Thursday, April 29, 2010

आख़िर, जंगल का भी अपना, क़ानून तो होता ही है....!!



सीधी सच्ची बातें, 
जंगल जैसे लोग
झेल नहीं पाते,
घबराते हैं
कहीं चीड़ों के झुरमुट में
चाँदनी न बिखर जाए,
और वो साँप सी रेंगती 
झूठी ईमानदारी की पटरियाँ,
जिनपर
काहिली के मंसूबे
सफ़र करते हैं,
अपने मकसद और मुक़ाम पर
पहुँचने से पहले
पकड़े जाएँ,
इसलिए, 
सबकी नज़रें बचाकर 
लीपते हैं दंभ से,
ज्ञान की ज़मीन 
और लगाते हैं चाटुकारिता 
के रंग-ओ-रोगन,
पर, उनकी अपनी ही 
छिद्रान्वेषी कोशिशें
उसे थोथा कर देतीं हैं  
और तब ग़ुलाम 
हुई कुंठाएं,
चेहरे बदल-बदल कर
मोहने की कोशिश में 
लग जातीं हैं,
टिके रहने के लिए... 
अब, वर्चस्व तो बचाना है न ! 
आख़िर,
जंगल का भी अपना, क़ानून तो होता ही है....!!


26 comments:

  1. सबकी नज़रें बचाकर
    लीपते हैं दंभ से,
    ज्ञान की ज़मीन
    बहुत सुन्दर चित्रण, भाव गज़ब के

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  2. ये बहुत सही कहा कि सीधी सच्ची बाते लोग झेल नहीं पाते ...
    सीधी सच्ची बातें ही क्यूँ ....सीधे सच्चे लोग भी कहाँ ....जुट जाते हैं सब उनकी स्वाभाविकता का गला घोंटने ...
    करके बर्बाद फूलों सा कोमल आशियाँ
    पूछते हैं लोग ...
    बदल गया है क्यों मौसम का मिजाज़ ....!!

    जंगल का ही तो कानून होता है ....सभ्यताओं का बचा कहाँ है ...आगे बढ़ने की होड़ में लाशें बिछाये जाते हैं और उन लाशों की सीढियों पर कदम रखा कर बढ़ते जाते हैं ....

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  3. शानदार और सटीक बात कह दी!!

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  4. Sundar kavitaa ada ji,
    seedhee sachchee baat
    jangal jaise log jhel nahee paate... waah !!

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  5. "अपने मकसद और मुक़ाम पर
    पहुँचने से पहले
    पकड़े न जाएँ,
    इसलिए,
    सबकी नज़रें बचाकर
    लीपते हैं दंभ से,
    ज्ञान की ज़मीन"

    सच्चाई जाहिर होकर ही रहती है।
    आजकल के माहौल को बयां करती प्रस्तुति।
    और जंगल के कानून का पालन करने वालों को जब कभी उनकी भाषा में प्रत्युत्तर मिलेगा, वही सभ्य कानून की दुहाई देते फ़िरेंगे।

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  6. जंगल का भी अपना, क़ानून तो होता ही है....!!

    जंगल का कानून शक्ति पर आधारित होता है।
    जितने भयभीत लोग,उतना बड़ा गुट,
    असुरक्षा की भावना से ग्रसित्।

    बहुत अच्छी कविता बहना

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  7. अच्छी मानवीय सोच ,संवेदनाओं और संघर्ष से उपजे विचारों को कविता के रूप में श्रेष्ठ प्रस्तुती के लिए धन्यवाद / आज नैतिकता और मानवता को बचाने के लिए एकजुट होने की जरूरत है /आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

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  8. जंगल जंगल बात चली है, पता चला है,
    अरे,बेशर्मी के बुरके पहनकर,
    ब्लॉगिंग के Fool खिले हैं,Fool खिले हैं...

    काहे का जंगल, काहे का समाज और काहे के क़ानून...

    जय हिंद...

