Tuesday, September 29, 2009

चुपचाप..



निकले थे हम
यूँ ही
ज़रा सा बाहर
कि मिल गयी
बिखरी सी ज़िन्दगी,
रिश्तों की डोरी,
खुशियों के मंज़र,
दुश्मनों के खंज़र
दोस्तों के पत्थर,
आँखों के समंदर
यादों की कतरन
और भड़कती सी
आग
हमने समेट लिया
सब कुछ
सीने के अन्दर
चुपचाप..

24 comments:

  1. गम का इतिहास ऐसा ही होता है .........चुपचाप दफन हो जाता है दिल की गहराई मे जहाँ दर्द तो होता है पर दिखता नही है ...........

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  2. लंबा गम का इतिहास यहाँ ,
    किश्तों में सुनते हैं ,
    लो अभी शुरू ही किया ,
    और वो उठके चल दिया ?

    आपकी क्या तारीफ करूँ ? हर बार मुग्ध कर देती हैं !
    'एक हमही नही तनहा ,दीवाने बहुत हैं"....

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  3. yeh baat to sahi hai....ki seene mein hum bahut kuch samete huye hain....... zindagi to bikhri hai hi...... har taraf dhokha aur nafrat......


    aapki kavitayen waaqai mein chosne ko majboor kar detin hain...... kai baar....

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  4. NO COMMENTS

    URL SAYS IT ALL

    ..............

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  5. दीदी चरण स्पर्श

    क्या बात है

    एक ही रचना मे इतना दर्द,

    हर दर्द में एक ही अदा,

    हर पंक्ति मे एक अदा,

    तभी तो हम कहते है

    हमारी अदा है सबसे जुदा।

    बेहद खूबसूरत रचना ।

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  6. बिखरी सी ज़िन्दगी,
    रिश्तों की डोरी,
    खुशियों के मंज़र,
    दुश्मनों के खंज़र
    दोस्तों के पत्थर,
    आँखों के समंदर
    यादों की कतरन
    और भड़कती सी
    आग
    अदा जी आपने तो कोई भी चीज़ छोडी नहीं अरे गम का तो एक ही एहसास जीने नहीं देता आप ने तो पूराटोकरा उठा लिया अजी हमे दे दीजिये थोडा सा आप अभी बहुत छोटी हैं । निशब्द हूँ
    बहुत सुन्दर मार्मिक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

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  7. "aapki kavitayen waaqai mein chosne ko majboor kar detin hain...... kai baar...."

    @mahfooz ali
    sahi keh rahe hain mehfoozz ji aDaDi ne mera dimag to poora choos liya ab aapki baari hai....
    hahaha
    :)

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  8. wah kya baat kahi hai..bahut sunder abhivyakti hai Ada ji!

    http://shikhakriti.blogspot.com/

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  9. दुनिया में इतने धोखे हैं कि
    निकलते ही बाहर
    जिंदगी बिखर ही जाती है
    और
    मिल ही जाती है कोई डोर रिश्तों की
    जिनमें खुशियों के मंजर हैं
    तो वहीं दुश्मनों के खंजर भी
    दुश्मनी शायद दोस्ती का दुसरा पड़ाव है

    लेकिन बह जाती हैं
    यादों की कतरने
    आँखों से समंदर बन के
    और
    मन में भड़कती रहती है आग
    धोखे से बिखरी जिंदगी की आह सी
    पर
    हमने समेट लिया
    सब कुछ
    सीने के अंदर चुपचाप
    क्योंकि ...
    कहने से भी कब समझा है
    इस दिल की बात ।

    बहुत ही सुंदर कविता । अदा जी ! क्या मैंने आपकी कविता को सही समझा है । कृपया जरूर बताएँ ।

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  10. ye kyaa ho rahaa hai...?

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  11. निकले थे हम
    यूँ ही
    ज़रा सा बाहर
    कि मिल गयी
    बिखरी सी ज़िन्दगी,
    रिश्तों की डोरी,
    खुशियों के मंज़र,
    दुश्मनों के खंज़र
    दोस्तों के पत्थर,
    आँखों के समंदर
    यादों की कतरन
    और भड़कती सी
    आग
    हमने समेट लिया
    सब कुछ
    सीने के अन्दर
    चुपचाप..

    भावपूर्ण पंक्तियाँ, ख़ुशी, दुःख सबकुछ समेटे हुए हैं.
    लेकिन चुपचाप क्यूँ हैं ?
    आपने निवेदन किया था मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा हौसला बढाएं.
    सादर.

    ReplyDelete
  12. निकले थे हम
    यूँ ही
    ज़रा सा बाहर
    कि मिल गयी
    बिखरी सी ज़िन्दगी,
    रिश्तों की डोरी,
    खुशियों के मंज़र,
    दुश्मनों के खंज़र
    दोस्तों के पत्थर,
    आँखों के समंदर
    यादों की कतरन
    और भड़कती सी
    आग
    हमने समेट लिया
    सब कुछ
    सीने के अन्दर
    चुपचाप..

    भावपूर्ण पंक्तियाँ, ख़ुशी, दुःख सबकुछ समेटे हुए हैं.
    लेकिन चुपचाप क्यूँ हैं ?
    आपने निवेदन किया था मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा हौसला बढाएं.
    सादर.

    ReplyDelete
  13. kuchh had tak theek samjhaa hai aapne bhaarti ji...

    par jyaadaa nahi...

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  14. ये सब ज़िन्दगी के साथी हैं ।

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  15. बहुत ही सुन्दर रचना दीदी । कितना कुछ छिपा हुआ है अपने अन्दर और पता भी नहीं चलता है ।

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  16. बहुत ही सुन्दर रचना दीदी । कितना कुछ छिपा हुआ है अपने अन्दर और पता भी नहीं चलता है ।

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  17. दोस्तों के पत्थर... ? सबसे अधिक दर्द पहुंचाने वाली बात...

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  18. दुश्मनों के खंजर
    यादों की कतरन समेटे आँखों के समंदर ....
    हर आग समेटी सीने में चुपचाप ...
    आँखों में समंदर भरे हर मुस्कुराते चेहरे की यही दास्तान है ...जिनके होंठों पे हंसी पांव में छाले होंगे...
    हाँ ...वही लोग तेरे चाहने वाले होंगे...!!

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  19. अदा जी आपकी लेखनी में जादू है जो हमें हमेशा आपसे बाधे रहती है

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  20. मिल गयी
    बिखरी सी ज़िन्दगी,..zindgee hi apne aap me kyee kuch smete rahti hai bawjud bikhrne ke...

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  21. निकले थे हम
    यूँ ही
    ज़रा सा बाहर
    कि मिल गयी
    बिखरी सी ज़िन्दगी,
    ....
    .... बहुत कुछ समेटा पर ज़िन्दगी बिखरी ही रही ...

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  22. सुन्दर अभिव्यक्ति......

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  23. Waah !!
    Lajwaab kavita !!

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  24. है जुबां को काटने का शौक़, मेरी काटिये
    बख्श भी दीजै रकीबों को, के कुछ मैं भी सुनूं..

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