Saturday, March 6, 2010

गब्बर से कहना...... रामगढ़ वालों ने बेकार की बात सुनने को मना कर दिया है......


कल से ब्लॉग पर संस्कृति बचाओ आन्दोलन का तमाशा देख रही हूँ, हमेशा कि तरह निशाना 'नारी' है, कुछ लोग आधुनिकाओं पर थू-थू भी कर रहे हैं और कुछ  ज़बरदस्ती के समाज के मुख्तार बने बैठे हैं, 'आधुनिका' की परिभाषा क्या है ?? क्या कम कपड़े पहनने वाली नारियों को 'आधुनिका ' कहना चाहिए या फिर विचारों से जो आधुनिक हो उसे आधुनिका  कहते हैं, क्योंकि मैं ख़ुद को दूसरे नंबर का मानती हूँ और अधिकतर जिन्हें मैं जानती हूँ सभी इसी श्रेणी में आतीं हैं, पढना-लिखना, विवाह करना, घर और नौकरी करना अपने करिअर के प्रति सजग रहना, अपनी समझ से अपनी जिम्मेदारियों  को सही तरीके से निभाना,  और जो भी विरासत में संस्कृति, संस्कार मिले हैं उनसे अगली पीढ़ी को अवगत कराना...

ख़ैर, वो मेरी समझ थी , लेकिन आधुनिका  का अर्थ कुछ और भी माना जा रहा है, मसलन अपने फिगर को बरकरार रखने के लिए गर्भपात करनेवाली, या बच्चे को दूध नहीं पिलानेवाली महिलाएं आधुनिका हैं , इन महिलाओं को आप 'आत्मकेंद्रित' कह सकते हैं लेकिन आधुनिका नहीं, यहाँ मैं कहना चाहूंगी , अगर मैं मानसिक रूप से बिना तैयार हुए कभी गर्भवती हो गई और मुझे ऐसा लगा कि यह गर्भ मेरी जिम्मेदारियों, और मेरे केरिअर के आड़े आ रहा है तो मुझे गर्भपात कराने में कोई हिचक नहीं होगी,  क्योंकि शरीर से माँ बन जाना बड़ी बात नहीं है, मन से माँ बनना , और मातृत्व कि जिम्मेदारी सम्हालना ज्यादा जरूरी हैं, मन अगर इस बात के लिए तैयार नहीं है तो, शरीर स्वस्थ शिशु कैसे वहन करेगा..? और अगर मेरे इस कदम के लिए मुझ पर कोई थू-थू करता है तो करता रहे, मुझे कोई कोफ़्त नहीं होगी, जहाँ तक बच्चों को दूध पिलाने कि बात है, तो इससे कभी पीछे नहीं हटी हूँ और यह मानती हूँ कि पीछे हटना भी नहीं चाहिए.... 

और अब जब भी नारी पर ऐसे इल्जाम लगाये जाएँ तो, कृपा करके अपने घर में और अपने आस-पास दो सौ घरों को देख लीजिये फिर बात कीजिये....मैं अपने कुछ परिजनों की बात करती हूँ, मेरे जानने वालों के घर में भी भ्रूण हत्या हुई है, तो इसलिए नहीं कि फिगर ख़राब हो जाएगा, कारण रहा कि अपने सीमित साधनों में इससे ज्यादा बच्चे नहीं पाल सकते थे, वैसे भी इस तरह के फैसले सिर्फ़ स्त्री ही नहीं लेती, ये दम्पति का फैसला होता है...आम तौर पर यही देखा गया है कि कन्या भ्रूण की हत्या का फैसला पुरुष ही करता है...कारण...या तो वो ख़ुद को कापुरुष समझता है....या फिर दहेज़ के झंझट से बचना चाहता है...तो फिर घूम फिर कर बात ...पुरुष पर ही आती है....

सीधी सी बात यह है कि हम नारियाँ दिमाग से इतनी भी पैदल नहीं हैं, कि अपना भला-बुरा, बच्चों की भलाई, समाज के लिए अच्छी सोच, संस्कारों को अपनाए रखना और अपनी संस्कृति को बचाना नहीं जानतीं हैं, हम किस बात में पुरुषों से कम हैं, चरित्र, बुद्धि, विद्वता, कला, व्यावहारिकता, साहस, दया, क्षमा, करुणा, परिश्रम, सहनशक्ति, विवेक या इंटेलिजेंस, सिवाय शारीरिक शौष्ठव के हम किसी भी नज़र से आपसे कम नहीं है....इसलिए आप अपना भोंपूँ बजाना बंद कीजिये, क्योंकि वो भी हम आपसे बेहतर बजा सकतीं हैं...
 
