Monday, March 29, 2010

हर्फों की तल्ख़ तासीर से इंसा बदल जाएगा.....


सोचा न था के तू इस क़दर बदल जाएगा
अब के जो गया है तो लौट कर न आएगा
 
परवाज़ लौट आये पर इनका क्या भरोसा
कब तक ये रुकेंगे अब मौसम ही बताएगा

मेरे घर में रह रही है बेघरी कई दिनों से

जाए के अब रहे ये पर तमाशा तो हो जाएगा

सुलझे हुए दिखे हैं उलझे हुए से बन्दे
उलझे हुओं की सुलझन में तू उलझ जाएगा
  
सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
कभी अश्क पी के देखो सब पता चल जाएगा 

बस तंज कस दिया न सोचा फिर पलट के 
हर्फों की तल्ख़ तासीर से इंसा बदल जाएगा 



27 comments:

  1. सुलझे हुए दिखे हैं उलझे हुए से बन्दे
    उलझे हुवों की सुलझन में तू उलझ जाएगा

    सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
    अश्क पी की देखो सब पता चल जाएगा
    Ky baat hai harek panktiki...mai khamosh ho jati hun..

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  2. सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
    अश्क पी की देखो सब पता चल जाएगा
    --
    अश्क पीता रहा इश्क की राह में
    प्यास बुझती नहीं, सिलसिला चलता रहा

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  3. क्या कहें एक एक लफ्ज़ मन में उतर गया

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  4. bahut sunder adaji. bahut sunder.

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  5. सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
    अश्क पी की देखो सब पता चल जाएगा

    गजल का हरेक शेर बहुत ही शानदार है!

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  6. अब के जो गया है तो बदल जाएगा
    उलझे हुवों की सुलझन में उलझ जाएगा

    - 'अश्क पी की' को 'अश्क पी के' कीजिए।
    - 'हुवों' को 'हुअों' कीजिए।
    हर्फों की तल्ख़ तासीर से इंसा बदल जाते तो अाज संसार कुछ अौर होता।

    शेरों का प्रवाह दर्शनीय है।

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  7. अदा जी, बहुत शानदार रचना के लिये बधाई।
    चांद बहुत निर्मल है, इसीलिये एक धब्बा भी खटकता है, ’अश्क पी की’ में मात्रा ठीक नहीं है, खटक रही है। हालांकि गिरिजेश जी पहले ही इंगित कर चुके हैं, पर टोकाटाकी से मैं भी नहीं बाज आ पा रहा हूं।
    धब्बा अगर है तो हटाने में ही अच्छा है।
    आभार

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  8. सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
    अश्क पी के देखो सब पता चल जाएगा

    ha.n kabhi socha hi nahi ki kitni similarity hai dono ke paani me...aakhir hai to dono hi khare...

    बस तंज कस दिया न सोचा फिर पलट के
    हर्फों की तल्ख़ तासीर से इंसा बदल जाएगा

    jo juba pe aag rakhte he
    vo socha nahi karte...
    talkh mijaji wale insa
    insa ki kadr nahi karte..

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  9. गजब कहानी लिख दी टूटे हुए दिल की इस ग़ज़ल में आपने

    मुझे एक शेर समझ नहीं आया

    समझा देंगे तो बहुत अच्छा लगेगा

    ये वाला शेर



    मेरे घर में रह रही है बेघरी कई दिनों से
    जायेगी या रहेगी तमाशा तो हो जाएगा

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  10. दिल और दिमाग दोनों पर असर कर गयी...
    .
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  11. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .....

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  12. यशवंत जी,
    बेघरी का अर्थ है ..बिना घर-बार के ..
    मैं घर में होते हुए भी बेघर हूँ....
    और घर में बेघर होना ही अपने आप में एक तमाशा है...

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  13. di aur kya boloon.. yahi kah sakta hoon ki sari samvednayen likh daali hain

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  14. देख तेरे इनसान की हालत क्या हो गई भगवान,
    कितना बदल गया इनसान, कितना बदल गया इनसान
    सूरज न बदला, चंदा न बदला, न बदला रे आसमान,
    कितना बदल गया इनसान, कितना बदल गया इनसान....

    जय हिंद...

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  15. बस तंज कस दिया न सोचा फिर पलट के
    हर्फों की तल्ख़ तासीर से इंसा बदल जाएगा ...

    वाह ...
    एक एक शेर मुंह बोल रहा है ..
    जाने कितने कालेजों को घायल कर जाएगा ...
    लौटेगा एक दिन वो घर भी जब खुद फैसला कर पायेगा ...
    बहुत बढ़िया ...
    बहुत ही बढ़िया ...!!

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  16. सिर्फ़ एक शब्द कहुंगा "नायाब"

    रामराम

    -ताऊ मदारी एंड कंपनी

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  17. achchaa likhaa hai.....

    wo aur baat ke kai khtke hain...

    par jaane dijiye...

    ab kuchh nahin khatktaa.....

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  18. सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है...

    Ye khaas baat kahi hai.

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  19. क्‍या बात है? सारे ही रिकोर्ड तोडने हैं क्‍या? दिल को छूने वाली रचना, बधाई।

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  20. tum bas meri rooh apna kar dekho sab pata chal jayega

    -Shruti

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  21. खूबसूरत ग़ज़ल...तंज से बहुत कुछ बदल जाता है..

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  22. सागर की प्यास का तुम्हें इल्म ही कहाँ है
    तुम अश्क पी के देखो सब पता चल जाएगा...
    hmmm pata chal gaya....

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  23. अब के जो गया है तो बदल जाएगा
    उलझे हुवों की सुलझन में उलझ जाएगा ...
    क्या बात है जी.

    धन्यवाद

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