Tuesday, April 2, 2013

खुशवंत सिंह के पिता ने दिलवाई थी, भगत सिंह को फांसी: दिल्ली सरकार देगी ‘सम्मान’

प्रस्तुत आलेख यहाँ से लिया गया है :



शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत और फख्र के साथ लेता है, लेकिन दिल्ली सरकार उन के खिलाफ गवाही देने वाले एक भारतीय को मरणोपरांत ऐसा सम्मान देने की तैयारी में है जिससे उसे सदियों नहीं भुलाया जा सकेगा। यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि लेखन कर शोहरत हासिल करने वाले लेखक खुशवंत सिंह का पिता ‘सर’ शोभा सिंह है और दिल्ली सरकार विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने का प्रस्ताव ला रही है।
भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया है तथा जिन पर जन्मभूमि को गर्व है, उनमें से एक थे — भगत सिंह।
यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी आत्मकथा में यह वर्णन किया है– “भगत सिंह एक प्रतीक बन गया। सैण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा। उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।”
लेकिन कम ही लोगों को याद होगा कि  भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने वालों में अंग्रेजों का साथ दिया था उनका तन-मन-धन से साथ देने वाले कौम के गद्दारों ने। अंग्रेजों ने तो उन्हें वफ़ादारी का इनाम दिया ही, आजाद भारत की कांग्रेसी सरकार भी उन गद्दारों को महमामंडित करने से नहीं चूक रही। कुछ गद्दारों को तो समाज के बहिष्कार का दंश भी सहना पड़ा, लेकिन कुछ ने अपनी पहचान बदल कर सम्मान और पद भी हासिल किया। आइए डालें एक नज़र ऐसे ही कुछ गद्दारों पर।
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ गवाही देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों ने कुछ लोगों को गवाह बनने पर राजी कर लिया। इनमें से एक था शोभा सिंह। मुकद्दमे में भगत सिंह को पहले देश निकाला मिला फिर लाहौर में चले मुकद्दमें में उन्हें उनके दो साथियों समेत फांसी की सजा मिली जिसमें अहम गवाह था शादी लाल।
‘सर’ शादी लाल
दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली। आज भी श्यामली में शादी लाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है।
लेकिन शादी लाल  को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया। शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर लाए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
इस नाते शोभा सिंह खुशनसीब रहा। उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली  और खूब पैसा भी। उसके बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर सोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता है। आज  दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंबा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था।  खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देश भक्त और दूरद्रष्टा निर्माता साबित करने का भरसक कोशिश की।
खुशवंत सिंह की हवेली
‘सर’ सोभा सिंह
मॉडर्न स्कूल, बाराखंबा रोड









खुशवंत सिंह ने खुद को इतिहासकार भी साबित करने की कोशिश की और कई घटनाओं की अपने ढंग से व्याख्या भी की। खुशवंत सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अप्रैल 1929 को उस वक्त सेंट्रल असेंबली मे मौजूद था जहां भगत सिंह और उनके साथियों ने धुएं वाला बम फेका था। बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही तो दी, लेकिन इसके कारण भगत सिंह को फांसी नहीं हुई। शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था। हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।
अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और खुशवंत सिंह की नज़दीकियों का ही असर कहा जाए कि दोनों एक दूसरे की तारीफ में जुटे हैं। प्रधानमंत्री ने बाकायदा पत्र लिख कर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से अनुरोध किया है कि कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस नाम के चौराहे (जहां ली मेरीडियन, जनपथ और कनिष्क से शांग्रीला बने तीन पांच सितारा होटल हैं) का नाम सर शोभा सिंह के नाम पर कर दिया जाए। अब देखना है कि एक गद्दार का यह महिमामंडन कब और कैसे होता है

