे वो घर पर हो, दफ्तर में हो, सड़क पर हो....

११. हम बेईमानी भी बहुत इमानदारी से करते हाँ...जैसे बिजली का मीटर स्लो करना हो तो टाइम से करते हैं....कोई कोताही नहीं...

ये कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण गुण है ...और भी हैं .....फिलहाल ये हैं .....जिनसे हम सभी विभूषित हैं....और हमारे
इसी गुण के कारण...हम कहीं के नहीं हैं... फिर भी .....गर्दन ऊँची ही है.....पूरा समाज गताल खता में चला जा रहा है...तो मेरी बला से कह कर कंधे उचकाने में यकीन रखते हैं.....
आज मैंने भी एक सच्चे भारतीय का फ़र्ज़ निभाते हुए ये पोस्ट लिख दी है....पढ़ लीजिये तो ठीक नहीं तो....कोई और पढ़ लेगा..:):)

ख़ौफ के साए रेंग रहे वो प्यार का मंजर कैद में है...


जो टूटा कल औ बिखर गया वो आज समंदर कैद में है
खौफ के साए रेंग रहे वो प्यार का मंजर कैद में है

यूँ हीं तूने मुझे जाँ कहा और यूँ हीं कहा मुझे जानाँ
यूँ हीं लफ्ज़ अब डूब गए और रूहे-सुखनवर कैद में है

सड़कें कितनी खाली हैं और बाहर कितना सन्नाटा
अरमानों और ख़्वाबों के कई लाव-लश्कर कैद में हैं

फ़िक्र कहाँ किसी की मुझे कोई रंज भी अब नहीं तारी
फूल सा दिल पत्थर हुआ पत्थर का ज़िगर कैद में है

वो रौनक वाले दिन थे 'अदा' और आज अजीब आलम है
बस उम्र से खुशियाँ रूठ गईं अब मस्त कलंदर कैद में है

रूहे-सुखनवर=कवि की आत्मा

अब सुनिए यह गीत :

'प्रथम रश्मि का आना' स्वर स्वप्न मंजूषा 'अदा' , संगीत संतोष शैल.....


पंत की कविता 'प्रथम रश्मि'

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने यह गाना?

सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में,
पंखों के सुख में छिपकर,
ऊंघ रहे थे, घूम द्वार पर,
प्रहरी-से जुगनू नाना।

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।

स्नेह-हीन तारों के दीपक,
श्वास-शून्य थे तरु के पात,
विचर रहे थे स्वप्न अवनि में
तम ने था मंडप ताना।

कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनि!
बतलाया उसका आना!

छिपा रही थी मुख शशिबाला,
निशि के श्रम से हो श्री-हीन
कमल क्रोड़ में बंदी था अलि
कोक शोक में दीवाना।

प्रथम रश्मि का आना रंगिणि
तूने कैसे पहचाना?
कहाँ-कहाँ हे बाल विहंगिनी
पाया तूने यह गाना?


पर उपदेश कुशल बहुतेरे ...!!



मेरी अधिकतर पढाई कैथोलिक मिशन स्कूल और कालेज में हुई है.....और ज्यादातर मैं हॉस्टल में ही रही हूँ....
जाहिर सी बात है ...इस कारण से कैथोलिक मिशन के फादर, सिस्टर मदर्स के भी बहुत करीब रही हूँ.....जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा उन्ही के संसर्ग में बिताया है....

हॉस्टल में रहने के कारण इस धर्म समाज को बहुत करीब से देखने और समझने का मौका मिला ...वर्ना सिस्टर्स, फादर्स एक रहस्य ही बने रहते थे.....हमलोग उनके आवास में भी चले जाते थे और कभी कभी सिस्टर्स को बिना टोपी या वेल के देख कर हैरान हो जाते थे....उनके सर के बाल देखने की हमेशा इच्छा होती थी......और अगर किसी सिस्टर को हाबिट (उनका ड्रेस) के अलावा किस और ड्रेस में देख लेते तो बस वो दिन हमारे लिए संसार का आठवां आश्चर्य देखने के बराबर होता था..... हाबिट सफ़ेद रंग का लम्बा चोगा सा होता है...और कपड़ा बहुत कीमती हुआ करता था...सारे कपड़े विदेश से आते थे....कमर में उसी कपड़े की बेल्ट...साथ में रोजरी (माला) टंगी होती थी....सर पर लम्बे वेल होते थे जो टोपीनुमा थे लेकिन पीछे काफी नीचे पीठ पर हुआ करते थे....उनके गले में किसी चेन में या धागे में एक cross हुआ करता था...सारे कपडे झक्क सफ़ेद होते थे...और हों भी क्यूँ नहीं कपडे धोने के लिए फिर कई आया जो होती थीं ...

