Wednesday, April 7, 2010

ये दीया बुझ जायेगा...


जानते हो !!
मुझे पता था
ये दीया बुझ जायेगा
फिर भी, जाने क्यूँ 
मैंने...
इसे जलाया
अँधेरे में 
तुम्हारे चेहरे
के भाव
रुख की सलवटों
में छुप गए थे 
जो दीये की रौशनी
देख झांकने लगे
तुमने बड़ी मुस्तैदी से
भावों को भगा दिया
और मौका देख 
वो दीया बुझा दिया....

29 comments:

  1. बुझने दे ये दिए जो अँधेरे ही फैला रहे थे ...
    जलने दो आशाओं के दीपक ....
    कभी नहीं बुझेंगे ....!!

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  2. और मौका देख
    वो दीया बुझा दिया....
    दीया जलेगा तो शायद सच्चाई उजागर हो जायेगी. सच्चाई एक जंग है पर इस जंग के खिलाफ भी तो जंग जारी है
    सुन्दर रचना

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  3. अदा जी,
    तो क्या अंधेरा फ़िर जीत जायेगा?
    क्या लिख दिया जी आपने?


    शायद वसीम बरेलवी साहब ने कहा था,
    "आंधियों के इरादे तो अच्छे न थे,
    ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया"

    आपका गीत था,
    "मैं ठोकर खाकर गिर जाऊं,
    ऐसा हो नहीं सकता"

    क्या आज की पोस्ट रिप्लेस हो सकती है?

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  4. वाह...वाह...!
    अदा जी!
    सुबह उठते ही एच्छी रचना से रूबरू हुए!

    .. ..

    बल्ली सिंह चीमा ने लिखा है-
    "अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के!"

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  5. आप भी न बस, पता नहीं क्या क्या लिख देती हैं, कभी-कभी।

    अब हम वाणी जी से सहमत हैं और आपको सलाह ये दी जाती है कि जिन्हें अंधेरे पसंद हैं उन्हें रोशनी दिखाने की कोई जरूरत नहीं है। शायद अंधेरा उनकी नियति है, वो तो सूरज को भी ढंकना चाहेंगे।
    ’सकल पदारथ है जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं’

    फ़िर से जलने दो आशाओं के दीपक....
    कभी नहीं बुझेंगे......!!

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  6. सच्चाई खुद ब खुद सामने आ ही जाती है ।
    आखिर कब तक कोई अपनों से बहाने बनाता रहेगा । बहुत ही बेहतर ।
    आभार..!

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  7. ओह आज बहुत दिनों बाद फ़िर ये कहने का मन है कि

    कलम उनकी कातिल है ,
    हम रोज़ मरते हैं ,
    वो रोज़ लिखती हैं ,
    हम रोज़ पढते हैं ।
    जाने उजियारे-अंधियारे में,
    वो कितने भाव गढते हैं,
    चरागों के भरोसे हम कहां,
    आंखों से नहीं,रूह से पढते हैं

    अजय कुमार झा

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  8. अंग्रेजी में एक कहावत है " Ignorance is bliss " . शायद कभी कभी अँधेरा ही सही है !

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  9. बहुत बढ़िया रचना ....

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  10. सच्चाई उजागर करने के लिए थोड़ी सी रोशनी ही काफी है....अच्छी नज़्म...

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  11. इसीलिए कहता हूं, माचिस या लाइटर हमेशा साथ रखना चाहिए,

    दीया बुझा नहीं कि झट से फिर जला दिया...

    जय हिंद...

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  12. अंधेरा हमारे भावों को छूपाता है, तो रोशनी का दीया उन्हें उघाड़ता है...इस तरह एक आदत सी हो गई है अंधेरे में रहने की ...शायद इसी लिए अब तो चिराग से भी डर लगने लगा है ...कि कहीं मैं पढ़ न लिया जाऊँ... इसी लिए तो बुझा दीया ही मुझे प्रिय होता जा रहा है...बहुत सुंदर !!!!

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  13. अदा जी..

    अभी तक हम समीर जी के किचन से बाहर नहीं निकले हैं...
    ओके...

    आज कुछ पोस्ट करना ही था तो कुछ खाने पीने का पोस्ट डाला होता......
    ये अन्धेरा शंधेरा लिख कर......

    रोटी, चावल, आलू गोभी की सब्जी, बंद गोभी की सूखी सब्जी, लोबिया की दाल, चिकेन, रायता, अचार, सलाद इत्यादि-इत्यादि .......................................

    का सारा मजा गायब कर दिया आपने...

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  14. सादर वन्दे!
    रात कुछ इस तरह आँचल बिछाती है अपना
    कि सब भूलकर उसकी आगोश में सोते है
    क्यों शिकायत करें हम उन अंधेरों की
    कि यही तो हैं जो हमें शुकून देतें हैं.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  15. वाह...नारी के विश्वास का ,पुरुष की हताशा भरी बेशर्म प्रतिक्रिया का बढ़िया चित्रण

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  16. मौका देख वो दिया बुझा दिया ,,,,,,,
    सुदर रचना

    विकास पाण्डेय
    www.vicharokadarpan.blogspot.com

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  17. और मौका देख
    वो दीया बुझा दिया....

    bahut sundar

    wow !!!!!!!!!!


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  18. hum shikwa karte reh gaye haaye tumne yeh kya kiya
    wo the jo kehte rahre ek diya hi to tha jo bujha diya

    -Shruti

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  19. सुन्दर रचना,अदा जी!

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  20. सच्चाई
    किसी भी अँधेरे से बढ़ कर ही होती है
    और भाव .....
    सिमट कर आँखों में उतर आएँगे ...

    खैर
    रचना अच्छी है
    सोचने पर मजबूर करती है

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  21. शानदार रचना..बहुत पसंद आई.

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  22. बहुत नायाब रचना.

    रामराम.

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  23. बहुत सुन्दर व उम्दा रचना है।बधाई।

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  24. वाह ! कमाल कि रचना! ऐसी रचनाए कभी कभी ही पढने को मिलती है, आप कि मैंने अब तक जितनी भी रचनाएँ पढ़ी है सब से अच्छी ये लगी! मेरे पास तारीफ के शब्द नहीं है, सचमुच!

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  25. दीये बुझने की कीमत पर किसने रोके रखा है दीये को जलाना !
    दीये जलते हैं..
    साफ-साफ दिखते ही हैं संसार की तह में छिपे कुछ चिह्न, चेहरे, आकृतियाँ !
    दीया फिर बाहर की चीज न रहकर हमारे भीतर की सम्पदा हो जाता है !
    दीया हमारी आँखे बन जाता है, ज्योतित आँखे !

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