यहाँ मैं कुछ दोहरी मानसिकता की बात भी करना चाहूंगी, जब कोई नारी नज़र आती है तो लोग देखने से बाज नहीं आते,  जितनी मर्ज़ी अपनी नज़रों की क्षुधा शांत कर लेते हैं, उसके बाद उसी नारी पर सारा दोष मढ़ कर लौट आते हैं ....अंततोगत्वा दोष उसी नारी का होता है, कि उसने ख़ुद को क्यों सँवारा-सजाया, बेशक उस नारी ने यह काम ख़ुद के लिए ही क्यों न किया हो, अगर आप सचमुच ये सबकुछ नापसंद करना शुरू कर देवें, फिल्मों का बहिष्कार करें, जिनमें नग्नता सजा कर परोसी जाती  है, विज्ञापनों का बहिष्कार करें, पोस्टर्स  और पत्रिकाओं का बहिष्कार करें, जब कोई देखेगा ही नहीं तो फिर नारी भी ज़हमत ही नहीं करेगी, ऐसा कुछ भी करने की....  किसकी मज़ाल कि ऐसा कुछ भी कहीं  नज़र आ जाये, देख लीजिये तालेबान ने कर दिखाया है, आप भी कर सकते हैं, और आप ही करेंगे तो होगा...क्यूंकि ये जो कुछ भी किया जाता है, वो सिर्फ़ और सिर्फ़ पुरुष बाज़ार के लिए ही होता है, महिलाओं के लिए नहीं...


नारी को पतन की ओर ले जाने में पुरुषों का ही हाथ ज्यादातर होता है , बहुत कम नारियाँ होंगी जो ख़ुद गिरना चाहेंगी,  नारी शरीर आपको पसंद भी है, और नहीं पसंद भी है, कभी आपको वह ताज़ा सौन्दर्य लगता है ....आपको कोई बुराई नहीं लगती है, और अगले ही पल आप उसी को गलीज़ में तब्दील कर देते हैं, नारी के भूगोल पर कवितायें और आलेख लिखने की क्षमता भी पुरुषों में ही है ,  नारियाँ तो लिखती नहीं है अपनी तारीफ में कवितायें...जहाँ एक ओर नारियों के लिए न जाने कितने कसीदे पढ़े जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इनको हेय दृष्टि से देखना ....शायद इसे ही दोगलापन कहा जाता है .....
 
दूर क्यूँ जाना है, ब्लॉग जगत में ही एक खूबसूरत महिला कोई बहुत ही आम सी पोस्ट लिख कर जितनी टिप्पणी बटोर सकती है, क्या एक कम खूबसूरत परन्तु मेधावी महिला या एक बहुत ही  मेधावी पुरुष कर सकता है, हरगिज नहीं यह पक्षपात स्पष्ट रूप से दृष्टिगत है...कुछ अत्यंत सार्थक पोस्ट्स जो पुरुषों के हैं, गुमनामी के गर्द के नीचे दब कर ख़त्म हो जाते हैं....टिप्पणी तो दूर की बात है , कोई झाँकने भी नहीं जाता... कई उदाहरण दे सकती हूँ...
 
जिन अत्यधिक आधुनिक आत्मकेंद्रित महिलाओं की बात कही गई है, हम और आप कितनी ऐसी महिलाओं को जानते हैं भला ...
समाज की कितनी प्रतिशत महिलाएं हैं वो, और यकीन मानिए ऐसी महिलाएं हमेशा से रही हैं, ये कोई आज की बात नहीं है,  हाँ आबादी के अनुपात से उनमें कमी-बेसी होती रही है,  लेकिन अधिकाँश नारियाँ, एक सहज, सरल और सुसंस्कृत ज़िन्दगी जीती हैं,  मैं इस तरह के विरोध करने वालों से ही पूछती हूँ कि अपने ही घर को ही सोच कर देखें क्या ऐसी महिलाएं हैं, और अगर हैं तो उनकी संख्या क्या उन सुसंस्कृत महिलाओं से अधिक है ?? कुछ गिनी चुनी महिलाओं के लिए हर वक्त का ठोना अब हम नहीं सुनना चाहते हैं.....
कभी यह भी कहने कि कोशिश कीजिये कि महिलायें अच्छा काम भी कर रही हैं.....आज महिलाएं डाक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिक, अस्ट्रोनात सभी कुछ बन रही हैं, उनका कोई ज़िक्र नहीं होता, ये सब कुछ होकर भी घर-परिवार, तीज-त्यौहार, संस्कार मनाती हैं, सिर्फ़ संस्कृति की पूंगी बजाने से ही दुनिया चलेगी क्या, या फिर महिलाओं के त्याग, कोमल भावनाओं की इतनी आदत हो गई है कि पता ही नहीं चलता कितना कुछ अच्छा हो रहा है आस-पास... !!!!  


