Saturday, April 17, 2010

अमावस की रात....

  लोग सताए हुए हैं
मत उलझो इनसे
कुछ भी कर जायेंगे
प्यार की आदत नहीं इनको
इतना दोगे तो मर जायेंगे
खोल चढ़े हुए चेहरों में     
अमावस की रात है   जिसको देखते ही
सच्चाई की नदी उतर जाती है
फिर चाहो कि न चाहो
नकाबों के हाथों
एक बार फिर इंसानियत मर जाती है ....   

31 comments:

  1. नकाबों के हाथों
    एक बार फिर
    इंसानियत मर जाती है ....

    बहुत ही संवेदनशील कविता!

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  2. लोगों का इतना कसूर है भी नहीं,
    बहुत समय के भूखे को एकदम से भरपेट खाना देने पर अपच भी हो सकती है।
    बहुत मार्मिक कविता है, और चित्र भी जैसे की सच्चाई की नदी के उतर जाने के बाद क्या कुछ रह जाता है, इस बात को बखूबी बयान करता है।
    पर इन्सानियत मरेगी नहीं, मर सकती भी नहीं, इत्मीनान रखिये।
    कहां से ले आती हैं आप इतना कुछ?

    आभार

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  3. इतना दोगे तो मर जायेंगे'

    जो कुछ छीना है उसी में से तो कुछ दे रहे हैं.
    पर उनको तो देखिये वे कहाँ कुछ ले रहे हैं.

    सताये हुए की व्यथा यही है

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  4. Bahut Badhiya abhivyakti didi.. gahra arth simete hue...

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  5. बहुत गहरी रचना!! बधाई.

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  6. नकाब के हाथों इंसानियत मर जाती है ...
    बात तो ठीक ही है ...!!

    प्यार की जिनको आदत नहीं ...
    इतना दोगे तो मर जायेंगे ...
    सही ...

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  7. सताए हुए लोगों को तलाश किस चीज़ की है..रह-रह कर टीसते मन को जरूरत किसकी है.. प्यार की ही न !
    प्यार बे-आदतन औचक ही आ कर छा जाने वाली खूबसूरत अनुभूति है ! और इतना-उतना तो कुछ भी नहीं उसमें ! सताए हुए लोगों को झलकाइये तो प्यार ! कुछ भी कर जाएंगे !

    पोस्ट की संवेदना से छेड़छाड़ तो नहीं हो गई ? खैर.. आपकी दर पे हर हाल अच्छा है !

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  8. बहुत सुन्दर रचना ! वैसे भी आजकल इंसानियत रही कहाँ ? कबके मर चुकी है । आपने सच लिखा है, प्यार की अब आदत नहीं रही । ढोंग की आदत हो गयी है ।

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  9. प्यार की आदत नहीं इनको
    इतना दोगे तो मर जायेंगे

    हम तो बस इसी में डूबे हुए हैं ।

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  10. खोल चढ़े हुए चेहरों में
    अमावस की रात है
    जिसको देखते ही
    सच्चाई की नदी उतर जाती है
    ...vaah!
    --सताए हुए लोगों के साथ उलझना जितना खतरनाक है उतना ही संवेदना प्रकट करना।
    प्यार करो मगर यह ज़ताने का प्रयास मत करो कि प्यार करते हैं।
    ...यह कविता संवेदना को झकझोर देने वाली अभिव्यक्ति है।

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  11. हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

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  12. बहुत ही संवेदनशील कविता!

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  13. itni samvedna...waah...bilkul satya kaha..
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  14. संवेदनशील रचना...........

    http://rajdarbaar.blogspot.com

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  15. बहुत बढिया अभिव्‍यक्ति।

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  16. अमावस की रात है जिसको देखते ही
    सच्चाई की नदी उतर जाती है
    फिर चाहो कि न चाहो
    नकाबों के हाथों एक बार फिर इंसानियत मर जाती है ........दी सब कुछ नकली हैं कम्बख़त .........पर इश्क़ ज़िन्दा तो रहेगा नफ़रत के तमाम उफनते हुयी सैलाबों के बाद

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  17. प्यार की आदत नही.............कुछ समय बाद तो शायद प्यार ही नही रहेगा.बहुत बढिया लिखा आपने सच को शब्दों में उतार दिया.

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  18. नकाबों के हाथों
    एक बार फिर
    इंसानियत मर जाती है ....

    bahut khub....Ada Ji

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  19. बहुत सुंदर लिखा है आपने.

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  20. तस्वीर ने कविता का प्रभाव दुगना कर दिया ।
    मार्मिक अदा जी ।

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  21. नकाबों के हाथों
    एक बार फिर इंसानियत
    मर जाती है ....

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  22. काली रात की हर बात है काली...

    कुछ टंटों की वजह से नियमित कमेंट नहीं कर पा रहा...कारण अपनी कल की पोस्ट में स्पष्ट करने वाला हूं...

    जय हिंद...

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  23. प्यार नहीं, अधिकार की आदत है इन्हें ।

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  24. read many of your posts today.....you write so well ...it has been a pleasure to read your work.

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  25. aapne achchhaa likha hai ada ji..

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  26. आता गया क्रमशः पीछे की प्रविष्टियों पर और यहाँ ह-म-श टुनटुन
    भी दिखने लगे .. कहने के बाद इतनी सफाई काहे देने लगते हैं ई बनारसी बाबू ! :)
    ........
    हालात पत्थर बना देते हैं जिनको वे शायद इतने सरल नहीं रह जाते , उनमें सरलता
    पनपाने वाला कोई शूरमा ही होता है , पर भीतर के भीतर के भीतर कहीं होता है वह सोता
    जहां स्नेह की धार रहती है , कौन पहुँच सकता है वहाँ तक ? .. विरला कोई शूरमा ...
    उस अमावास की रात के वैभव को ( सघन दुःख के सुख-बीज को ) जीने के लिए
    वीरता ही चाहिए न !
    आभार !

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