Friday, February 12, 2010

पर वो लड़की ?



माँ -
ने समझाया,
बचपन छूट चुका है
ये भी बताया
बड़ी हो गयी हो,
हाथ पांव समेट कर
ढंग से रहा करो,
इस बात को बार बार
भेजे में घुसाया
उसने आँखें गोल गोल घुमाई
अंगूठा दिखया, जीभ निकाली
और पैर पटक कर बैठ गयी



सास-
ने फटकारा
कुलच्छिनी बताया
भाग फूट जाने का
अंदेशा लगाया
छाती पर मूँग दलने
की भीषण पीड़ा से भी
बार बार उसको
अवगत कराया
उसने आँखे झुका ली
मन ही मन गोल गोल घुमाई
मन ही मन अंगूठा दिखाया
मन ही मन जीभ निकाली
पैर पटक कर,
मन ही मन बैठ गयी
बेटी से बहू तक की
सारी सीढियाँ
मैं तो तय कर गयी
पर वो लड़की ?
वो तो बस
आँख, अंगूठा, जीभ
और पाँव में ही सिमट
कर रह गयी

34 comments:

  1. waah !
    bahut hi badhiya kavita, har ladki ke jeewan ki kahani hai yah,
    marmik parantu yatharth
    aabhar !!

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  2. Bahut achhi lagi yah kavita to, badi gahari soch chhupi hai isame..Aabhar!

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  3. वाह!! क्या चित्र उकेरा है बेटी से बहू की यात्रा की.

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  4. पर वो लड़की ?
    वो तो बस
    आँख, अंगूठा, जीभ
    और पाँव में ही सिमट
    कर रह गयी
    ....सफल अभिव्यक्ति.
    ...बधाई.

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  5. जीवन के सत्य का सटीक चित्रण।
    शुभकामना।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  6. " पर वो लड़की ? "बहुत ही अच्छी प्रस्तुति !!

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  7. नारी मन और अकथ विवशता की भावपूर्ण और सशक्त अभिव्यक्ति

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  8. आँखें झुका ली ...गोल गोल घुमा ली ...अंगूठा दिखाया ...जीभ निकाली और धम से बैठ गयी वो लड़की ...और आपके साथ कहाँ से कहाँ का सफर कर आई ...मगर रही वह वही की वही ...
    मुझे लगता है हर स्त्री /महिला के साथ रहती है वह ...चुपचाप ....हमेशा साथ...

    आज पहले बार मुझे आपको कमेन्ट करने में दिक्कत हो रही है ....बहुत बढ़िया ...इससे बाहर ही नहीं निकल पा रही हूँ ....

    थोडा कम गंभीरता के साथ कहू ....घूंघट वालियों को और अधिक सुविधा होती है ... लम्बा सा घूंघट निकाल कर चाहे जितनी लम्बी जीभ निकाले , आँख घुमाये .." Go to Hell " कह जाये...:)

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  9. वो तो बस
    आँख, अंगूठा, जीभ
    और पाँव में ही सिमट कर रह गयी
    सिमटी हुई उस लड़की को आपने तो शब्दों के कैनवास पर चित्रित कर ही दिया.
    अद्भुत रचना

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  10. अनुभूति और कथन शिल्प इस कविता को महान कविताओं की श्रेणी में ले जाते हैं।
    आप ने आज चमत्कृत कर दिया।

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  11. आँख - देखना
    जीभ - बोलना
    पैर - चलना

    चेतना के इन तीन अंगों के बहाने नारी के उपर लगी बन्दिशों को क्या खूब उकेरा है ! सोचता ही रह गया।

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  12. कविता पहले पढ़ी थी जी..तब भी अच्छी लगी थी..
    पर आज दो दो पेंटिंग्स के साथ और भी ज्यादा गहरे अर्थ दे रही है...
    पहली पेंटिंग तो लाजवाब है ही..पर दुसरे वाली जाने क्यूँ पहली नज़र में काफी सतही लगी.... पर दोबारा देखा तो देखते ही रह गए...
    लाजवाब...!!!

    अभी तो मन ही मन आँखें गोलों गोल घुमाने , अंगूठा दिखाने और जीभ निकालने को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं....

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  13. "वो तो बस
    आँख, अंगूठा, जीभ
    और पाँव में ही सिमट
    कर रह गयी"

    नहीं रहेगी ऐसी, जल्दी ही बदल जायेगी! जैसे बासु चटर्जी की फिल्म "उपहार" में बदल गई थी।

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  14. ati sunder.......
    shaharo me ye seekh kanha.....?