अब कृपा करके संस्कृति का ढकोसला बंद किया जाए...संस्कृति के नाम सुन-सुनकर अब उबकाई आने लगी है, अगर आपको हम इतने ही नाकाबिल लगते हैं, तो ले लीजिये न सारी जिम्मेदारी संस्कृति को बचाने की,  और जीने दीजिये नारी को अपने तरीके से, नारी को भी अब अपने लिए कुछ समय चाहिए नारी भी इतनी उलूल-जूलूल सुन कर थक गई है,

अगर संस्कृति का बोझ आप लोग इतना दुरूह बना देंगे, तो हमें आप माफ़ कीजिये, हम नहीं उठा सकते ये बोझ, और सच पूछिए तो ब्लॉग जगत में आकर ही मुझे पता चला कि, संस्कृति इतनी भारी है,  मैं 'अदा' जो कल थी आज वो नहीं रही, आप लोगों का धन्यवाद, मुझे सोचने पर मजबूर होना पड़ा और लगा कि मुझसे ये काम ज़बरदस्ती करवाया जा रहा है, ये भी लगा कि मैं क्यूँ करूँ ...आप क्यूँ नहीं, क्या मैंने संस्कृति को आगे ले जाने का ठेका लिया हुआ है, कोई ज़रुरत नहीं है, आपकी प्यारी संस्कृति को आप ही सम्हालिए, और यकीन मानिए, मुझ जैसी और भी बहुत होंगी जो ऐसा ही फैसला कर रही होंगी, आपने सही कहा है, यह विषवमन ही है...लीजिये कर दिया हमने ...कर लीजिये अब आप क्या करेंगे...हाँ नहीं तो...!!

43 comments:

  1. लम्बे समय से भीतर उबलता ज्वालामुखी आज फूट ही पड़ा ....
    जितना समय ये लोग नारी को संस्कृति आचार विचार समझाने में लगाते हैं उसका कुछ प्रतिशत भी खुद को समझने और सुधारने में लगा ले तो यह दुनिया नारियों के लिए खुली सांस लेने वाली जगह बन जाए ....जहाँ वे बिना भय के निर्द्वंद्व शांति से गुजर कर सके ..वर्ना तो हाल ये है कि देश की प्रथम पुलिस अधिकारी को भी समय समय पर विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है ....
    ये बिलकुल सही कहा है कि जो आप नहीं देखना चाहते ...मत देखिये ...बहिष्कार कीजिये ....फिर किसकी मजाल है जो आपको देखने पर मजबूर कर सकता है ....मगर जी भर के देख लेने के बाद ना दिखाने की बात तो ना कीजिये ...
    संस्कृति बचने की जिम्मेदारी सिर्फ नारी की नहीं है ...मगर फिर भी नारियां जी जान से इस कोशिश में जुटी हुई हैं ...कुछ मुट्ठी भर गैर जिम्मेदार महिलाओं के लिए पूरी नारी जाति की नियत पर प्रश्नचिंह लगाना क्या उचित है .... मुख्य प्रशासनिक पदों पर नियुक्त महिलाएं भी रीती- रिवाज व्रत -त्योहारों का पूरे उत्साह से पालन करती हैं ...इस मंशा के साथ कि आगे आने वाली पीढियां अपनी संस्कृति की पहचान से अनजान ना रहे ...
    इसलिए हे पुरुषों ....नारियां तो अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभा रही हैं ...आप इनकी चिंता ना करते हुई अपने आचार विचार पर अधिक ध्यान केन्द्रित करें ....

    बहुत अच्छी पोस्ट ...आपको इस रूप में बहुत कम लोगो ने देखा है ...अच्छा लग रहा है ...

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  2. विषय की सार्थकता के साथ शीर्षक का चयन कमाल का है. धन्यवाद. "विषवमन" नही यह भावनाओ का प्रवाह है.

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  3. Aapka aalekh bahut sarthak hai...Adhunik stri aur Atmakendrit stri me yah vibhed nitaant avshyak hai,yah baat samjh me aajane par bahas ka ant hi hojata hai ...aur sach bhi hai ki sanskrati ka nirmaan manav jaati ne kiya hai jisame stri purush dono hi barabar ke bhagidar hai koi ek nahi ....

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  4. इन महिलाओं को आप 'आत्मकेंद्रित' कह सकते हैं लेकिन आधुनिका नहीं,

    ekdam hamaare vichaar hain te...

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  5. जहाँ एक ओर नारियों के लिए न जाने कितने कसीदे पढ़े जाते हैं वहीं दूसरी तरफ इनको हेय दृष्टि से देखना ....शायद इसे ही दोगलापन कहा जाता है .....



    aisaa bhalaa koi kaise kar saktaa hai...???

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  6. जब कोई नारी नज़र आती है तो लोग देखने से बाज नहीं आते, जितनी मर्ज़ी अपनी नज़रों की क्षुधा शांत कर लेते हैं, उसके बाद उसी नारी पर सारा दोष मढ़ कर लौट आते हैं ....

    ji haan,

    ham bhi dekhte hain naari ko...lekin wiase nahin..jaise aapne likhaa hai...
    jaise aur log deklhte hain///

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  7. अदा जी..
    हमें नहीं मालूम के आपने किस ब्लॉग पर क्या पढ़ लिया .
    मगर आपको आज इस तरह परेशान देख कर नहीं रहा गया..
    इतनी परेशान आप कभी भी नहीं होती थीं....आपकी हर बात से सहमत हैं हम...बस एक बात खटक गयी....
    अदा जी,
    नारी को हम भी देखते हैं...और खूब तसल्ली से देखते हैं...अगर चेहरे में कुछ बात हो तो...

    फिर वो चाहे ५ साल कि बच्ची हो..चाहे १०० साल कि वृद्धा...
    प्लीज अदा जी ऐसे मत लिखिए...
    देखने देखने में बहुत फर्क होता है अदा जी....