दिलचस्प बात यह है कि खुद खुशवंत सिंह ने  कुबूल किया है कि उनके पिता ने भगत सिंह के ख़िलाफ़ गवाही दी थी। उन्होंने यह स्वीकारोक्ति 1997  में मचे ऐसे ही हंगामे के बाद अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की एक प्रशनोत्तरी में की थी। यह स्वीकारोक्ति 13 अक्तूबर सन् 1997 के  अंक में छपी थी। हिंदी पाठकों की सुविधा के लिए सवाल-जवाब का हिंदी अनुवाद भी साथ ही प्रकाशित किया जा रहा है:-
Did you know about the existence of records where your father deposed against Bhagat Singh?
(क्या आपको उन दस्तावेज़ों का पता था जिनके मुताबिक आपके पिता ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी?)
Of course, I knew.It was an open trial.
(निस्संदेह, मुझे पता था। यह एक खुला मुकद्दमा था।)

Were you aware of these events as they unfolded?
(क्या जो बातें सामने आईं उनका आपको पता था ?)
All this was published openly in the papers.
(यह सबकुछ खुलेआम अखबारों में छप चुका था।)

Did you ever ask your father about it?
(कभी आपने अपने पिता से इस बारे में पूछा था?)
After he came back from the assembly, all that was discussed was the bomb-throwing incident. Of course, at that point he did not know who the two boys were.
(जब वो असेंबली से वापस आए थे तो बम फेंके जाने की खूब चर्चा हुई थी। यकीनन, वे उस वक्त उन लड़कों को नहीं पहचानते थे।)

What was the exact sequence of events?
(उस वक्त क्या घटनाक्रम हुए थे?)
My father, Sir Shobha Singh, was in the visitor’s gallery when the bombs were thrown. He was asked to identify the two men, which is what he did. BhagatSingh pleaded guilty so what could my father do? Anyway they were sentenced for killing Saunders, not for this incident.
(जब बम फेंका गया था उस वक्त मेरे पिता सर शोभा सिंह दर्शक दीर्घा में थे। उन्हें दो लोगों की शिनाख्तकरने को कहा गया था, जो उन्होंने कर दिया। भगत सिंह को दोषी छहराया गया तो इसमें मेरे पिता क्या कर सकते थे? बहरहाल, उन्हें सॉन्डर्स को गोली मारने के लिए फांसी हुई थी, इस घटना के लिए नहीं।)

Did your father in his later years feel any regret about his testimony?
(क्या आपके पिता ने बाद में कभी अपनी गवाही पर अफसोस जताया था?)
There was national regret when Bhagat Singh was hanged. He’d become a hero by then.
(जब भगत सिंह को फांसी लगी थी तो यह राष्ट्रीय शोक था। वह उस समय तक एक नायक बन चुका था।)

Being a British contractor, do you think your father was anti-nationalist?
(एक ब्रितानी ठेकेदार होने के कारण क्या आपको अपने पिता कभी राष्ट्रीयता के विरोधी लगे?)
He was not only a British contractor, he was also the biggest contractor in Delhi.
(वे न सिर्फ एक ब्रितानी ठेकेदार थे, बल्कि वे सबसे बड़े ठेकेदार भी थे।)

Are you angry/embarrassed by what your father did?
(क्या आप अपने पिता के कृत्यों से नाराज़शर्मिंदा हैं?)
At that time, we did not feel anything about it. He had only identified them. To insinuate that he got his knighthood for this is rubbish. He was knighted 15 years later.
(उस वक्त हमने इस बारे में कुछ नहीं सोचा था। उन्होंने सिर्फ उनकी (भगत सिंह और राजगुरु) शिनाख्त की थी। कोई अगर ये माने कि उन्हें इसीलिए उपाधि मिली थी, तो यह बकवास है। उन्हें उपाधि (मुकद्दमें के) पंद्रह सालों बाद मिली थी।)

Why do you feel the controversy has been dug up now?
 (आपको ऐसा क्यों लगता है कि विवाद को अभी उभारा जा रहा है?)

