Friday, March 19, 2010

और मैं..... ...




छन छन्न छन
मेरी पायल बोलती जाती 
और
तुम मुदित हुए जाते हो
आँगन में अंगना
बनी मैं
डोल रही हूँ
पायल की झंकार
रस घोल रही है
हक़ है मेरी पायल
को बोलने का
पर मुझे नहीं !!
तुम क्यों 
मुझे बोलने दोगे 
पर
होठ मेरे अब और 
प्रतीक्षा नहीं करेंगे 
छटपटाते हुए 
शब्द अब कहाँ 
रुकेंगे
भाव भी आ रहे हैं बाहर
वाणी की सांकल
अब खुल ही जायेगी
किनारों में बंधी
नहीं रह पाएगी 
कगार पर आ गई है 
मेरी सोच
पायल की रुनझुन
ने चिटकनी खोल दी 
दौड़ गए हैं बाहर
मेरे भी कुछ 
धधकते से विचार 
निर्वस्त्र होकर 
अब नहीं पहनेंगे
वो तुम्हारे 
चुने हुए कपड़े
पहन भी लें तो क्या
तुम तो उन्हें निर्वस्त्र ही देखते हो ..!!


मयंक कि चित्रकारी :