    जितनी मर्ज़ी अपनी नज़रों की क्षुधा शांत कर लेते हैं, उसके बाद उसी नारी पर सारा दोष मढ़ कर लौट आते हैं ....

    प्लीज..ऐसे मत लिखिए...

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  8. बिन्दास शीर्षक, मौजूं फोटो और रोचक लेख! जय हो!

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  9. इसे विषवमन तो कतई नहीं माना जा सकता...

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  10. शुक्र है परवरदिगार, मेरे ब्लॉग पर अदा जी झांकने आ जाती हैं...

    एक बात और, आपने कभी गौर किया है काठ के उल्लू ही क्यों होते हैं...कभी काठ की उल्लन के बारे में किसी को कुछ कहते सुना है...

    ऐसा ही एक काठ का उल्लू कुंए के पास खड़ा बड़ी देर से गिनती गिन रहा था 36,36,36...किसी मेरे जैसे सिरफिरे ने उसे समझाने की कोशिश करी कि जनाब आगे भी तो बढ़िए, 36 पर ही अटके रहेंगे क्या...अगले दृश्य में मैं गायब हो चुका था और काठ के उल्लू महाराज गिन रहे थे...37, 37, 37...

    जय हिंद...

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  11. कोई बताये क्या वह बाजारवाद नही था जिसने नारी को चिथड़े से तन ढँक कर स्टेज पर खड़ा कर दिया ..जिससे की लोग आँखें सेंक सके, पर आश्चर्य की इसके लिए भी नारी दोषी है. उसे नगर वधु बनाया ..जी और घर भरने तक बेचते -नोचते रहे पर फिर भी नारी दोषी है.
    आज एक पोस्ट में अजीब बात पढ़ी मैंने जिसमे "वैज्ञानिक तरीके" से यह बताया गया था की कैसे पहले एक महिला को नग्न होकर काम करने को मजबूर किया गया फिर बाकायदा उन्हें वहां उपस्थित पुरुषों से बचने की ट्रेनिंग दी गई.वाह!!

    मुझे इन लोगों से कोई समस्या नही है समस्या अपने उन मित्रों से हैं जो वक्त रहते इन्हें पहचान नही पाते ... अच्छा हुआ आपने जल्दी समझ लिया.

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  12. हर बुरे कार्य में स्त्री को गलत ठहराना, आधुनिक पुरुष कतई नहीं हो सकते . और यह कहाँ लिखा है कि आधुनिक स्त्री अपना कर्त्तव्य नहीं निभा सकती, अपनी संस्कृति को नहीं बचा सकती . हाँ , अपवाद हर जगह है . कहने को लोग आधुनिक बनते हैं पर अभी भी औरत को लोग अबला बनाकर ही रखना चाहते हैं . बहुत अच्छा आलेख है आपका अदा जी , शीर्षक तो धांसू है ही . आभार !!

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  13. अदाजी
    सादर अभिवादन,
    भारतीय समाज में भारतीय संस्कृति के अनुरूप संस्कारवान महिलाए सदा आदर की पात्र रही हैं .और शक्तिपुन्ज का प्रतीक मानी जाती है और मानी और पूजी जाती रहेंगी . मगर जो भारतीय संस्कृति के अनुरूप मर्यादित आचारण नहीं करती हैं तो स्वाभाविक है तो समाज में उनका विरोध करने वाले भी होते है . ... और मेरा मानना है की सभी महिलाए एक सी नहीं होती है . ब्लागजगत में पुरुषो और महिलाओं को अलग थलग करना मै उचित नहीं समझता हूँ और यहाँ सभी को बराबरी का दर्जा प्राप्त है .

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  14. असल में अदा जी ज्‍यों संस्‍कृति की बात करते हैं वे संस्‍कृति शब्‍द का अर्थ ही नहीं समझते। मैं दावे के साथ कह रही हूँ कि इस बात पर लोगों के विचार मांग लें कि संस्‍कृति क्‍या है, तो लोग बगले झांकने लग जाएंगे। संस्‍कृति मानसिक उन्‍नयन का प्रतीक है जो हमारे समाज के समग्र सोच का प्रतिफल है। हम अपनी सभ्‍यता को कैसे संरक्षित रखे इसके लिए संस्‍कृति है। भारतीय संस्‍कृति कहती है कि इस चराचर जगत के संरक्षण के लिए मनुष्‍य को अपना मानसिक उन्‍नयन करना चाहिए। सम्‍पूर्ण समाज का उत्तरदायित्‍व है कि वह सृष्टि का उन्‍नयन करे। पुरुष में काम प्रधान होता है और महिला में ममत्‍व। काम को अवगुण माना है जबकि ममत्‍व को गुण। इसलिए ही प्राचीन काल से पुरुष को संस्‍कारित करने का प्रयास किया जाता रहा है। लेकिन दुर्भाग्‍य से वर्तमान काल में पुरुष को पूर्ण असंस्‍कारी बनाया जा रहा है और साथ में यह प्रयास किया जा रहा है कि महिला में भी ममत्‍व की जगह काम की प्रधानता हो जाए। आज आवश्‍यकता है पुरुष को संस्‍कारित करने की। लेकिन उल्‍टा हो रहा है पुरुष सदैव ही उपदेशक की भूमिका में रहते हैं और वे अपना सारा दायित्‍व महिला पर डाल देना चाहते हैं। जैसे एक पति अपने पूरे परिवार का उत्तरदायित्‍व अपनी पत्‍नी पर डाल देता है। इसलिए महिला को भी आज उपदेशक की भूमिका में आना होगा और उसे बताना होगा कि पुरुष को क्‍या करना चाहिए। आपकी पोस्‍ट बहुत अच्‍छी है, इसलिए ही मैं भी इतना लिख गयी हूँ। ऐसी ही उर्जा बनाए रखे।