This entire thing is aimed at me. My father died a long time ago, so it doesn’t affect him. This is at the instigation of the saffron brigade.
(यह सभी कुछ मुझपर निशाना साध कर किया जा रहा है। मेरे पिता की मौत बरसों पहले हो चुकी है, इसलिए उनपर तो कोई फर्क पड़ता नहीं है। यह भगवा ब्रिगेड के बढ़ावे पर हुआ है।)

And your reaction to the timing?
(और इस टाइमिंग पर आपकी प्रतिक्रिया?)
My writing’s become more and more anti-saffron brigade. I’d written a strong piece when the chargesheet was filed in the Babri Masjid case and this story appeared four days later.
(मेरा लेखन भगवा ब्रिगेड के खिलाफ अधिक से अधिक मुखर हुआ है। जिस दिन बाबरी मस्ज़िद मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ था उस दिन मैंने एक कड़ा लेख लिखा था। यह कहानी उसके चार दिनों बाद सामने आई।)

What do you think of Bhagat Singh?
(भगत सिंह के बारे में आप क्या सोचते हैं?)
I thought very highly of Bhagat Singh. I even managed to get his autograph when he was in jail.
(मेरे मन में भगत सिंह के लिए बहुत सम्मान है। मैं तो उनके जेल में रहने के दैरान उनका ऑटोग्राफ भी लेने में कामयाब हो गया था।)

केपीएस गिल

हालांकि खुशवंत सिंह और उनके परिवार के शुभचिंतक इसके बावजूद सर शोभा सिंह का नाम अमर कर देने की सरकारी कवायद का समर्थन करने से नहीं चूक रहे। पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीएस गिल यह तो मानते हैं कि शोभा सिंह ने भगत सिंह के खिलाफ़ गवाही दी थी जो राष्ट्रीयता के विरुद्ध था, लेकिन उन्हें विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने में कोई बुराई नहीं दिखती। मीडिया दरबार ने जब गिल से पूछा कि क्या वो इस नामकरण के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को अपना समर्थन देंगे..? तो उनका जवाब खासा चौंकाने वाला था। केपीएस गिल ने अपनी बुलंद आवाज में कहा, “जब दिल्ली में गुलामी का प्रतीक औरंगजेब रोड मौजूद है, तो फिर शोभा सिंह के नाम में क्या बुराई है? आप औरंगजेब रोड का नाम बदलवा कर आइए, फिर मैं आपके साथ खड़ा मिलूंगा।”

24 comments:

  1. आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों का साथ देने वाले तमाम लोग आजादी के बाद तक चमकते रहे। खुशवंत सिंह का परिवार भी उनमें से एक है।

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    1. ऐसे चमकने का क्या फ़ायदा है अनूप जी !

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  2. यह बेहद दुखद एपिसोड है, मीडिया शोभा सिंह को कटघरे में खड़ा कर सकती है लेकिन कुछ प्रश्न खड़े होते हैं क्या गीता की शपथ लेकर मुकर जाना अच्छी बात है? उन्होंने जो देखा, उसकी गवाही दी और मैं इसे अपराध नहीं मानता। उन्होंने दिल्ली में अजीमोशान इमारतें बनाईं, दिल्ली की जो खूबसूरती हमें दिखती है उसके पीछे शोभा सिंह का विजन भी है और विंडसर रोड का नाम अगर उनके नाम पर होता है तो वे इसके हकदार हैं। मुझे लगता है कि हमले शोभा सिंह पर कम और उनके बहाने खुशवंत सिंह पर अधिक हो रहे हैं। आपने जो गिल साहब की बात को जगह दी वो मुझे बहुत अच्छी लगी, जब दिल्ली औरंगजेब जैसे शासक को एक रोड दे सकती है जिसने मोती मस्जिद के सिवा कुछ नहीं दिया और दिल्ली को सजाने वाले अपने पिता को आगरे के किले में कैद कर दिया तो शोभा सिंह इसके हकदार हैं ही।

