Tuesday, March 9, 2010

मैं गर न टूटूं ....


तुम्हारी चोट से
मेरा दरकना लाज़मी तो नहीं,
मगर
कुछ बातें मेरे इख्तियार में भी नहीं
मुझे बार-बार तोड़ना,
फिर जोड़ना,
प्रिय शगल है तुम्हारा,
स्वामित्व का बोध कराता है
तुम सिर्फ मेरी हो !
पुख्ता 
अहसास दिलाता है 
मैं तुम्हें खुश होने देती हूँ,
इसलिए नहीं, कि मैं निर्बल हूँ
अपितु इसलिए कि,
मैं गर न टूटूं
तो तुम बिखर जाओगे
ख़ुद को अपने चारों ओर पाओगे 
समेट सकती हूँ मैं तुम्हें,
लेकिन
तुम्हारे हर टुकड़े में
दंभ चस्पा है
जिसमें गोंद भी तो नहीं होती.....

और अब मयंक की चित्रकारी ....बताइयेगा ज़रा कैसी लगी...मेरा राजा बेटा है ना..उसकी तारीफ सुनना मुझे अच्छा लगता है....:):)