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  15. ada ji
    aapne bilkul sarth lekh likha hai aaj ke waqt mein purushon ko apna nazariya badaln eki jaroorat hai aur apni mansikata.........kyunki ye sirf soch ka hi natija hai varna aaj nari is mukaampar nhi hoti.........purush samaj ke dohre mapdandon ka shika rnari hi banti hai...........aur sara shor sirf ek din ke liye macha hua hai........jaise hi wo din gujra sab bhool jayenge.........kaun nari ko aage badhte dekhna chahta hai ye to uska khud ka hosla hai jo wo purush ke kadam se kadam mila kar har shetra mein aage badh rahi hai .......sirf kuch logon ki choti soch use aage badhne se nhi rok sakti.........aur har nari ko ek hi palde mein tolne wali mansikata ko sabko badalna padega ........samaj ki 90%mahilayein aaj bhi apni sanskriti aur sabhyata ko nhi bhuli hain sirf kuch gini chuni harkaton ki vajah se sabko badnaam karna thik nahi hai aur is mansikta ko ab samaj ko bhi badalna padega.

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  16. इनफैक्ट सोसाइटी नहीं चाहती कि स्त्री आजाद हो. वो जब भी कोशिश करती है तब तब सोसाइटी उसे यह अहसास कराती है कि वो कमजोर है, पुरुष से इनफीरियर है. और उसके लिये मुहावरे गढ़ती है, उनमें से एक है आधुनिका और उस पर थू-थू.
    इतने प्रयासों के बाद भे अभी तक तो स्त्री की पूरी इनर्जी लग रही है, अपने खिलाफ रोंग्स को रोकने में, राइटस का दिन अभी आया ही नहीं. जो लोग कहते हैं कि स्त्री को आजादी है उनके लिये आपका चित्र जिसमें होंटो पर पिन है बहुत कुछ कहता है. रेस्ट्रिक्संस के साथ आजादी. बड़ी अजीब आजादी है ये, जैसे कोई कहे कि बुलबुल पिंजरे में आजादी से घूम फिर सकती है. मुझे लगता है बंधन टूटे नहीं हैं अभी. आजादी अभी केवल स्किन डीप है.
    लेकिन आपकी पोस्ट देखकर लगा कि स्त्री जाग रही है. आदर.

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  17. इन संस्कृति के स्वः नामित रक्षकों से कई बार पूछने का मन हुआ,'क्या कभी आपने आधुनिकता की सही परिभाषा समझी है?'....'कभी सही मायने में आधुनिक नारी से परिचय हुआ है आपका?'...उनके लिए,राखी सावंत और सम्भावना सेठ या फिल्म की कुछ तारिकाएँ ही आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करती हैं.इन्हें नहीं पता वे भी शॉट देकर आने के बाद शालीन परिधान धारण कर लेती हैं.पर ये लोग तो उनकी चंद तस्वीरें देख कर ही सबको संस्कृति का पाठ पढ़ाने में लगे हुए हैं.

    हमलोग रहते हैं,आधुनिक नारियों के बीच और उनकी कैरियर,परिवार,रिश्तेदार,त्योहार,बच्चे सबको संभालने की ज़द्दोज़हद से रोज रु-ब-रु होते हैं. इन सबके बीच उनलोगों ने थोड़ा अपना भी अस्तित्व बचा रखा है.बस यही इन लोगों की परेशानी का कारण है कि उसने अपना अस्तित्व पूरी तरह मिटा क्यूँ नहीं दिया.वह सिर्फ,किसी की बेटी,माँ,पत्नी,बहन ही हो सकती है.एक स्वतंत्र सोच रखने वाली,अपने मन का कहने,पहनने,खाने वाली उच्च ग्रीवा और सधी चाल वाली महिला नहीं. मन होता है एक एक की जीवनी और दिनचर्या का वर्णन लिख दूँ.पर पता है,ये उसे पढने का कष्ट नहीं करेंगे.इन्हें चंद तारिकाओं में ही बस दिलचस्पी है.

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  18. चर्चा पर आपके विचार पसंद आये और यहाँ भी आपने खूब लिखा.. आई एम् इम्प्रेस्ड.!