अक्सर हम उनके मेस या किचेन में भी चले जाया करते थे.....वहां उनकी समृद्धि देखते बनती थी...बड़े-बड़े बोल में मक्खन (उतने मक्खन मैंने आज तक नहीं देखे फिर कभी )जैम, जेली, ताजे फल, चिक्केन, मटन अंडा, सब्जियां, canned फ़ूड जो विदेशों से आते थे...बड़े-बड़े फ्रिज में खाना ठसा-ठस भरा रहता था....... किचेन से हमेशा ही फ्रेश ब्रेड बनने की खुशबू आती रहती थी....और हर वक्त ३-४ आया खाना पकाने में लगी रहती थी....wine की बोतल भी मैंने पहली बार उन्ही के किचेन में देखा था...रेड wine , वाईट wine...

उनके कमरों की छटा भी देखने लायक होती थी करीने से सजा बेडरूम....बेड पर साफ़ बेड-शीट ..टेबल कुर्सी, करीने से सजी हर चीज़....बहुत साफ़ सुथरा सब कुछ....उनके कमरों की सफाई के लिए भी लोग थे...बाथ- रूम इतना साफ़ की आप वहाँ सो सकते थे....साफ़ धुले तौलिये टंगे होते थे.....

अब बताते हैं बात उनके प्रार्थना वाले कमरे की बात....बहुत ही सुन्दर...और व्यवस्थित.....कभी- कभी retreat यानि मौन व्रत भी करती थी...तो retreat करने का स्थान भी भव्य था...

लेकिन ये तो सभी सन्यासिनियाँ हैं...इन्होने दुनिया का त्याग किया हुआ है और ईश्वर को अपनाया है ..तो फिर क्या दुनिया का त्याग इसे कहते हैं....सबसे अच्छा खाना...सबसे अच्छा पहनना ...सारी सुविधाओं से लैस रहना क्या संन्यास है.....??? क्या इतनी सुख सुविधा में रह कर ईश्वर मिल जाते हैं..?? लेकिन बात कुछ समझ में नहीं आती थी.....इसी उन्हां-पोंह में..जीवन बीतता गया....और मेरे सारे सवाल वहीँ खड़े रहे.....

पिछले साल मुझे रांची जाना पड़ा....अपने कालेज 'संत जेविएर्स, रांची' चली गयी ....यूँ ही देखने.....काफी कुछ बदला हुआ नज़र आया....बिल्डिंग और ज्यादा भव्य और विद्यार्थी और ज्यादा उदंड ...खैर ....मुझे याद आया कि हमारे एक प्रोफेसर ने अवकाश प्राप्ति के बाद यहीं कहीं पास में अपना एक बिज़नस शुरू किया था होल सेल का ...मैंने पता किया 'प्रोफेसर राजगढ़िया' का और बहुत जल्द ही उनका पता मिल गया....बस क्या था पहुँच गयी उनकी संस्था में.....दस सेकंड में ही उन्होंने मुझे पहचान लिया....और बस इतनी आत्मीयता से मिले कि क्या बताऊँ....हम लोग बैठ कर बातें करने लगे .....इतने में ही 'फादर लकड़ा' ...जिन्हें मैं तो नहीं जानती थी.... वो आ गए 'राजगढ़िया सर मिलने ...सर ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका भी स्वागत किया.....मेरा भी परिचय दिया गया उन्हें और फिर बातें आगे बढ़ने लगी....फादर लकड़ा....जिन्हें अगर मैं बाहर कहीं देखती तो किसी कालेज का स्टुडेंट ही समझती.....उनका पहनावा बहुत मोडर्न...अपनी हीरो होंडा में आये थे...... लगातार सिगरेट पी रहे थे.....उनकी सिगरेट आम सिगरेट नहीं थी....भूरे रंग की..पतली लम्बी सिगरेट थी.....मैंने यूँ ही पूछ लिया ...फादर ये तो काफी कीमती सिगरेट लगती है ...कहने लगे हाँ...वेरा क्रूज़ है ...अब हम क्या जाने वेरा क्रूज़ क्या है ...खैर मैंने कहा कि ये आप कितनी पीते हैं.....?? २ पैकेट प्रतिदिन.....मैंने कहा ये तो बहुत महंगा पड़ता होगा आपको......कहने लगे मुझे नहीं ....मुझे तो हर दिन ये मेरे मिशन वालों को देना ही है.....ये मेरी ज़रुरत है और मुझे मिलना ही है...मैं आसमान से गिर गयी ...मैंने कहा ये सिगरेट आपको आपका चर्च देता हैं...उन्होंने कहा हाँ......मुझे ही नहीं जिन्हें भी जो-जो आदत है सबकी पूर्ती करते हैं ......हैरानी हुई सुन कर कि व्यसनों की भी आपूर्ति होती है संन्यास में....ख़ास करके जो सुसंगठित, सुसंचालित धार्मिक-संस्था है....और जहां बाकायदा धर्म-गुरु बनने की न जाने कितनी सीढ़ियों, पायदानों से होकर जाना पड़ता हैं.... जहाँ तक पहुँचने के लिए विवाह करना वर्जित है और ३ शपथ लेनी पड़ती हैं....गरीबी, पवित्रता और आज्ञापालन (Live a life of poverty, chastity and obedience ) ....फादर लकड़ा से और भी आगे बातें होती रहीं....उनकी बातों से एक पल को भी किसी साधू की विनम्रता नहीं झलकी.....सभी बातें 'अहम्' को ही तुष्ट करतीं लगीं ...... उनकी गरीबी में शुमार था फिल्मों का शौक.......उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह वो फर्स्ट डे फर्स्ट शो फिल्म देखने जाते हैं......यहाँ तक कि नायिकाओं के नृत्य पर भी उनकी टिपण्णी बहुत सटीक थी.....सुनकर ही लग रहा था कि वो काफी ध्यान से देखते हैं....

