Sunday, April 28, 2013

कोई आज बता ही देवे हमको ....कहाँ है हमरा घर ??????


लड़की !
यही तो नाम है हमरा....
पूरे १९ बरस तक माँ-पिता जी के साथ रहे...सबसे ज्यादा काम, सहायता, दुःख-सुख में भागी हमहीं रहे, कोई भी झंझट पहिले हमसे टकराता था, फिर हमरे माँ-बाउजी से...भाई लोग तो सब आराम फरमाते होते थे.....बाबू जी सुबह से चीत्कार करते रहते थे, उठ जाओ, उठ जाओ...कहाँ उठता था कोई....लेकिन हम बाबूजी के उठने से पहिले उठ जाते थे...आंगन बुहारना ..पानी भरना....माँ का पूजा का बर्तन मलना...मंदिर साफ़ करना....माँ-बाबूजी के नहाने का इन्तेजाम करना...नाश्ता बनाना ...सबको खिलाना.....पहलवान भाइयों के लिए सोयाबीन का दूध निकालना...कपड़ा धोना..पसारना..खाना बनाना ..खिलाना ...फिर कॉलेज जाना....
और कोई कुछ तो बोल जावे हमरे माँ-बाबूजी या भाई लोग को.आइसे भिड जाते कि लोग त्राहि-त्राहि करे लगते.....
हरदम बस एक ही ख्याल रहे मन में कि माँ-बाबूजी खुश रहें...उनकी एक हांक पर हम हाज़िर हो जाते ....हमरे भगवान् हैं दुनो ...

फिर हमरी शादी हुई....शादी में सब कुछ सबसे कम दाम का ही लिए ...हमरे बाबूजी टीचर थे न.....यही सोचते रहे इनका खर्चा कम से कम हो.....खैर ...शादी के बाद हम ससुराल गए ...सबकुछ बदल गया रातों रात, टेबुलकुर्सी, जूता-छाता, लोटा, ब्रश-पेस्ट, लोग-बाग, हम बहुत घबराए.....एकदम नया जगह...नया लोग....हम कुछ नहीं जानते थे ...भूख लगे तो खाना कैसे खाएं, बाथरूम कहाँ जाएँ.....किसी से कुछ भी बोलते नहीं बने.....
जब 'इ' आये तो इनसे भी कैसे कहें कि बाथरूम जाना है, इ अपना प्यार-मनुहार जताने लगे और हम रोने लगे, इ समझे हमको माँ-बाबूजी की याद आरही है...लगे समझाने.....बड़ी मुश्किल से हम बोले बाथरूम जाना है....उ रास्ता बता दिए हम गए तो लौटती बेर रास्ता गडबडा गए थे ...याद है हमको....
हाँ तो....हम बता रहे थे कि शादी हुई थी, बड़ी असमंजस में रहे हम .....ऐसे लगे जैसे हॉस्टल में आ गए हैं....सब प्यार दुलार कर रहा था लेकिन कुछ भी अपना नहीं लग रहा था.....

दू दिन बाद हमरा भाई आया ले जाने हमको घर......कूद के तैयार हो गए जाने के लिए...हमरी फुर्ती तो देखने लायक रही...मार जल्दी-जल्दी पैकिंग किये, बस ऐसे लग रहा था जैसे उम्र कैद से छुट्टी मिली हो.....झट से गाडी में बैठ गए, और बस भगवान् से कहने लगे जल्दी निकालो इहाँ से प्रभु.......घर पहुँचते ही धाड़ मार कर रोना शुरू कर दिए, माँ-बाबूजी भी रोने लगे ...एलान कर दिए कि हम अब नहीं जायेंगे .....यही रहेंगे .....का ज़रूरी है कि हम उहाँ रहें.....रोते-रोते जब माँ-बाबूजी को देखे तो ....उ लोग बहुत दूर दिखे, माँ-बाबूजी का चेहरा देखे ....तो परेसान हो गए ...बहुत अजीब लगा......ऐसा लगा उनका चेहरा कुछ बदल गया है, थोडा अजनबीपन आ गया है.....रसोईघर में गए तो सब बर्तन पराये लग रहे थे, सिलोट-लोढ़ा, बाल्टी....पूरे घर में जो हवा रही....उ भी परायी लगी ...अपने आप एक संकोच आने लगा, जोन घर में सबकुछ हमरा था ....अब एक तिनका उठाने में डरने लगे.... लगा इ हमारा घर है कि नही !..........ऐसा काहे ??? कैसे ??? हम आज तक नहीं समझे....
यह कैसी नियति ??......कोई आज बता ही देवे हमको ....कहाँ है हमरा घर ?????? 

रिमझिम गिरे सावन...आवाज़ 'अदा' की...








