व्यवस्था के मोहरे
व्यवस्था की आड़ में
व्यवस्था के सहारे
नित नई व्यवस्थित चाल
चल रहे हैं
और भेंट चढ़ जाते हैं
कितने ही व्यवस्थित
जीवन,
समझ कहाँ पाते
इस व्यवस्था को
जो सिर्फ झूठ के
फर्श पर खड़ी है
न जाने कितने छेद लिए हुए
वो भी बिना पैरों के
समझने से पहले ही
ये फर्श बन
जाती है,
और तब तुम सिर्फ
अपना सर ही पटक सकते हो......
मयंक की चित्रकारी....
व्यवस्था के सहारे
नित नई व्यवस्थित चाल
चल रहे हैं
और भेंट चढ़ जाते हैं
कितने ही व्यवस्थित
जीवन,
समझ कहाँ पाते
इस व्यवस्था को
जो सिर्फ झूठ के
फर्श पर खड़ी है
न जाने कितने छेद लिए हुए
वो भी बिना पैरों के
समझने से पहले ही
ये फर्श बन
जाती है,
और तब तुम सिर्फ
अपना सर ही पटक सकते हो......
मयंक की चित्रकारी....