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  15. बेटी से बहू तक की
    सारी सीढियाँ
    मैं तो तय कर गयी
    पर वो लड़की ?
    वो तो बस
    आँख, अंगूठा, जीभ
    और पाँव में ही सिमट
    कर रह गयी
    हर लडकी के दिल का दर्द बहुत खूबी से उकेरा है धन्यवाद शुभकामनायें

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  16. hamaara comment kahin kho gayaa kyaa aap se mam....?

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  17. दीदी आपकी लेखन में तो जादू है , आपकी ये कविता पढकर निःश्बद हो गया हूँ ।

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  18. वाह कमाल के बिम्ब उकेरे हैं आपने अदा जी.

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  19. अदा जी ! लड़की के जीवन को ज्यों का त्यों उतार कर रख दिया आपने....अद्धभुत कविता.

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  20. @मनु जी किसी का भी कमेन्ट नहीं खोया था ...यहाँ अभी सुबह हुई है तो मैंने कमेन्ट रिलीज किया है....

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  21. ओह्ह सभी लड़कियों की कहानी कह डाली तुमने तो....कितनी बंदिशें लगी होती हैं,लड़की होने पर...और कोई ना लगाए तब भी हम खुद ही बाँध लेते हैं कुछ सीमाएं,पर ये पैर पटक कर अंगूठा दिखाने वाली लड़की जिंदा रहती हैं,...कहीं ना कहीं..सब में.....बहुत ही सुन्दर रचना

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  22. पहली पेंटिंग ने ही सब कुछ कह दिया अदा जी।
    लेकिन अगर आज भी ऐसा हो रहा है तो बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है।
    आजकल आना सीमित हो गया लगता है।

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  23. सच कहा आपने, कुछ बातें कभी नहीं बदलती, हां अनका स्वरूप या अभिव्यक्ति का प्रकार बदल जाता है।

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  24. अच्छी और सच्ची कविता है।

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  25. अदा साहिबा, आदाब
    बेहद भावपूर्ण और सार्थक है
    मां और सास के सफ़र में व्यक्त की गई
    नारी जीवन की व्यथा...

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  26. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  27. बेटी से बहू तक की
    सारी सीढियाँ
    मैं तो तय कर गयी
    पर वो लड़की ?
    वो तो बस
    आँख, अंगूठा, जीभ
    और पाँव में ही सिमट
    कर रह गयी

    अफ ........... कमाल का लिखा है ... दिल के आस पास ही धड़कट्ी रहेगी ये रचना बहुत लंबे समय तक .... दर्द की गहरी अनुभूति है इसमें .........

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  28. DI, Mujhe to ise padh kar 3 idiots ka gana yaad aa raha hai...coz bar bar us ladki ki ankho ko gol ghumane, jeebh nikalne aur angutha dikhane ki chhavi mere saamne ban jati hai..

    HONTH GHUMAO...SITI BAJAO..AUR BOLO...AAAAAAAAAAAAAAALLLLLLLL
    ISSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSS
    WELLLLLLLLLLLLLLLLLLLLLL


    ha.ha.ha.ha.
    nice, serious he...bt i enjoyed.

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  29. रचना कमाल है!
    ’सच में’ पर आने का निमन्त्रण,तथा न आने की वजह अगर नाराज़गी किसी गुस्ताखी की वजह से तो माफ़ी की गुज़ारिश!

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  30. रचना कमाल है!
    ’सच में’ पर आने का निमन्त्रण,तथा न आने की वजह अगर नाराज़गी किसी गुस्ताखी की वजह से तो माफ़ी की गुज़ारिश!

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  31. ज्योति सिंह said... माँ -

    ने समझाया,

    बचपन छूट चुका है

    ये भी बताया

    बड़ी हो गयी हो,

    हाथ पांव समेट कर

    ढंग से रहा करो,sach kah rahi ,maa bitiya ko hamesha nasihat aur sanskaar deti hai ,wo ghabraati hai ki taklife use chhoo na de aur usse bachne ke liye niyam kayde sikhati rahti ,magar manviya paadap ki ye anmani
    kali ,mombati ki tarah jalti hi rahi .bahut hi achchhi rachna hai aapki ,

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  32. एक नारी ही नारी के अंतर्मन को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकती है। आपकी कविता ने मेरे अंतस को झिंझोड़ कर रख दिया।.....प्रभावशाली कविता.....

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