Wednesday, April 3, 2013

तेरे लिए रिदा हूँ मैं, और तेरी ही 'अदा' हूँ....

ए रश्मि थैंक्स :)


मेजबाँ हूँ मैं कभी, और कभी मेहमाँ हूँ 
क़ैद हूँ इस जिस्म में, मगर तेरी जाँ हूँ

वफायें मेरी उम्र भर, न छोड़ेंगी पीछा तेरा 
ज़ुबाँगर हूँ मैं कभी, और कभी बे-ज़ुबाँ हूँ

ख़बर तुझे नहीं मेरी, हस्ती की कोई  
आग सी तपिश लिए, तेरे लिए धुवाँ हूँ 

ढूँढते हो बस मुझे, तुम दिल के आस-पास 
तुम्हें अभी खबर कहाँ, मैं कहाँ-कहाँ हूँ 

लिपट तेरे पहलू से, अब सोना चाहती हूँ  
तुझे लापता करे जो, मैं ही वो तूफाँ हूँ 

तेरी-मेरी ज़िन्दगी, हो गई अब मुकम्मल   
तेरे लिए रिदा हूँ मैं, और तेरी ही 'अदा' हूँ

फारसी में :

रिदा= खुशी
(ये कविता मेरे 'उनके' लिए है। दूर बैठे-बैठे बहुते सठियाने लगे हैं, ऊ पढेंगे तो दिमाग ठिकाने पर रहेगा ...हाँ नहीं तो ! :)) 

31 comments:

  1. ढूँढते हो बस मुझे, तुम दिल के आस-पास
    तुम्हें अभी खबर कहाँ, मैं कहाँ-कहाँ हूँ
    वाह... लाजवाब...आभार

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    1. संध्या जी,
      शुक्रिया, करम, मेहेरबानी :)

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  2. लाजवाब अदा
    सुनती हूँ सदा
    हो गई फिदा
    जो देखी रिदा

    सादर

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    1. तू सुनती है सदा
      मैं भी हुई फ़िदा
      मिली आज रिदा
      लाज़वाब हुई 'अदा'
      :)

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  3. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 06/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. बोले तो ..थैंक्यू है जी थैंक्यू !
      :)

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  4. सुन्दर प्रेमाभिव्यक्ति

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    1. अब का कहें दी, कभी-कभी ये काम भी करना ही पड़ता है :)

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  5. रचना में जीवन कीं सुंदर सार्थक अनुभूति प्रस्तुति की है---अद्भुत
    बहुत बहुत बधाई

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  6. आये-हाय मजा आ गया ... बहुत लाजवाब

    आज का ब्लॉग पढ़ना सार्थक हो गया

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    1. वाह !
      ये तो बड़ी अच्छी बात है !

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  7. आज की ब्लॉग बुलेटिन इंडिया बनाम भारत.. ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. क़ैद हूँ इस जिस्म में, मगर तेरी जाँ हूँ...लाज़वाब गजल

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    1. आपको पसंद आया , शुक्रिया !

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  9. ढूंड रही हो तिस्नगी, आवारा अब्रो-आब में..,
    तुम मेरी मंजिल नहीं हो मैं एक गर्दे-कारवां हूँ.....

    गर्द=भटकता हुवा

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    1. वाह !
      क्या बात है ..माशाल्लाह !

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  10. सुन्‍दर गजल।

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  11. ओहो !! इतनी सुन्दर सी ग़ज़ल पढने में इतनी देर कर दी...:(

    बिलकुल दिल के ज़ज्बात ने होठों पर आ कर ग़ज़ल की शक्ल अख्तियार कर ली है....सुभानल्लाह !!!

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    1. हाँ हाँ काहे नहीं, चढ़ा लो हमको धनिया के पेड़ पर ..:):)
      हाँ नहीं तो !

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  12. बस एक रिंद की कमी रह गयी वह मैं पूरी किये देता हूँ :-)
    बेहतरीन!

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  13. बेहतरीन


    सादर

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  14. रिदा नाम सुना था, आज आपकी रचना से अर्थ जाना।

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