Friday, March 12, 2010

मैं हूँ न !!!!


मैंने  फिर, अपने वजूद को,  झाडा, पोंछा, उठाया दीवार पर टंगे, टुकडों में बंटें आईने में खुद को कई टुकडों में पाया....लेकिन समेट लिए हैं सभी टुकड़े और पंख बना लिए हैं रोक सको तो रोक लो....ये मैं चली जूऊऊऊउSSSSSS
हाँ नहीं तो....!!


आज जो भी मैं कहने जा रही हूँ, बहुत संभव है आप अपने-अपने घरों में ऐसा ही कुछ करते हैं.....ये आलेख बस मैं आपको याद दिलाने के लिए लिख रही हूँ....अगर आप सचमुच ऐसा ही करते हैं फिर धन्यवाद स्वीकार कीजिये मेरा...

किसी एक महिला के साथ जुड़ी मात्र मातृत्व अथवा अर्धांगिनी की भूमिका को आज की नारी ने अपने संबल से असत्य सिद्ध कर दिया है, नारी सिर्फ़ माँ, बहन, पत्नी, पुत्री नहीं इससे भी ज्यादा बहुत कुछ है, आज के इस युग में न सिर्फ वो पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रही है, अपितु कई क्षेत्रों में उसने पुरुषों से भी बाज़ी मार ली है, निःसंदेह आज की नारी न तो अबला रही न ही पुरानी विचारधारा के अनुसार पुरुषों के पाँव की जूती....

अधिकतर, निम्न-माध्यम वर्गीय या माध्यम-वर्गीय परवारों में तो पुरुषों ने महिलाओं को प्रोत्साहन देने हेतु नौकरी करने के लिए प्रेरित किया है अथवा स्वार्थ या मजबूरी के लिए महिलाओं को कामकाजी होने के लिए बाध्य किया है..
 

तुलनात्मक दृष्टि से अगर विचार करें तो हम देखते हैं कि आज के युग में नारी पुरुष की अपेक्षा कई क्षेत्र में, अधिक कुशल, दूरदर्शी, परिश्रमी एवं ईमानदार साबित हो रही है, तो फिर दोनों ही क्षेत्रों में उसकी सफलताओं एवं उपलब्धियों को कैसे नकारा जा सकता है ?? अगर आप अपने घरों में या आस-पास देखेंगे तो पायेंगे कि महिलाएं बड़ी मुस्तैदी से दोनों ही कार्य क्षेत्रों में अर्थात घर तथा बाहर ,  फिर चाहे वह दफ्तर, स्कूल, अस्पताल इत्यादि कोई भी जगह हो, में सफलता पूर्वक काम कर रही हैं, 





लेकिन अगर आप और अधिक सूक्ष्मता से विचार करेंगे तो पायेंगे कि नारियाँ, ख़ास करके माध्यम वर्गीय परिवारों में अपने घरेलू काम के बोझ तले पिस जातीं हैं,  संयुक्त परिवारों में तो ऐसी महिलाओं की स्थिति प्रायः और भी जटिल है , शारीरिक परिश्रम तो होता ही है, मानसिक तनाव को झेलना, भी उन्हें अपने स्वभाव में शामिल करना पड़ता है ... संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, नारी की दयनीय  स्थिति उस समय और दयनीय हो जाती है जब उसके अपने पति का अहम छोटे-छोटे घरेलू कामों को न करने की आदत या करने में शर्म अथवा लज्जा महसूस करने की प्रवृति या फिर 'लोग क्या कहेंगे' जैसी सोच , पत्नी के काम के बोझ से टकराती है... अधिकतर पति अपने समकक्ष या उच्च स्तर वाली पत्नी को सह पाने की विवशता भी दिखाते हैं...

घर और बाहर के पाटों के बीच में पिस रही महिला चाहती है कि, सदियों पुरानी पुरुष मानसिकता और रवैया अब बदल जाए लेकिन अगर, पुरुष मन में ऐसी धारणा बना ले कि अमुक काम सिर्फ पुरुष के हैं और अमुक काम सिर्फ स्त्री के तो समस्या का समाधान कठिन है




परिवर्तन तो संसार का नियम है, अगर महिलाओं में परिवर्तन आया है, उन्होंने घर की दहलीज से बाहर कदम रख कर काँधे से काँधा मिलाया है, घर की अर्थव्यवस्था में अपना खून-पसीना लगाया है, बेशक चाहे परिस्थियां इसका कारण रहीं हों,  पति की इच्छा हो या स्वयं का संतोष, तो क्या पुरुष को भी अपने आप में समयानुसार बदलाव नहीं लाना चाहिए ??

अगर पुरुष अधिक न भी करे कुछ ही छोटे-छोटे कामों को अपने हाथ में ले ले तो स्त्री (पत्नी) को बहुत राहत मिल सकती है, इस प्रकार थोड़ा-बहुत अपने साथी का साथ देने से न सिर्फ स्त्री इस दयनीय स्तिथि से उबरेगी अपितु उसके आत्मबल को भी बल मिलेगा, घर का वातावरण सौहार्दपूर्ण होगा ...याद रखिये जब एक-एक घर मुसुकुरायेगा तो समाज मुस्कुराएगा और तब ही राष्ट्र खिलखिलाएगा  ......आमीन ...!!

और अब बारी है मयंक की चित्रकारी की ...ये पता नहीं क्या बनाया है उसने वही जाने लेकिन बना है कुछ देखिये ज़रा... 



और अब गीत सुनिए ...
नैनों में बदरा छाये.....आवाज़ .वही...'अदा' की..