Sunday, April 18, 2010

मैं स्वयं हूँ रचयिता अपने संसार का ...


सत्य और असत्य ने 
रचा है यह संसार
जैसा मैं सोचूं 
वैसा ही है यह संसार
मैं स्वयं हूँ
रचयिता अपने संसार का
स्वामी भी मैं 
दृष्टि  भी और 
दृश्य  भी 
मैंने ही रचा है निज को
अपने विचारों से,
यह सारा खेल
ही है विचारों का
जो साझा है
विष और अमृत का,
जैसा मनन वैसा मन,  
विवेक मथानी चाहिए
विचार के समुद्र 
को मथने के लिए 
मथोगे तो
निकलेंगे 
सदविचारों  के रत्न
जो ले जायेंगे 
मोक्ष के पथ पर,
और कहीं जो
विपरीत हुए तो 
धकेल देंगे तुम्हें 
गहनतम अन्धकार  में 
और तब तपोगे नरक के 
गर्त में,
क्योंकि तुम्हारे विचार
तुम्हारा नरक बन जायेंगे, 
सोच लो
विचार लो
विचार भ्रमित तो करते हैं 
लेकिन
ये विचार ही तो हैं जो
व्यक्तित्व का निर्माण 
करते हैं.....


31 comments:

  1. विचार भ्रमित तो करते हैं ...
    मगर ये विचार ही हैं जो व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं ...
    क्या बात कही ....
    हम वही होते हैं जो हम दिखाना चाहते हैं ....वह नहीं... जो छिपाना चाहते हैं ...
    इसलिए हमें वही होने का प्रयास करना चाहिए जो हम दिखाना चाहते हैं ...
    यही सारतत्व है इस जीवन और व्यक्तित्व का ...
    यही इस कविता का भी ....!!

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  2. ये विचार ही तो हैं जो
    व्यक्तित्व का निर्माण
    करते हैं.

    -निश्चित ही विचारों की ही छाप है व्यक्तित्व!

    सुन्दर रचना!

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  3. bahut khoob kaha vichar hi to hain jo insaan ko insaan ya haivaan banatehain...satya darshati rachna...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  4. बहुत सुन्दर कविता है ! जीवन का ससार यही है । हम वही बनते हैं जैसी हमारी सोच हैं । बुरी सोच होगी तो बुरा ही बनेंगे, और अच्छी सोच रखेंगे तो व्यतित्व में निखार आ जायेगा ।

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  5. यह सारा खेल
    ही है विचारों का
    जो साझा है
    विष और अमृत का,
    जैसा मनन वैसा मन,
    विवेक मथानी चाहिए

    APNI MAATI
    MANIKNAAMAA

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  6. सत्य और असत्य ने
    रचा है यह संसार
    जैसा मैं सोचूं
    वैसा ही है यह संसार
    मैं स्वयं हूँ
    रचयिता अपने संसार का
    स्वामी भी मैं
    दृष्टि भी और
    दृश्य भी
    मैंने ही रचा है निज को
    अपने विचारों से,
    यह सारा खेल
    ही है विचारों का


    बहुत सुन्दर कविता है...
    बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर...

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  7. ये विचार ही तो हैं जो
    व्यक्तित्व का निर्माण
    करते हैं.....
    बिना विचार का अर्थात पशु
    सुन्दर रचना, विचारणीय

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  8. जैसा बोओगे वैसा काटोगे........
    जैसे सोचोगे वैसे बनोगे...........

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  9. विचार भ्रमित तो करते हैं
    लेकिन
    ये विचार ही तो हैं जो
    व्यक्तित्व का निर्माण
    करते हैं.....

    क्या सुन्दर बात कही है ।

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  10. Very deep and divine thought!
    Great presentation.

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  11. बहुत सही कहा है आपने कि हम अपना संसार खुद बनाते हैं।
    हम सब किसान हैं जो विचारों की खेती कर रहे हैं। जैसे विचार बीज के रूप में अपने मानस में डालते हैं, वैसी ही फ़सल काटने के लिये तैयार रहना चाहिये।
    विचारों में गतिशीलता भी जरूरी है, आत्मावलोकन भी।
    आज आपको ’अहं ब्रह्मोस्मि’ की भावना का प्रसार करते देखना अच्छा लगा।
    आभार

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  12. जैसा मैं सोचूं
    वैसा ही है यह संसार

    सच है ।

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  13. दी आपके विचार को मेरा प्रणाम

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  14. bahut khub


    यही सारतत्व है इस जीवन और व्यक्तित्व का ...
    यही इस कविता का भी ....!!

    bahut khub



    shekhar kumawat
    http://kavyawani.blogspot.com/

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  15. अति सुंदर रचना जी

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  16. मैं स्वयं हूँ रचयिचा
    अपने सुखद संसार का!
    ध्यान रखता हूँ हमेशा
    मैं स्वयं परिवार का!!

    अदा जी आपकी रचना वाकई में बहुत बढ़िया है!

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  17. दुनिया बनाने वाले,
    काहे को दुनिया बनाई...

    काहे बनाए तून्हे माटी के पुतले,
    काहे लगाया जीवन का मेला,
    गुपचुप तमाशा देखे, सारी खुदाई,
    काहे को दुनिया बनाई...

    जय हिंद...

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  18. विचार भ्रमित तो करते हैं
    लेकिन
    ये विचार ही तो हैं जो
    व्यक्तित्व का निर्माण
    करते हैं...
    क्या कहूँ शब्द नहीं है, इतने सुन्दर विचार और इतनी सुन्दरता से विचारों को शब्दों में ढालना, वाह !

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  19. सदविचारों के रत्न
    जो ले जायेंगे
    मोक्ष के पथ पर,
    और कहीं जो
    विपरीत हुए तो
    धकेल देंगे तुम्हें
    गहनतम अन्धकार में
    और तब तपोगे नरक के
    गर्त में,

    bahut ghahri baat........

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  20. Girijesh Rao said:

    पिताजी अध्यापन काल में कहा करते थे - तुम जो सोच रहे होते हो वह न कोई सुनता है, न जानता है। सोचने में ईमानदार रहो। बहुत से हल इतने से ही निकल आएँगे।

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  21. अच्छी दार्शनिक कविता...विचारों से ही मनुष्य की पहचान होती है.....भ्रम कुछ देर तो हो सकता है पर टिक नहीं सकता..

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  22. सोच लो
    विचार लो
    विचार भ्रमित तो करते हैं
    लेकिन
    ये विचार ही तो हैं जो
    व्यक्तित्व का निर्माण
    करते हैं.....
    बहुत सही !!

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  23. hnm...

    ..

    bahut sunder likhaa hai....

    badhaai..

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  24. बहुत बढ़िया रचना आभार ....

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  25. कवि कुंवर नारायण की एक कविता याद आने लगी
    कि व्यक्ति लपक कर नाप लेगा अपनी अस्मिता में
    विश्व का विस्तार , बशर्ते ---
    '' उसकी बुद्धि को हर दासता से मुक्त रहने दो '' !

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  26. जबर्दस्त रचना ! यहाँ तो सब कुछ कह दिया है आपने -
    "विवेक मथानी चाहिए
    विचार के समुद्र
    को मथने के लिए
    मथोगे तो
    निकलेंगे
    सदविचारों के रत्न"

    बस ! इन सदविचारों से ही बात शुरु होती है, बनती है !

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