Thursday, July 1, 2010

हम वहीं तर जाते हैं.....


इक दिन में हम कई बार, देखो ना ! मर जाते हैं
क़ब्र के अन्दर, कफ़न ओढ़ कर, काहे को डर जाते हैं

राह में तेरे संग चलते हैं पर दामन भी बचाते हैं 
फ़िर आँखों में धूल झोंक कर, अपने घर आ जाते हैं

साजों की हिम्मत तो देखो, बिन पूछे बज जाते हैं
जब उनपर कोई थाप पड़े तो, गुम-सुम से हो जाते हैं

चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, हम कश्ती से तो हटाते हैं
वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं

देखें तुझको या ना देखें, फर्क हमें क्या पड़ता है
साया भी ग़र तेरा छू ले, हम वहीं तर जाते हैं


21 comments:

  1. बहुत सुन्दर!

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  2. देखें तुझको या ना देखें, फर्क हमें क्या पड़ता है
    साया भी ग़र तेरा छू ले, हम वहीं तर जाते हैं

    बहुत खूब !!

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  3. लाजवाब रचना .......

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  4. ek din me ham kai baar mar jaate hain...........sach me, iss jindagi me to pata nahi ...har pal sayad marte hain......:(

    bahut umda......:)

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  5. इक दिन में हम कई बार, देखो ना ! मर जाते हैंक़ब्र के अन्दर, कफ़न ओढ़ कर, काहे को डर जाते हैं
    राह में तेरे संग चलते है पर दामन भी बचाते हैं फ़िर आँखों में धूल झोंक कर, अपने घर आ जाते हैं
    अच्छा लगा ।

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  6. हर बार बहा कर ले जाती हैं । इतना तैरायेंगी तो एक दिन डूब ही जायेंगे ।

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  7. वाह दिल की लगी भी खूब है..साये को दूर से देख कर भी निहाल हैं..और छू ले तो सोने पे सुहागा..जनाब तार ही गए..बहुत खूब.

    आपकी ये गज़ल कल २/७/१० शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली गयी है.

    आभार.

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  8. साजों की हिम्मत तो देखो, बिन पूछे बज जाते हैं
    जब उनपर कोई थाप पड़े तो, गुम-सुम से हो जाते हैं,

    बेहतरीन रचना अभिव्यक्ति...आभार

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  9. चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, हम कश्ती से तो हटाते हैं
    वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं
    क्या बात है , वाह ....
    बहुत अच्छे ( चित्र और रचना दोनों )

    तो एक बार फिर से
    भावों की गहराई में
    आपने पहुचाया है ......
    आँखें खोली हैं अन्दर जब हमने
    फिर कुछ नया बसा पाया है .......
    इस गहराई में दिख रही
    सुन्दर भावों के नगरी को
    लगता है आपने ही बनाया है

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  10. देखें तुझको या ना देखें फर्क हमें क्या पड़ता है...

    वाह क्या बात है....!!



    एक शे'र याद आया , कहीं पढ़ा था...


    ज़माना हो दीवाना, कब किसे कुछ फर्क पड़ता है
    मगर क्यूँ कैस की सुनकर के लैला कसमसाती है..

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  11. इक दिन में हम कई बार, देखो ना ! मर जाते हैं
    क़ब्र के अन्दर, कफ़न ओढ़ कर, काहे को डर जाते हैं



    चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, हम कश्ती से तो हटाते हैं
    वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं


    kaise sab kuchh likha diya in dono me hi aapne...behad khubsurat :)

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  12. भावपूर्ण ग़ज़ल..बढ़िया लगा..

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  13. Very nice ghazal.



    Good.

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  14. बहुत सुन्दर भावों से लिखी गई कविता

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  15. रचना का तो जवाब नही, मगर पेंटिंग भी लाजवाब है.किसने बनाई?

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  16. चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, हम कश्ती से तो हटाते हैं
    वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं
    bahut khoob.

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  17. हमेशा की तरह ... बहुत अच्छा

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