Sunday, July 25, 2010

तिमिर में लिप्त भविष्य की चाह कोई नहीं करता ...!!


ब्लॉग जगत में हिंदी और देवनागरी लिपि अपने कंप्यूटर पर साक्षात् देखकर जो ख़ुशी होती है, जो सुख मिलता है, जो गौरव प्राप्त होता है यह बताना असंभव है, अंतरजाल ने हिंदी की गरिमा में चार चाँद लगाये हैं, लोग लिख रहे हैं और दिल खोल कर लिख रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो भावाभिव्यक्ति का बाँध टूट गया है और यह सुधा, मार्ग ढूंढ-ढूंढ कर वर्षों की हमारी साहित्य तृष्णा को आकंठ तक सराबोर कर रही है, इसमें कोई शक नहीं कि यह सब कुछ बहुत जल्दी हो रहा है, और क्यों न हो जब अवसर अब मिला है | 

इन सबके होते हुए भी यह प्रश्न यक्ष प्रश्न है ...क्या हिंदी का भविष्य उज्जवल है ?  विशेष कर , आनेवाली पीढी हिंदी को सुरक्षित रखने में कितना और क्या योगदान करेगी ? वैसे तो इस प्रश्न का उत्तर सीधे-सीधे देना ही कठिन है ...और यह कठिन जिम्मेवारी भी हमारी पीढी के कन्धों को वहाँ करना है | पश्चिम का ग्लैमर इतना सर चढ़ कर बोल रहा है कि सभी उसी धुन में नाच रहे हैं, आज से ५०-१०० वर्षों के बाद, मुझे ऐसा लगता है 'संस्कृति' सिर्फ किताबों (digital format) में ही मिलेगी | 

जिस तरह गंगा के ह्रास में हमारी पीढी और हमसे पहले की पीढियों ने जम कर योगदान किया उसी तरह भारतीय संस्कृति को गतालखाता, में सबसे ज्यादा हमारी पीढी ने धकेला है | हमारे बच्चे तो फिर भी हिंदी फिल्में देख-देख कर कुछ सीख ले रहे हैं लेकिन उनके बच्चे क्या करेंगे?
ऐसा प्रतीत होता है, जैसे एक समय ऐसा भी आने वाला है जब सिर्फ एक भाषा और एक संस्कृति रह जायेगी, जिसमें 'संस्कृति' नाम की कोई चीज़ होगी ही नहीं |

यह बहुत अच्छी बात है कि, इस समय लोग हिंदी या देवनागरी में लिख पा रहे हैं, वर्ना हम जैसे, जो विज्ञान के छात्र थे, कहाँ मिला हमें अवसर हिंदी लिखने का, एक पेपर पढ़ा था हमने हिंदी का MIL(माडर्न इंडियन लैंग्वेज), न तो B.Sc में हिंदी थी, न M.Sc. में | सही मायने में तो , हिंदी लिखने का मौका हमें अब मिला है, युवा वर्ग को भी हिंदी में लिखते देखती हूँ तो बहुत ख़ुशी होती है, लगता है कि भावी कर्णधारों ने अपने कंधे आगे किये हैं...हिंदी को सहारा देने के लिए, जो बच्चे विदेशों में हैं उनसे हिंदी की प्रगति में योगदान की अपेक्षा करना ठीक नहीं होगा