    खुशवंत सिंह ने अपने राजनैतिक लाभों के लिए सत्ता का भले ही इस्तेमाल किया हो लेकिन उन्होंने भारत के सेकुलर फैब्रिक को संभालने में अपना बड़ा योगदान दिया है। उनके दिल्ली पर संस्मरण इतने हैं कि दिल्ली का इतिहास सहेजने में इससे बहुत मदद मिली है। इस दिल्ली वाला को कम से कम इतना सम्मान तो हमें देना चाहिए कि मरने के पहले वो भरा हुआ दिल लेकर न जाएं।
    भगत सिंह का एसेंबली पर बम फेंकना बहुत वीरोचित कार्य था और ऐसा सबके सामने कर भगत सिंह ने इस घटना को और यादगार बनाया। उन्होंने फ्रेंच क्रांतिकारियों की याद दिलाई। मेरे ख्याल से उनके मन में शोभा सिंह के लिए किसी तरह का द्वेष नहीं होगा। शोभा सिंह ने उन्हें एक माध्यम दिलाया, अपने मुकदमों से देश को साम्राज्यवाद की प्रकृति सिखाई।

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    1. तुम्हारी इस बात से मैं सहमत नहीं हो पा रही हूँ। जिन भवनों की बात तुम कर रहे हो, उन्हें अंग्रेजों ने अपने इस्तेमाल के लिए बनवाया था और सभी अंग्रेजी आर्किटेक्ट की देख रेख में बने थे। शोभा सिंह एक बिल्डर था। अगर ऐसा ही था तो आज़ादी के बाद, और अंग्रेजों के जाने के बाद, आज तक वैसे भवन क्यों नहीं बन पाए ? मुझे बिलकुल नहीं लगता कि शोभा सिंह किसी भी तरह के नाम का हक़दार है। वो सिर्फ अंग्रेजों का जीहुजूरी करने वाला एक बिल्डर था, जिसने अपनी गद्दारी की कीमत ज़मीन-ज़ायदाद के रूप में अंग्रेजों से वसूली।
      उसने उस समय राष्ट्रद्रोह किया है, जब भारत का ग़रीब से ग़रीब भारतीय, बच्चे-बच्चे ने भगत सिंह की शिनाख्स्त करने से पूरी तरह इनकार किया था ।

      जैसा कि तुम ही कह रहे हो खुशवंत सिंह ने अपने लाभ के लिए राजनैतिक सत्ता का तो लाभ उठाया ही है। फिर उनके संस्मरणों की क्या प्रमाणिकता क्या भरोसा, वो भी तो बदल सकते हैं उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए !

      गिल साहेब की बात से बिलकुल सहमत हूँ, औरंगजेब जैसे हत्यारे का नाम हिन्दुस्तान में कहीं भी होने का कोई मतलब नहीं है। बल्कि मुग़ल नामों का ही कोई तुक नहीं हैं। क्या भारत में उनके अपने लालों की कमी है जो सड़कों के नाम के लिए भी उधार के नाम लिए जाते रहे हैं ? शोभा सिंह सिर्फ देश द्रोही है और कुछ नहीं।

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    2. शोभा सिंह=सोभा सिंह

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  3. शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले..

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    1. वतन पर मरने वालों का बस यही बाकी निशाँ होगा :(

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  4. एक जमाने में आधा कनाट प्लेस खुशवन सिंह जी के पिता का हुआ करता था, आप क्या समझते है अंग्रेजों ने ऐसे ही हथियाने दिया होगा उन्हें दिल्ली के मध्य की वह बेशकीमती जमीन ? मैं एक लेखक के तौर पर खुशवंत सिह जी की बहुत इज्जत करता हूँ किन्तु यह भी सत्य है कि आजादी से पहले इस परिवार ने अंग्रेजो और आजादी के बाद सिर्फ नेहरु खानदान की ही चरण वंदना की।

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    1. जी नहीं गोदियाल जी, ऐसे कुछ भी नहीं मिला है।
      ये सब कुछ शहीद भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी पर चढ़वाने का ईनाम मिला होगा :(

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  5. जब भी इस प्रकरण के बारे में पढ़ती हूँ , सर शर्म से झुक जाता है.ऐसे लोगों की वजह से ही आजादी मिलने में इतनी देर लगी...और आजादी के बाद भी उन्हें वही रूतबा हासिल रहा.

