Thursday, March 11, 2010

एक कविता, एक ग़ज़ल और चित्र ...


रुख को कभी फूल कहा आँखों को कवँल कह देते हैं
जब जब भी दीदार किया हम यूँ ही ग़ज़ल कह देते हैं

वो परवाना लगता है कभी और कभी दीवाना सा
जल कर जब भी ख़ाक हुआ शमा की चुहल कह देते हैं

वो आके खड़े हो जाते हैं जब सादगी लिए उन आँखों में
वो पाक़ मुजस्सिम लगते हैं हम ताजमहल कह देते हैं

लगता तो था कि आज कहीं हम शायद नहीं उठ पायेंगे
सीने में वो जो दर्द उठा चलो उसको अजल कह देते हैं

क्या जाने कितने पत्थर सबने बरसाए हैं आज 'अदा'
मंदिर की जिन्हें पहचान नहीं वो रंग महल कह देते हैं

अजल=मौत


अब आज मयंक की चित्रकारी ...कैसी है ?




एक ग़ज़ल 'किसने कहा हुजूर के तेवर बदल गए'  
आवाज़ 'अदा', 
संगीत 'संतोष शैल' 
शायर जनाब रिफत सरोश 
कच्चा-पक्का है बुरा मत मानियेगा...