आज के सन्दर्भ में...हिंदी की सबसे बड़ी समस्या है उसकी उपयोगिता, आज हिंदी का उपयोग कहाँ हो रहा है ? उत्तर, शायद 'बॉलीवुड' के अलावा और कहीं नहीं, 'बॉलीवुड' ने भी अब हाथ खड़े करने शुरू कर दिए है, संगीत, स्थिति, सभी कुछ पाश्चात्य सभ्यता को आत्मसात करता हुआ दिखाई देता है, अब सोचने वाली बात यह है कि 'बॉलीवुड' समाज को उनका चेहरा दिखा रहा है या कि  लोग फिल्में देख कर अपना चेहरा बदल रहे हैं, वजह चाहे कुछ भी हो सब कुछ बदल रहा है, और बदल रही है हिंदी, सरकारी दफ्तरों में भी सिर्फ अंग्रेजी का ही उपयोग होता है, मल्टी नेशनल्स में तो अंग्रेजी का ही आधिपत्य है, बाकी रही-सही कसर पूरी कर दी इन 'कॉल सेंटर्स' ने, अब जो व्यक्ति दिन या रात के ८ घंटे अंग्रेजी बोलेगा, तो अंग्रेजी और अंग्रेजियत समा ही जायेगी उसके रगों में अन्दर तक, इस लिए हिंदी का भविष्य क्या होगा, यह प्रश्न चिंतित करनेवाला है ....

भारत में मेरे घर जो बर्तन मांजने आती है उसके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं, और क्यों न पढ़े ? जब हिंदी पढ़ कर कुछ होना नहीं है..तो लोग हिंदी के प्रति अनुराग क्यों रखेंगे ? तो हिंदी पढने वाला है कौन, और पढ़ कर होगा क्या? इस दिशा में सरकार ही कुछ कर सकती है...क्योंकि हिंदी से प्रेम करने वालों कि संख्या कम नहीं है...बस उन्हें कोई भविष्य नज़र नहीं आता है...इसलिए सरकार के पास ऐसी योजना होनी चाहिए जिससे हिंदी पढने वालों को कुछ प्रोत्साहन मिले, आर्थिक एवं सामाजिक लाभ हो ...तभी बात बनेगी...सिर्फ़ एक दिन 'हिंदी दिवस' मना कर या फिर हफ्ते में एक दिन हिंदी में दफ़्तर में काम करने का बोर्ड लगाने से काम नहीं चलने वाला...हिंदी को , जहाँ भी संभव हो एवं आवश्यकतानुसार, अधिकतर कार्यक्षेत्रों में समुचित आदर और सम्मान मिलना चाहिए...हिंदी को अपनी उपयोगिता साबित करने का अवसर मिलना चाहिए ...अगर ऐसा हुआ तो ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी की ओर अग्रसर होंगे....

सभी को जीवन में उत्थान चाहिए..और इसके लिए उसी पथ का चुनाव किया जाता है जिसमें चल कर संतुष्टि और सुख मिलता हो...हिंदी को अपनाने वालों को अपना भविष्य उज्जवल नज़र आना चाहिए, तिमिर में लिप्त भविष्य की चाह कोई नहीं करता ...!!

आगे भी जाने न तू.....

Get this widget | Track details | eSnips Social DNA

13 comments:

  1. हिन्दी ब्लॉग जगत में सबके सहयोग से न केवल अधिक लेखन हो रहा है वरन अधिक पाठन भी हो रहा है।

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  3. sunder abhivyakti..

    badhaai..

    ReplyDelete
  4. अदा जी,
    कायदे से हिंदी को १९६५ तक ही देश की राष्ट्रीय भाषा बन जाना चाहिए था...लेकिन क्या ऐसा हुआ...साठ के दशक के मध्य में तमिलनाडु से उठे हिंदी विरोधी आंदोलन ने लाल बहादुर शास्त्री जैसे हिंदी प्रेमी प्रधानमंत्री के हाथ बांध दिए थे....उसके बाद देश में कोई राजनेता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के सवाल को प्रखरता से नहीं उठा सका...हिंदी बस नाम की राजभाषा बन कर रह गई...मुलायम यादव सरीखे नेता अंग्रेज़ी का विरोध तो करते हैं लेकिन हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए कुछ नहीं कहते...जब घर पर ही हिंदी की कद्र नहीं है तो बाहर विदेश में क्यों होगी....

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  5. हिंदी के लिए इतना सोचने-विचारने के लिए धन्यवाद !!!