    सोचता हु जब आप इतना कुछ समझती है तो फिर उलझ क्यों जाती है.. मैंने आपके ब्लॉग पर इस से पहले भी कई विचारोतेजक पोस्ट देखी है जिनकी मैं प्रसंशा करता हूँ.. पर अंत में आपको भी फिर से वही पता हूँ.. क्या कारण है समझ नहीं पा रहा हूँ.. थोडा और वक़्त लेता हूँ..

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  19. अदा जी सच में अब कान पाक चुके हैं ये सुन सुन कर अब तो कुछ कहने का मन भी नहीं करता ....वाकई यही ठीक है ....हाँ हम ऐसे ही हैं .नहीं हैं सुसंस्कृत..कर लो जो करना है.....कुछ समय पहले एक औरत के संघर्ष और आत्मसम्मान पर मैने एक कविता लिखी थी.(http://shikhakriti.blogspot.com/2009/08/sauda.html) ..उस पर भी समाज के ठेके दार आ गए थे अनैतिकवाद का झंडा लेकर...खुद तो हर अनैतिक काम सीना फुला कर करेंगे कि ये तो मर्दानगी कि निशानी है ..और सस्कृति सिर्फ हम संभाले..कुछ नहीं हो सकता इनका चिल्लाने दीजिये .

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  20. aapki ada hi nirali hai har baat ka jawab nahi ,naari man par khoob likha hai ,badhiya .

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  21. ""मुझ जैसी और भी बहुत होंगी जो ऐसा ही फैसला कर रही होंगी, आपने सही कहा है यह विषवमन ही है...लीजिये कर दिया हमने ...कर लीजिये अब आप क्या करेंगे...हाँ नहीं तो...!!""
    लेखन कौशल के दृष्टि से बेजोड़ ......
    लेकिन.....
    क्या अदा जी ,आप भी....

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  22. इस लेख ने हर भारतीय नारी के हृदय की बात कह दी है....जिन लोगों को आज की नारी से भारतीय संस्कृति पर धब्बा लगाने का डर ही मैं बस उनसे यही पूछना चाहती हूँ की आखिर वो भारतीय संस्कृति की क्या परिभाषा गढते हैं?
    आपके लेखन में ऐसा हो जोश बना रहे और कलम सार्थक मुद्दुओं को उठाये...यही शुभकामना है...हाँ शीर्षक बहुत अच्छा लगा...:)

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  23. बड़े ही आधारभूत प्रश्न उठाये हैं और उन पर सार्थक बहस भी छेड़ी है । नारी क्या चाहती है, यह मेरे लिये सदैव ही गूढ़ रहस्य का विषय रहा है । कुछ निष्कर्ष निकले तो पोस्ट में प्रकाशित अवश्य करें ।

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  24. क्या सोच के आये थे कि ठाकुर बहुत खुस होगा...

    मजा आ गया शीर्षक में तो..

    और आगे के विचारों का तो कहना ही क्या, कटु सत्य है... पर...

    मैं कुछ नहीं बोलूँगा, क्योंकि हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है :)

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  25. इतनी प्रत्यंचा चढ़ी है कि क्या कहें ! मर्द शर्माने लगे मर्द होने पर !
    पर आपकी बातों में सत्य है , जिसे एक स्त्री ही लिख सकती है ..
    साहस के साथ स्वीकार का भाव भी सराहनीय है आपका ...
    मर्दों के लिए आपने जो कहा वह इन पंक्तियों में है ---
    '' सच बात मान लो
    चेहरे पे धुल है ,
    इल्जाम आईने पे
    लगाना फिजूल है ! ''
    ( अज्ञात कवि )
    ..................................... अब तो लोग सुधरें ! आमीन !!!

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  26. आपका लिखा पढना अच्‍छा लगता है .. पर

    कन्या भ्रूण की हत्या का फैसला पुरुष ही करता है

    सारा इल्‍जाम पुरूषों पर मत लगाएं .. मैने अधिकांश जगहों पर महिलाओं को ही इसके लिए जिम्‍मेदार पाया है !!

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  27. sangeeta ji,
    shayad aapne theek se nahi padha, maine koi dosh nahi lagaya hai purushon par,

    इस तरह के फैसले सिर्फ़ स्त्री ही नहीं लेती, ये दम्पति का फैसला होता है...आम तौर पर यही देखा गया है कि कन्या भ्रूण की हत्या का फैसला पुरुष ही करता है...कारण...या तो वो ख़ुद को कापुरुष समझता है....या फिर दहेज़ के झंझट से बचना चाहता है...

    maine 'aam taur par' kaha hai aur yahi maine bhi dekha hai..

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  28. Di.. sheershak padhkar to main kuchh aur hi samjha.. laga kisi aur ke khilaaf bigul hai..
    aapke vichaar swagat yogya hain aur sachchaai ko simete hain.. :)
    Jai Hind...