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  9. बिल्कुल सही ......जंगल का अपना भी कानून होता है ......बेहतरीन रचना

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  10. बहुत ही सधे लहजे में सटीक बात कही गई है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  11. दुखी होऊगे, सरल हिय, बसहुँ त्रिभंगी लाल ।

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  12. सीधी सच्ची बातें,
    जंगल जैसे लोग
    झेल नहीं पाते,
    घबराते हैं
    कहीं चीड़ों के झुरमुट में
    चाँदनी न बिखर जाए,
    और वो साँप सी रेंगती
    झूठी ईमानदारी की पटरियाँ,
    जिनपर
    काहिली के मंसूबे
    सफ़र करते हैं,


    बहुत सुन्दर रचना!

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  13. टिके रहने के लिए...
    अब, वर्चस्व तो बचाना है न !

    आपने एकदम सही लिखा है ... वैसे सच तो यह है कि हर तरफ केवल वर्चस्व बचाने की जंग चल रही है !

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  14. जंगल का भी अपना, क़ानून तो होता ही है....!!

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  15. बहुत सुन्दर रचना! शुभकामनाएं!

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  16. अब तो चलता ही जंगल का कानून है,(??मै)इंसानो का कानून कहा बचा है.
    बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

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  17. सबकी नज़रें बचाकर
    लीपते हैं दंभ से,
    ज्ञान की ज़मीन
    क्या बात है अदा जी. बहुत सुन्दर.

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  18. और तब ग़ुलाम
    हुई कुंठाएं,
    चेहरे बदल-बदल कर
    मोहने की कोशिश में
    लग जातीं हैं,

    बहुत गहरी बात कह दी है आज की रचना में....बधाई

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  19. अपने मकसद और मुक़ाम पर
    पहुँचने से पहले
    पकड़े न जाएँ,
    इसलिए,
    सबकी नज़रें बचाकर
    लीपते हैं दंभ से,
    ज्ञान की ज़मीन
    और लगाते हैं चाटुकारिता
    के रंग-ओ-रोगन

    क्या बात है!!

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  20. @ टिके रहने के लिए...
    अब, वर्चस्व तो बचाना है न !
    --------- यह तो वह खूब जानते हैं और इसीलिये अच्छे-अच्छे शब्दों पर
    करते हैं हमला ! अपनी कुंठा को ढंकने के लिए ! 'वर्चस्व' को सकुंठ बनाए
    रखने के लिए ! पूरे माहौल को अशांत बनाने के बाद 'शान्ति' का छद्म-जाप
    कमो-बेश ऐसी ही कुचेष्टा की अभिव्यक्ति है ! 'शान्ति' शब्द को भी लज्जा आ
    रही होगी , अयोग्य प्रयोक्ता के हांथों प्रयुक्त होकर !
    @ घबराते हैं
    कहीं चीड़ों के झुरमुट में
    चाँदनी न बिखर जाए,
    और वो साँप सी रेंगती
    झूठी ईमानदारी की पटरियाँ,
    जिनपर
    काहिली के मंसूबे
    सफ़र करते हैं,
    अपने मकसद और मुक़ाम पर
    पहुँचने से पहले
    पकड़े न जाएँ,
    ----------- भाव स्थिति ने अद्भुत शब्द-संघति अख्तियार की है ! और
    '' वो साँप सी रेंगती / झूठी ईमानदारी की पटरियाँ '' - क्या खूबसूरत चयन
    है ! तन्मय-प्रवाह में ही ऐसी पंक्तियाँ निकलती हैं ! आपके द्वारा लिखी गयी
    बेहतरीन कविताओं में रखता हूँ इस कविता को !
    ................ आभार !

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  21. सच्चाई जाहिर होकर ही रहती है।

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  22. मिलावट इस क़दर शामिल हुई है जिंदगानी में,
    कि खालिस दूध से पेचिश है, घी से बाँस आती है,

    हमें भी गर्क कर देनी पड़ीं, सच्चाइयां अपनी
    कहाँ अब अहले-दुनिया को खुलूसी रास आती है

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  23. मिलावट इस क़दर शामिल हुई है जिंदगानी में,
    कि खालिस दूध से पेचिश है, घी से बाँस आती है,

    हमें भी गर्क कर देनी पड़ीं, सच्चाइयां अपनी
    कहाँ अब अहले-दुनिया को खुलूसी रास आती है

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