Wednesday, November 17, 2010

और हो जाएगा नव-निर्माण, हमारे मन के वृन्दावन का...


विष वृक्ष की तरह फैलते 
इस डाह में,
भर दो अणुशस्त्रों की आग,
जिसकी लपट से 
झुलसे चेहरों को,
अपनी असलियत पर आने दो,
गलाने पर जो तुले हैं
हमारी अस्मिता-तरु को,
उन सांप्रदायिक डालियों को काट डालो ,
ख़ूब लड़ें हम आओ मिलकर,
मगर टूटने की बात न करें,
हो जाने दो हाहाकार,
बस एक बार,
कर लो हर फसाद,
बह जाने दो हर मवाद,
द्वेष की काली काई निकल जाने दो,
उज्जवल स्फटिक पथ बन जाने दो,
आलोकित हो जाएगा
रास्ता उत्थान का,
फिर हो जाएगा नव-निर्माण 
हमारे मन के वृन्दावन का...

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर भावना !

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  2. द्वेष की काली काई निकल जाने दो,
    उज्जवल स्फटिक पथ बन जाने दो,

    बेहद सुन्दर

    दीदी ,
    आपकी पोस्ट से [डेशबोर्ड में] सुबह सुबह चरण कमल के दर्शन करके मन पावन हो गया

    धन्यवाद

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  3. आज दिन के प्रारंभ में ही चरण-युगल के दर्शन हुये, दिन अच्छा बीतेगा।

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  4. वाह, इन आदर्शों की चाह में कब से राहें तक रहे हैं हम।

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  5. शांति का संदेश आक्रोश के माध्यम से! नव-निर्माण कि आशा का स्वागत॥

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  6. फिर हो जाएगा नव-निर्माण
    हमारे मन के वृन्दावन का...

    bahut uttam rachana

    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  7. एक सकारात्मक रचना है ये.

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  8. द्वेष की काली काई निकल जाने दो,
    उज्जवल स्फटिक पथ बन जाने दो,
    आलोकित हो जाएगा
    रास्ता उत्थान का,
    फिर हो जाएगा नव-निर्माण
    हमारे मन के वृन्दावन का....
    बहुत खूब ....
    ईश्वर हर दिल से द्वेष और ईर्ष्या को विदा करे ...आमीन
    आजकल आपके ब्लॉग जैसा गेट आप कही और भी नजर आ रहा है ...
    कहाँ देखा था ...कुछ याद नहीं आ रहा !

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  9. very beautiful... deep and pure!

    Regards,
    Dimple

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