अब तक मेरा भेजा फिर चुका था...मैंने फादर लकड़ा को आड़े हाथों लिया....पूछ ही दिया उनसे कि भगवान् कि भक्ति में आप कितना समय लगाते हैं...कहने लगे दिन भर में ५-६ घंटे मैं ईश्वर की आराधना में ही लगाता हूँ...अब उन्होंने मुझ पर प्रश्न दाग दिया....आप कितने घंटे लगाती हैं ??? मैंने कहा मुश्किल से ५ से १० minutes पूरे दिन में.....कहने लगे ये तो बहुत कम है.....इससे मुक्ति कहाँ मिलेगी.....मैंने कहा पादरी साहब (अब फादर बोलने का मेरा कोई इरादा नहीं था ) हम जैसे लोग जो दो जून की रोटी जुटा कर ....अपने बच्चों को पाल कर ...अपनी जिम्मेवारियों को पूरी तरह से निभाने के बाद अगर दो minute के लिए भी अपने भगवान् को याद कर लेते हैं तो ...स्वर्ग के द्वार हम जैसों के लिए ही पहले खुलेंगे ...आपके लिए नहीं....आपका क्या है ...विवाह आपने किया नहीं .....बच्चे आपके है नहीं.....आपको तो सब कुछ पका-पकाया मिलता है..कपडे धुले हुए, प्रेस किये हुए मिलते हैं, हर सुबह सिगरेट की डब्बी आपके कमरे में आपके उठने से पहले पहुंच जाती है....आपके पहुँचने से पहले आपका कमरा सजा होता है....न बिजली का बिल देने की चिंता न बच्चों की फीस....मतलब ये कि आप एक तिनका इधर से उधर नहीं करते हैं...नून-तेल लकड़ी का इंतज़ाम करना किस चिड़िया का नाम है आप नहीं जानते....आप क्या जाने परिवार क्या है ....?? उसकी समस्याएं क्या हैं....?? जूझते तो हम जैसे लोग ही हैं ....और श्रृष्टि भी हम ही चला रहे हैं आप नही.....इसलिए मुझे पूरा विश्वास है ईश्वर के ज्यादा करीब हम ही हैं आप नहीं....अब उन्हें कोई जवाब देते नहीं बना....वो अपना सा मुंह लेकर चले गए...

