Saturday, April 10, 2010

हँसी के मुखौटे...


इस शहर में अब
कोई रोता नहीं है
सब हँसते
हुए मिलते हैं
क्योंकि
यहाँ अब सिर्फ
हँसी के मुखौटे
बिकते हैं...


20 comments:

  1. पलायन से हट
    सामना का सामर्थ्य
    जब आ सकेगा
    बदल जायगा
    सब कुछ..!
    आभार..!

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  2. ये दुनिया की किताब भी क्या किताब है
    हर चेहरा एक नकाब है
    चेहरे दर चेहरे ओढ़े मुखौटे
    सिर्फ हंसी के नहीं
    अपनापन के भी ...
    सरलता और सहजता तो हंसी की पात्र रही है ....तो क्यों ना ओढें लोग मुखौटे ...कौन मूर्ख बने रहना चाहता है हमारे सिवा.... :):)

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  3. "हंसो आज इतना कि इस शोर में,
    सदा इन दिलों की सुनाई न दे"

    आभार

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  4. अदा जी!
    इस व्यंग्य की धार बहुत पैनी है!

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  5. बेहतरीन धारदार रचना
    एक मुखौटा मुझे भी चाहिये
    कहाँ मिलता है !!!

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  6. wow ! अदाजी ! आप तो छा गयी हैं ! बहुत ही बढ़िया व्यंग कविता लिखी है आप ! सच है की आज इन्सान अपने असली भाव भी दिखाने से डरता है ... और कई हैं जो दिखाना चाहते भी नहीं हैं !

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  7. मुखोटों के शहर में...

    गुम सा जाता हूँ मैं...

    खुद को खुद से...

    अजनबी पाता हूँ मैं...

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  8. शायद इससे ही हँसने की आदत पड़ आए, और एक दिन मुखौटे पहनने भी छोड़ दें।


    अद्भुत।

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  9. अदा जी !! मुखौटे तो मुखौटे ही हैं ...चाहे हँसी के हों या रोने के ...मुख्य मुद्दा तो मरती हुई मानवीय सम्वेदनाओं को बचाने का है ...जो मात्र मुखोटे हटा कर वास्तविक चेहरों को देखने के साहस से ही जिंदा रह सकती है ।

    आभार

    अब आप तो हमें पढ़ती नहीं हैं ...खैर हम तो जब समय मिलता है चले आते हैं आपकी सम्वेदनाओं का संस्पर्श पाने ...

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  10. हँसी के मुखौटे
    बिकते - आप की इंगित सहस्रधारा सी है।
    हँसी स्वाभाविक नहीं, खरीदी बेंची जाती है - वह भी मुखौटों के रूप में।

    शहरयार की ग़जल याद आ गई:
    'सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है
    इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है'

    मुखौटों के कारण ही आईना हमें देख कर हैरान होता रहा है।

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  11. बहुत पैना कटाक्ष है.

    रामराम.

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  12. कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये अजीब मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो...

    बशीर बद्र साहब अब इन मुखौटों को देख कर क्या कहना चाहेंगे...

    जय हिंद...

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  13. ऐसे ही मुखौटे तो रोज देखते हैं, सुबह से शाम तक पर इनके पीछे मंतव्य कुछ और ही छिपा होता है।

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  14. लाजवाब प्रस्तुती .....

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  15. mere wardrob me
    kapdon ki jagaz
    tange hain chehre...
    jinhen har pahar badal leta hoon

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  16. बेहतरीन व्यंग्य।

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  17. झूठी हंसी ओढे हैं वो
    और सखी बात करती हैं
    झूठे अपने पन की..
    कोई किसी को दगा देता नही..
    कुछ वक़्त की चोटे हैं..
    कुछ हालात की गर्दिश..
    समझ लो इक-दूजे को अपना..
    मन के मैल हटा
    सब को बना लो अपना.

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  18. अदा जी,
    इन्नी चगीं comment लिखी सी त्वाडी पिछली Post दे उत्ते!फ़ेर भी तुस्सी नहीं आये मेरे ब्लोग पे.माना Blog नहीं ब्लोगडा है, फ़िर भी एक भिजिट per post तो बनता है नूं!
    rgds!

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  19. सच,अब हंसी भी निश्छल नहीं रही।

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