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  29. Girijesh ji ne kaha email dwaara :

    एक बड़ी टिप्पणी तो स्वाहा हो गई । दुबारा प्रयास करता हूँ।
    गब्बर कौन है ?
    शोले की बसंती याद आई, धन्नो याद आई, मौसी याद आई और विधवा याद आई। आर्थिक रूप से स्वतंत्र बसंती भी विकृत दस्युओं को नचनिया ही दिखती है। नाचना चाहिए चाहे मनमर्जी चाहे जबरदस्ती ।..बीहड़ वर्तमान है - नगर, महानगर, गाँव, मुहल्ले, संस्थाएँ हर जगह ..
    आप का आक्रोश जायज है । सोच की संकीर्णता और विकृति पर ऐसे प्रहार होते रहने चाहिए। ..रही बात नारी को देखने की तो विपरीत लिंगी सौन्दर्य को देखना और सराहना प्राकृतिक है- नारी के लिए भी और पुरुष के लिए भी। समस्या वहाँ आती है जहाँ नारी को वस्तु या कमोडिटी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, देखा जाता है। तब नारी सौन्दर्य 'भूगोल' हो जाता है।
    समाज पुरुषप्रधान है और धीरे धीरे बदल रहा है । आज गाँव की लड़कियाँ भी बाहर छात्रावासों में रह रही हैं, पढ़ रही हैं और उनके 'अनपढ़ पिछड़े जाहिल' बाप जो पुरुष भी हैं, यह निर्णय लेने में आगे रहे हैं। ..अतिवादी, प्रतिक्रियावादी तत्व हर लिंग में हैं लेकिन अल्पसंख्यक हैं । उनको लेकर साधारणीकरण कर पूरी जाति को एक्के लउरी हाँकना उचित नहीं है।
    . संतान वहन करने और जननी होने के लिए प्रकृति ने स्त्री को कुछ अतिरिक्त और बहुत सुन्दर दिया है - उसकी जिम्मेदारियाँ इस मामले में अधिक हैं। पुरुष की जिम्मेदारियाँ किन्हीं और मामलों में अधिक है। कहीं पुरुष बीस है तो कहीं नारी। सभ्यता का तकाजा है कि दोनों उन्हें निबाहें, एक दूसरे के प्रति सम्मान रखें और उच्छृंखलता से बचें। .. विषवमन वाली बात समझ में नहीं आई। सम्भवत: आजकल ब्लॉग कम पढ़ने के कारण सन्दर्भ नहीं पता चल पाया।

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  30. सास ससुर के जमाने में तो एक स्‍त्री कभी कभी लाचार होती थी .. पर आज एकल परिवारों में भी पति के साथ बाकी सब निर्णय करनेवाली स्‍त्री कन्‍या भ्रूण हत्‍या का विरोध नहीं करती है .. कहीं न कहीं पुत्र के प्रति उसका मोह बना होता है .. इसके माध्‍यम से मैं ये कहना चाह रही हूं .. कि यदि हम महिलाएं अपने को महत्‍व दें .. एक दूसरे के दुख तकलीफ को समझें .. तो महिलाओं की दशा अवश्‍य सुधर सकती है .. समाज में इसका अभाव मुझे साफ दिखाई पडता है !!

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  31. एक विचार जो सिर्फ और सिर्फ स्वतंत्रता चाहती है, पुरुश्वाद से इतर पुरुष डम्ब को चुनौती.
    स्वतंत्रता के लिए पुरुष या स्त्री नहीं अपितु वैचारिक व्यावहारिकता की आवश्यकता पर शानदार लेख .
    लेख से सहमति है

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  32. कुश जी,
    "सोचता हु जब आप इतना कुछ समझती है तो फिर उलझ क्यों जाती है.. मैंने आपके ब्लॉग पर इस से पहले भी कई विचारोतेजक पोस्ट देखी है जिनकी मैं प्रसंशा करता हूँ.. पर अंत में आपको भी फिर से वही पता हूँ.. क्या कारण है समझ नहीं पा रहा हूँ.. थोडा और वक़्त लेता हूँ.."

    ये "वही" क्या है ??

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  33. गब्बर से किसने कहा ? ... हाहा हा

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  34. अदा दी आज तो कमाल का लिखा है....लिखने को बहुत कुछ है..लेकिन सब मेरी फीलीन्ग्स भी बाकी की तीप्पानियो में आ चुकी है...लेकिन महेंद्र मिश्र जी की बात पर जरूर कुछ कहना चाहुंगी...

    भारतीय संस्कृती में चाहे आदर का पात्र बनाया...लेकिन बस आदर का पात्र तक ही सीमित रखा...जब आदर देने की बात आई तो अनादर का पात्र भी सबसे ज्यादा स्त्री ही बनाई गयी...और दुसरी बात जो उन्होने लिखी...."मर्यादित आचारण नहीं करती हैं तो स्वाभाविक है तो समाज में उनका विरोध करने वाले भी होते है " में पूछना चाहती हू की क्या समाज में सिर्फ स्त्री के विरोध के लिए ही क्यू खडे हो जाते है? क्या पुरुष कोई अमर्यादित आचरण नही करता...? और पुरुष के लिए कोई विरोध क्यू नही खडा होता???? हा ये बात अलग हे की अपवाद हर जगह होते है...इसी तऱ्ह कुछ महिलाये भी ऐसी होती है...परंतु उसके लिए पूरी स्त्री जाती को तो गळत नही ठेहराया जा सकता.