आज कल यहाँ भी कुछ ऐसा ही देखकर ....मुझे इस घटना की याद आई......कई बार पढ़ती हूँ....नारी का उत्थान, नारी जागृति, तो मन सोचता है....नारी क्या सिर्फ 'नारी' है.....वो एक बेटी, पत्नी और माँ भी है....बेटी के रूप में समस्याए अलग होंगी, बेटी की समस्या सभी नारियां समझ सकती हैं....क्योंकि और कुछ हों न हों बेटी तो हैं ही....पत्नी कि समस्या वही समझ सकती हैं जो विवाहिता हों और माँ की समस्या भी वही समझेगी जो माँ हो....कोई कितना भी कहे कि 'नारीगत' समस्या हर नारी समझ सकती है तो वो बिलकुल गलत है...जिस नारी ने कभी विवाह नहीं किया वो वैवाहिक समस्याओं को कैसे समझेगी और जो कभी माँ नहीं बनी वो मातृत्व की पीड़ा और समस्या कैसे समझेगी...कदापि नहीं समझेगी.ठीक वैसे ही जैसे किसी फादर, किसी सिस्टर किसी सन्यासी को क्या मालूम गृहस्थ जीवन कितना जटिल है, उसकी समस्याएं कितनी गहन हैं.....परिवार के एक सदस्य का एक निर्णय कितने जीवनों को दांव पर लगा देता हैं, किताबी ज्ञान से जीवन नहीं चलते....प्रसव की पीड़ा को पढ़ कर नहीं महसूस किया जा सकता.....और बच्चों के साथ जागी गयी कितनी ही लम्बी रातों को बोल कर नहीं बताया जा सकता .....उसको महसूस करना पड़ता है...

उपदेश देना बहुत ही आसन है....लेकिन काम करना उतना ही कठिन ...!!

हम हक़ीक़त के हाथों यूँ मरते रहे बढ़ के पेड़ों से बेलें हटाते रहे



ज़िन्दगी के लिए कुछ नए रास्ते हम बनाते रहे फिर मिटाते रहे
थी वहीँ वो खड़ी इक हंसीं ज़िन्दगी हम उससे मगर दूर जाते रहे

रात रोई थी मिल के गले चाँद से और अँधेरे अँधेरा बढ़ाते रहे
आँखें बुझने लगीं हैं चकोरी की अब दूर तारे खड़े मुस्कुराते रहे

बिखरे-बिखरे थे मेरे वो सब फासले हम करीने से उनको सजाते रहे
अब समेटेंगे हम अपनी नजदीकियां दूरियों को गले से लगाते रहे

वो पेड़ों के झुरमुट से अहसास थे और ख्वाबों की बेलें लिपटती रहीं
हम हक़ीक़त के हाथों यूँ मरते रहे बढ़ के पेड़ों से बेलें हटाते रहे

वो तो भूखा मरा मंदिर के द्वार पर लोग प्रतिमा को लड्डू चढ़ाते रहे
इक कली जिस गली में बलि चढ़ गयी वहीँ देवी का मंडप सजाते रहे

पर दिल के पत्थर पर आकर कई याद के खंज़र टूटे हैं


टूटे हैं जो रिश्ते आज वो लगते हैं बस झूठे हैं
प्रीत डगर के काँटों से मेरे पाँव के छाले फूटे हैं

शिकवों का दस्तूर नहीं ना है गिलों का ही रिवाज
नेह की वो सारी कोंपल बस कागज़ के गुल-बूटे हैं

कई रतजगे कट गए हर ख़्वाब को तब ही पाला है
पल भर को जो आँख लगी कोई ख़्वाब का लश्कर लूटे है

सोचा तो था बस तेरे नाम के सारे निशाँ मिटा देंगे
पर दिल के पत्थर पर आकर तेरी याद के खंज़र टूटे हैं

झीनी सी ख़ामोशी 'अदा' वो पाँव से लिपटी तन्हाई
मुझे गुमसुम से कुछ राह मिले पर जाने क्यूँ वो रूठे हैं



अरुण यह मधुमय देश

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

- जयशंकर प्रसाद

शायद ..आप में से कुछ ने इस गीत को पहले भी सुना हो....मुझे नया गीत रिकॉर्ड करने का समय नहीं मिला...सोचा श्री जयशंकर प्रसाद जी की अमर कृति को भी सुन लीजिये...इस गीत को हिंद-युग्म द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था....

आवाज़ : स्वप्न मंजूषा 'अदा'
संगीत : श्री संतोष शैल



अब कौन भला इनको सुलझाएगा ?


वो आईना हूँ मैं, तेरे घर का

उसमें सबका चेहरा, नज़र आयेगा,

कभी ठोकर ना लगाना भूल कर भी

नहीं तो सारा वजूद, बिखर जायेगा,

और अब टहनी पर चाँद खिलाना छोड़ दे

ये भांडा भी ,इक दिन फूट जायेगा

मत खेल अपनी साँसों से, इस तरह

कहीं दम निकल जाये, तो बहुत पछतायेगा,

और छुपे छुपे से हों, जब अक्स सारे

पूरा चेहरा भला कैसे नज़र आयेगा ?

जब गांठों के ढेर बन गए हों रिश्ते

अब कौन भला इनको सुलझाएगा ?