    ReplyDelete
  6. हिन्दी को तो हमारे देश के कर्णाधारों ने ही गर्त में डाला है। देश में ऐसी नीतियाँ ही नहीं बनीं जो देशवासियों को अपनी भाषा के प्रति सम्मान की भावना के लिये प्रेरित करे।

    किन्तु हिन्दी रूपी सूर्य हमेशा चमकता ही रहेगा, अभी कुछ समय के लिये बादलों की पीछे आ गया है इससे उसे कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला है।

    बेचारी हिन्दी … ये वो थाली है जिसमें लोग खाते हैं और फिर उसी में छेद करते हैं

    ReplyDelete
  7. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  8. विश्व जनसंख्या का बीस से पच्चीस प्रतिशत हिस्सा भारतीयों का है, इस हिसाब से देखें तो हिन्दी को जितनी लोकप्रिय होना चाहिये, उतनी है नहीं। इसकी जिम्मेदारी अकेली सरकार की ही नहीं, हम सबकी है। सरकार तो हर क्षेत्र में कानून बनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है, और हम सरकार पर दोष डालकर। कहीं से उपलब्ध हो सके तो इज्राईल में हिब्रू भाषा के उत्थान के बारे में पढ़ियेगा और सबको लाभान्वित करवाईये, आत्मगौरव किस चिड़िया का नाम है, हम भारतीयों को इसका भान होना चाहिये। हम या तो आसमानों में उड़ते हैं या फ़िर रेंगना जानते हैं, जमीन पर पैर जमाकर चलना हमें नहीं आता है। हम हर वो गलत काम भागकर करते हैं जिसे पश्चिम में कुछ लोग करते हैं, लेकिन उन लोगों की अपने प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति ईमानदारी को हम न देखते हैं और न अपनाते हैं। फ़्रैंच, जर्मन, रशियन, चाईनीज़ किसी भी देश के नागरिकों का नाम लीजिये, हर कोई अपनी भाषा में बोलकर गौरवान्वित महसूस करता है और हम टूटी फ़ूटी ही सही, अंग्रेजी बोलकर अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं। बाजार में अनेकों बार दुकानदार के उनचास, तरेसठ जैसे शब्द बोलने पर बच्चों को यह पूछते हुये कि अंकल, ये कितने होते हैं? और फ़िर जवाब में फ़ोर्टी नाईन, सिक्सटी थ्री सुनकर पैसे देते हुये, और साथ में खड़े उनके मां बाप को खींसे निपोरते हुये देखने का सौभाग्य(?) पा चुका हूं। बैंक में अगर पचास लोग अपने फ़ार्म खुद भरते हैं तो उनमें से चालीस पैंतालीस लोग इंग्लिश का प्रयोग करते हैं और उनमें से अस्सी प्रतिशत को thousand, hundred जैसी स्पैलिंग सही नहीं आते, लेकिन लिखेंगे इंग्लिश में ही। मेरे अपने कार्यालय में चौदह सितम्बर के दिन जब एक के बाद एक वक्ता हिन्दी दिवस की बधाई दे रहे थे और मेरे द्वारा साल में एक दिन हिन्दी को मान्यता देने पर शर्म व्यक्त करने पर वरिष्ठ लोगों का कोपभाजन बन चुका हूं, लेकिन अब भी यही मानना है कि सिर्फ़ एक दिन हिन्दी को मान सम्मान देकर फ़िर पुराने ढर्रे पर चलना समस्या का हल नहीं है।
    सही कहा आपने कि कम्प्यूटर पर हिन्दी में लिखा देखकर और लिखने में भी बहुत आनन्द मिलता है, और यकीनन बराहा जैसे टूल्स का इसमें बहुत योगदान है। हिन्दी में काम करना बहुत सरल है अब, लेकिन लोग आधुनिकता की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहते है। एक सप्ताह के लिये चंडीगढ़ जाना हुआ था, मौका निकालकर पांच छह साईबर कैफ़े में गया, किसी में भी हिन्दी फ़ोन्ट्स और टाईपिंग टूल्स उपलब्ध नहीं थे। मजबूरी में जो काम था किया और समय और नेट की उपलब्धता होने के बावजूद और काम करने का मन ही नहीं किया। कैफ़े मालिकों से इस बारे में कहा भी तो उनका यही कहना था कि जी डिमांड ही नहीं है हिन्दी की। अपना तो ये मानना है कि जिसे गरज होगी या इच्छा होगी, वो खुद ही रास्ता तलाशेगा। अच्छी बात ये है कि ब्लॉग जगत बेशक बहुत बदनाम है, लेकिन यहां भी बाकी दुनिया की तरह अच्छे और सहृदय लोगों की कमी नहीं है और हम यह भली भांति जानते हैं। नई पीढ़ी में बहुत से ब्लॉगर उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं, और हिन्दी का भविष्य उज्जवल है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जरूरत है एक स्पार्क की, एक चिंगारी की, वो ऐसे आलेखों के माध्यम से दिखती रहे, यह अपेक्षा रहेगी। जारी है अभी....