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    1. रश्मि,
      इतिहास मैं शोभा सिंह का नाम काले अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। तुम कहती हो भारत को आज़ादी मिलने में देर हुई है और मैं कहती हूँ भारत आज़ाद ही कहाँ हुआ है ? आज भारत अपने मुट्ठी भर मंत्रियों के हाथों गुलाम हो चूका है।
      यहाँ बगुला भगतों की भरमार है, जो स्वार्थ की माला जपते ही रहते हैं। दिमागी गुलामी और नकल से भारत को छुटकारा पाने में अभी वक्त लगेगा। जब तक जनता नहीं जागेगी और पहल नहीं करेगी गुलामी के खंडहर नहीं धहेंगे। जनता को जागना होगा अपने अधिकारों की बागडोर अपने हाथों में लेनी होगी, देख लेना नेतागण अपने आप पीछे दौड़े आएंगे। अभी तो देश रेंग रहा है। जिस दिन सचमुच गुलामी हटेगी, तभी वो दौड़ेगा।

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  6. आज की ब्लॉग बुलेटिन दोस्तों आपकी मदद चाहिए - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. गोरे साहबों के रहते उन्होने भूरे साहब बनाए फिर उन के जाने के बाद भूरे साहबों ने अपने चमचों को साहब बनाया ... वो सिलसिला अब भी जारी है !

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    1. शिवम्,
      बिलकुल सहमत हूँ तुम्हारी बातों से। उस ज़माने में जिन भूरों ने गोरों की गुलामी की, वो 'सर' 'साहब' बन गए उनके वारे-न्यारे हो गए। आज तक उनकी पुश्ते बैठ कर खा रहीं हैं और आगे भी खाती रहेंगी। जिन्होंने गुलामी नहीं की उनके हिस्से आया फाँसी का फंदा।
      बचे हुए वही मुट्ठी भर भूरे साहब , विरासत आगे लिए जा रहे हैं,1.6 बिलियन से ग़ुलामी करवा रहे हैं, और बिना ना-नुकुर किये हुए हम-तुम जैसे लोग गुलामी फरमा रहे हैं। हम तो कहते हैं गोरों से तो ये भूरे ज्यादा क़ाबिल निकले, आम के आम गुठलियों के दाम ! :)

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  8. very informative post adaa i must say hats off to you

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  9. मुझे यह पता नहीं था -मेरे मन में यह पोस्ट पढ़कर खुशवंत सिंह के प्रति प्रशंसा भाव में कमी हुयी है !

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    1. सही कमी हुई है अरविन्द जी।
      इस भाव में कमी नहीं होती तो, दुसरे भाव में कमी नज़र आती।
      मेरा तात्पर्य देशभक्ति से हैं

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  10. शायद वतन पर मरने वालों के इस हाल ने ही वतन से विमुख किया है वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को .... दुखद

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    1. सही कहतीं हैं मोनिका जी
      धन्यवाद !

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  11. बहुत विचारणीय आलेख है। भगत सिंह देशभक्ति का विराट अनुभव हैं। उनके प्रति सब ओर सम्‍मान ही है। शोभा सिंह, शादी लाल, खुशवंत सिंह, दिल्‍ली और भारत के संभाली सब के सब राष्‍ट्रीयता से खेल रहे हैं। लेकिन केपीएस गिल की बात में दम है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। बेशक जिस भी सन्‍दर्भ में वह बात आई हो।

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  12. ऐसे लोगों को अपने कर्मों पर शर्म भी नहीं आती है | कमाल है ....
    बहुत सुन्दर लेखन | विचारणीय | पढ़कर आनंद आया | आशा है आप अपने लेखन से ऐसे ही हमे कृतार्थ करते रहेंगे | आभार


    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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