Saturday, July 24, 2010

इस्तेमाल खारों का किया रफ़ू के लिए......आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूँ.....


ग़नीमत है के फिर से बहार आ गई है   
चमन तरस गया था रंग-ओ-बू के लिए

लिए चाक गिरेबाँ कहाँ तक फ़िरते हम 
इस्तेमाल ख़ारों का किया रफ़ू के लिए

क्या शाख़, कली, गुँचे, बूटे, फूल डाल के
हँस दिए गुलिस्ताँ की आबरू के लिए 

चाक=फटा हुआ
ख़ारों= काँटे
रफ़ू=सिलाई की एक किस्म जो फटे हुए कपड़ों पर की जाती है
गुँचे=फूलों का गुच्छा
 

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29 comments:

  1. दीदी,
    सुबह सुबह ये चित्र देख कर तबियत प्रसन्न हो गयी
    गाना भी बहुत अच्छा लगा
    रचना में चाक, ख़ारों, रफ़ू, गुँचे का अर्थ बता दें

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  2. वाह ..
    गाना सुनकर आपकी शुरुआती दो लाइनों पर जा ठहरा......
    ग़नीमत है के फिर से बहार आ ही गई
    चमन तरस रहा था रंग-ओ-बू के लिए ..

    आभार...

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  3. वाह!

    इस्तेमाल खारों का किया रफ़ू के लिए.

    क्या बात है और फिर गीत सुनकर और आनन्द आ गया.

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  4. आज आपकी पोस्ट है डीलक्स थाली की तरह।

    तस्वीर, शेर और गाना सब कुछ बेहतरीन, बहुत शानदार। लेकिन हम भी अपने फ़र्ज से पीछे नहीं हटने वाले हैं, शिकायत करके ही रहेंगे - ’कि दिल अभी भरा नहीं।’ ऐसी पोस्ट इतनी छोटी क्यों रखती हैं आप, कम से कम पिछली दो पोस्ट्स के ब्राबर तो होनी ही चाहिये थी।(इसके बाद आप का तकियाकलाम, कापीराईट के डर से हम तो नहीं लिखेंगे)

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  5. दीदी,
    मेरी विनती पर भी गौर किया जाये
    (चाक, ख़ारों, रफ़ू, गुँचे का अर्थ)

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  6. इस्तेमाल ख़ारों का किया रफ़ू के लिये।

    ख़ूबसूरत पक्ति। पढ कर आनद आ गया।

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  7. @ ham daal chuke hain gaurav..in shabdon ka arth..

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  8. दाउद ने मेराज से कहा कि 'चाक' गिरेबां पर बेहतर है कि 'रफू' कर लिया जाय , अलबत्ता कभी - कभी 'गुंचे' में भी 'खार' मिल जाते हैं , इसलिए मेराज भाई इन छोटी-छोटी बातों से परेशान न हुआ करो ! इस तरह दाउद भाई ने मेराज को खयाली 'गुंचा' दे दिया !

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  9. दीदी,
    सबसे पहले तो अर्थ बताने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और तकलीफ के लिए क्षमा
    अब रचना की बात .....
    ये लाइन बड़ी गहरी लगी जिसका अर्थ अभी अभी पता लगा
    ....... इस्तेमाल ख़ारों का किया रफ़ू के लिए

    ये लाइन भी शानदार है
    चमन तरस रहा था रंग-ओ-बू के लिए.....

    यानि कुल मिला कर मौ सम कौन जी की बात समझ में आ गयी पोस्ट डीलक्स थाली की तरह है (हर बार की तरह )

    मुझ अज्ञानी पाठक की और से हो रही परेशानी के लिए फिर से क्षमा और अर्थ बताने का आभार

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  10. गौरव,
    ऐसी बात नहीं है ..मुझे पहले ही अर्थ डालने चाहिए थे...
    तुमने याद दिलाया....
    दीदी हूँ शुक्रिया नहीं कहूँगी....

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  11. @ अमरेन्द्र..
    ई दाउद मेराज का मामला हम नहीं समझे ..
    खैर..बता देना कभी..
    खुश रहो...!

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  12. अदा जी , हम तो तस्वीर को ही देखते रह गए । अप इतनी खूबसूरत चित्र भेजती हैं , मैं तो सब को सेव कर लेता हूँ । आभार ।

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  13. रफू करने के लिए खारों का इस्तेमाल ठीक नहीं ...
    खुद अपने हाथ कटने का खतरा होता है ...
    उर्दू ज्ञान बढ़ रहा है हमारा भी ...
    ग़ज़ल में एक शेर और होना चाहिए था ...!

    चित्र बहुत ही खूबसूरत है ...!

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  14. लिए चाक गिरेबाँ कहाँ तक फ़िरते हम
    इस्तेमाल ख़ारों का किया रफ़ू के लिए
    बहुत बढिया शेर भी और चित्र भी ।

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  15. vaah...vaah,sher to kamalke hai. sunanaa bhi ek sukhad anubhav hai.

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  16. अरबी/फारसी के लफ्ज़ों से सजाई गयी शानदार शायरी।

    आपकी सूचना पर ये साहस के पुतले ब्लॉगर। पोस्ट में आपका नाम सम्मिलित कर लिया गया है।
    --------
    व्यायाम द्वारा बढ़ाएँ शारीरिक क्षमता।

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  17. दीदी,
    सुबह सुबह ये चित्र देख कर तबियत प्रसन्न हो गयी
    गाना भी बहुत अच्छा लगा

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  18. क्या बात है और फिर गीत सुनकर और आनन्द आ गया.

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  19. ADA DI MAFI CHAHUNGA DERI SE AANE KE LIYE....


    WORK LOAD ZYADA THA PAR AB FREE HOON...

    UR BROTHER
    SANJAY BHASKAR

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  20. चित्र, गीत और संगीत। कलात्मक त्रिवेणी।

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  21. ग़नीमत है के फिर से बहार आ गई है
    चमन तरस गया था रंग-ओ-बू के लिए
    बहुत खूब .

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  22. कमाल की पंक्तियाँ है, बहुत सुन्दर, आवाज़ के तो क्या कहने, बहुत खूब!

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  23. kal galti se ye comment pichli post par kar diya tha...
    मिले न फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली,
    इसी तरह से बसर, इसी तरह से बसर,
    हमने ज़िंदगी कर ली,
    मिले न फूल तो...

    अब आगे जो भी हो देखा जाएगा,
    खुदा तराश लिया, खुदा तराश लिया,
    और बंदगी कर ली...
    मिले न फूल तो...

    जय हिंद...

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  24. जबरदस्त...!!!
    देर..बहुत देर से आने पर भी कमेंन्ट थोड़ी ना बदलेगा.
    बहुत से ज्यादा ख़ूबसूरत है ये चित्र और रचना दोनों ही...

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  25. Helo Ada ji :)

    Waah waah waah!!
    Bahut hi khoobsurat :)

    Regards,
    Dimple

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