    ReplyDelete
  9. जारी से आगे...
    @ अब सोचने वाली बात यह है कि 'बॉलीवुड' समाज को उनका चेहरा दिखा रहा है या कि लोग फिल्में देख कर अपना चेहरा बदल रहे हैं,
    ----------------------------
    यह प्रश्न मुझे भी उद्वेलित करता रहा है, जवाब जो मुझे कहीं पढ़ने को मिला और उपयुक्त लगा, कुछ इस तरह से है-
    समाज की कुछ चुनिंदा घटनाओं या कुछ चुनिंदा व्यक्तित्वों के आधार पर सिनेमा का निर्माण होता है, चाहे वे क्राईम से संबंधित हों या लव एंड लस्ट से, उसे रुपहले पर्दे पर इस तरह से ग्लोरीफ़ाई करके पेश किया जाता है कि समाज का बहुसंखयक हिस्सा उससे प्रभावित हो जाता है, यानि इस समाज से ही कोई माईक्रो चीज लेकर सिनेमा उसे मेजर इफ़ैक्ट देकर समाज को ही लौता देता है।
    हिन्दी पर आपकी चिंता से अच्छा ही लगा। चिन्ता और अच्छा लगना, शायद आप भी कन्फ़्यूज़ हो जायेंगी, इस लिये बस करता हूं।

    आभार।

    ReplyDelete
  10. आप क्या चाहती हैं हम पूरे गंजे हो जाए। पोस्ट पढ़ते वक्त सिर पर बचे चंद बाल खुजलाने लगा था। सोचते सोचते ये भी चले गए तो बारिश में कैसे नहाउंगा। कंघी कहां तक करुंगा पता ही नहीं चल पाएगा। आप भी न हद करती हैं।

    हिंदी तो हमें सीखनी ही होगी। बस मुसीबत ये है कि क्लिष्ट हिंदी हो या प्रवाहमान हिंदी। महात्मा गांधी की हिंदुस्तानी को हिंदी माने या प्रोफेसरों की हिंदी को। यही झगड़ा लोग सुलझा लें तो बेहतर होगा।

    अपन तो चाहते हैं कि दुनिया में हिंदुस्तानी फैले औऱ हम लोगो को हिंदी का असली ज्ञान...

    ReplyDelete
  11. हिंदी और ईमानदारी का अटूट सम्बन्ध है ठीक उसी तरह जैसे बेईमानी और अंग्रेजी का इसलिए भ्रष्टाचार और कुशासन को दूर किये बिना हिंदी का सही मायने में विकाश या विस्तार हो ही नहीं सकता | सरकार हिंदी के विकाश के नाम पर भी अडबों रुपया हर साल भ्रष्टाचार को भेंट चढ़ा देती है |

    ReplyDelete