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  35. nahin..
    kabhi nahin.........


    stri jaat ko koi bhi apmaanit nahi kar saktaa.....


    jaise koi hussain kisi bhaarat maan ko nahin kar saktaa..apmaanit..

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  36. सीधी सी बात यह है कि हम नारियाँ दिमाग से इतनी भी पैदल नहीं हैं कि
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    दूर क्यूँ जाना है, ब्लॉग जगत में ही एक खूबसूरत महिला कोई बहुत ही आम सी पोस्ट लिख कर जितनी टिप्पणी बटोर सकती है क्या एक कम खूबसूरत परन्तु मेधावी महिला या एक बहुत ही मेधावी पुरुष कर सकता है, हरगिज नहीं यह पक्षपात स्पष्ट रूप से दृष्टिगत है...कुछ अत्यंत सार्थक पोस्ट्स जो पुरुषों के हैं गुमनामी के गर्द के नीचे दब कर ख़त्म हो जाते हैं....टिप्पणी तो दूर की बात है , कोई झाँकने भी नहीं जाता... कई उदाहरण दे सकती हूँ...
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    अब कृपा करके संस्कृति का ढकोसला बंद किया जाए ...संस्कृति के नाम सुन-सुनकर अब उबकाई आने लगी है, अगर आपको हम इतने ही नाकाबिल लगते हैं तो ले लीजिये न सारी जिम्मेदारी संस्कृति को बचाने की, और जीने दीजिये नारी को अपने तरीके से, नारी को भी अब अपने लिए कुछ समय चाहिए नारी भी इतनी उलूल-जूलूल सुन कर थक गई है,
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    आपकी पोस्ट के कुछ हिस्से दे रहे हैं................ पहले में आपत्ति है.............इतनी भी पैदल नहीं तो बताएं कि कितनी पैदल?
    बाकी तो आपने बहुत ही सही लिखा है, अब ऊबन सी होने लगी है....कभी लगता है कि समाज में स्त्री विमर्श के अलावा और कुछ नहीं है क्या?
    सुन्दर पोस्ट.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  37. अफसोस

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  38. laajvaab,sundar abhivyakti.

    विकास पाण्डेय
    www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

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  39. यह विमर्श अभी थमा नहीं है । सच है कुछ लोग अभी भी सब कुछ उसी चश्मे से देख रहे है जिससे उनके पुरखे देखते आये हैं । ऐसे लोगों के लिये आपका यह आक्रोश जायज़ है ।

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  40. vaise jisne vo lekh likha tha usne koi comment nhi kia kya baat ha.....
    mene bhi vo lekh pada tha aur bohot zabardast gussa bhi aya tha... ada ji ap hi ki trha mene bhi kafi kuch sawal uthaye the...par sach me vo sudharne wala nhi ha....

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  41. एक बेहद अच्छी पोस्ट को पहले पढ़ तो लिया था मगर कुछ कहने का वक्त नही मिला था..सो आज आया हूँ...आधुनिकता की हमारी परिभाषा हर क्षेत्र मे हमारी सुविधा और स्वार्थ के हिसाम से बदलती रहती है..आज बढ़ते भौतिकतावाद के युग मे जब पैसे की जरूरत और चाहत दोनो बढ़ी है..इसी लालच मे कामकाजी बहू/पत्नी अब परिवारों कीए प्राथमिकता बनती जा रही है..मगर बात जब उसके प्रति अपने दायित्वों की आती है तो हम कन्नी काट जाते हैं..पैरों को ढकने को कम पड़ती चादर को बढ़ाने के लिये हम लोग चाहते तो हैं कि बीवियाँ भी पैसे कमा कर लायें और घर के बाहर उसे इज्जत भी देते हैं..मगर फिर उम्मद करते हैं कि वही कामकाजी बहू ऑफ़िस के बाद घर के अंदर छे गज की साड़ी का घूँघट सिर पर डाल कर घर का सारा काम अकेले कर डाले...यही वजह है कि मुझे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद महानगरों मे काम करने वाली नारी जो एक परिवार का हिस्सा है..और जिसको सुबह ओफ़िस निकलने से पहले घर भर का सारा काम, बचों को स्कूल के लिये तैयार करना और ’उनको’ अपने ओफ़िस भेज कर ही खुद निकलना होता है..उसकी हालत किसी गांव की अनपढ़ महिला से कोई खास बेहतर नही लगती..... समझ नही आता कि अगर अम्बानी जैसों की बीवियाँ अगर किचन मे जा कर काम करती हैं तो यह उनके संस्कारपूर्ण होने का सबूत है..मगर इंदिरा नुइयों जैसियों के पति अगर घर का कोई काम करते हैं तो वे बीवी के गुलाम हो जाते हैं..’डबल स्टैंडर्ड्स’ हमारे नैतिकतावादी समाज की सोच का हिस्सा है..और वैचारिक आधुनिकता सोच के रास्ते घर के अंदर आती है..बाह्याडम्बरों के द्वारा नही....वैसे ही जैसे तिलक लगाने से हृदय निर्मल नही हो जाता...
    एक सटीक पोस्ट!!!

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  42. i was late in reading this post but it says a lot and coming from you it should be a wake up call for some bloggers

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