31 comments:

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    1. अपना घर जहाँ जन्म हुआ, पले बड़े हुए और अपने ही माँ बाप को छोड़ कर चले जाना, उसी घर में अजनबी बन जाना। मार्मिक ही तो है, इस दुःख को महसूस करने के लिए बेटी के रूप में जन्म लेना होगा।

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    1. कितना सटीक जवाब मिला अदा आपको
      अगर लड़की निभा ले तो दो घर हैं यानी घर पाने के लिये किसी भी लड़की के लिये "निभाना" कसोटी हुई और लडको को जन्म जात मिलना तय रहा
      और जब लड़का दामाद बना तो आजन्म "मेहमान" कहलाया और मेहमान नवाजी पर उसका हक़ हुआ , उस से तुरंत पूछना बनता हैं " बाथरूम " हो आये तो नाशता लगाया जाए

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    2. हाँ निभा तो दिए हैं।

      शायद हमलोगों का जन्म ही सिर्फ निभाने के लिए हुआ है। कभी हम नारियों के जूते में पुरुष अपने पाँव डाल कर सिर्फ एक बार सोचने की कोशिश करेंगे, तो बहुत सारी बातें समझ में आएँगी। कभी पुरुष, नारी को एक मनुष्य का ही दर्ज़ा दे कर देखें। पुरुष गण एक बारकल्पना करें कि बिदाई आपकी पत्नी की नहीं आपकी हो गयी और रातों रात आप अपने घर से निकल कर किसी और के घर में पूरे जन्म के लिए बंद कर दिया गया, जहाँ आपको अपनी जगह बनाने के लिए हर दिन मेहनत करनी है, आप पर सबकी नज़र टिकी हुई है।

      शायद ऐसा सोचने से नारी को समाज में थोड़ी इज्ज़त देने की और कोशिश हो। फिर भी ये सच है हम निभा दिए और आगे भी निभायेंगे ही, क्योंकि हम जैसी पैदा ही हुईं हैं सिर्फ निभाने के लिए।

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  3. मार्मिक प्रस्तुति !!

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    1. यही तो सत्य है हम स्त्रियों के लिए !
      आपका धन्यवाद !

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  4. by the way these days the woman issues rock your blog

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    1. Thanks Rachna ji, in-fact they were always there. I am re-posting them :)

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  5. इस समय हम जहाँ पर हैं और जहाँ हमारे कदमों को स्थायित्व देने को हमारे बच्चे साथ हैं वहीं .... सस्नेह :)

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    1. निवेदिता जी,
      अब तो यही कहेंगे हम, माँ-बाप से दूर जाने का दुःख कम तो नहीं होता लेकिन हां उसकी आदत हम स्त्रियाँ अपना लेतीं हैं :(

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  6. इधर ससुराल उधर मायका
    विवाहिता जीवन बता किसका

    विचित्र चली आ रही रीति

    दोनों ओर बांटो सुख-प्रीति

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    1. मैंने बहुत पहले एक शेर लिखा था, यहाँ वो दोहराती हूँ :
      हम यहाँ आधे बसे, आधे हैं अब और कहीं
      ज़िन्दगी बँट गई पर दूरी मिटाई न गई

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  7. सारा जहां आपका.

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    1. और हम ?

      आपका आभार राहुल जी।

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  8. कहानी कही पढ़ी लगी और गाना क्या कहने जब भी मुलाकात होगी १०१ रूपया बड़े भाई की जेब में सदा पाओगी बिना संकोच निकाल लेना .....

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    1. हाँ भईया आपने पहले भी पढ़ी है इसे, रही बात १०१ की तो ऊ हम निकाल ही लेवेंगे :)

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  9. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 01/05/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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    1. यशोदा जी आपके आ-भारी हैं जी हम :)

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  10. क्या लिखा है......
    हम औरतन के भाग में यही कुछ
    लिख रखा है राम जी नें
    खाएँ....पियें..मुटियाएँ बाबूजी के घर में
    फिर ठेल दें हमका एक अनजान के ठौर में
    सादर

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    1. हई देखो, एतना खाओगी तो का करेगा लोग-बाग़ , डाईटिंग का वास्ते भेज दिया अनकर घर में की तानी सूख-साख जाओ अब ..
      हाँ नहीं तो !

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  11. वाह! लाजवाब लेखन | मार्मिक और बहुत ही विचारणीय, अभिव्यक्ति विचारों की | पढ़कर प्रसन्नता हुई | आभार

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  12. Replies
    1. जी हाँ मोनिका जी, ये गहन पीड़ा है और इससे दो-चार होना हम स्त्रियों की नियति :(

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  13. नारी पीड़ा को उजागर करती विचारणीय पोस्ट.

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    1. आपका धन्यवाद दीपक जी !

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  14. आपकी रचनाएं हृदयातल तक पैठ बनातीं है।इसने भी...
    क्या खूब दर्शाया है आपने! जैसे सुध संभाली बस 'पराये घर जाना है तुम्हे..'
    वहां पहुंचे-'पराई बेटी आई है',ये और वो दोनो पराये तो अपना कहां?
    ये मर्म तो एक लड़की ही समझ सकती है कि 'अपने आप को खोकर' ही उसे दुनियां मे जगह मिलती है।
    सादर

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    1. वंदना जी,
      जो बात मैं पूरी पोस्ट में कह पायी आपने चार पंक्तियों में कह दी। यह ऐसा दुःख है, जिसके साथ हम स्त्रियाँ पूरी उम्र जीती हैं, और तारीफ की बात ये कि कभी कह नहीं पातीं हैं।
      हृदय से आभारी हूँ।

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