Tuesday, October 30, 2012

शब्दों के खंडहर ....!



कोई प्रसंग नहीं,
चिंतन नहीं,
सृजन की भूमिका भी नहीं,
न कोई योग बना,
न कुछ प्रत्यक्ष हुआ,
बस, अंतस के अकाल पर,
शब्दों के बूँद,
झमा-झम बरस गए,
और...
पंक्तियाँ गुनगुनाने लगीं,
तीसरी पंक्ति,
उषा सी, क्षितिज पर,
चटक गयी...।
तक्षशिला के खंडहर बने
थोड़े शब्द,
उदास थे,
कुछ दूर खड़े थे,
कुछ मेरे आस-पास थे,
बैठे-बैठे, अंतिम पंक्ति,
स्वयं निकल आई,
मूक तो लगी थी मुझे वो,
परन्तु..
अब धीरे-धीरे बोलने लगी है .... !!

Monday, October 29, 2012

क्या गाय या भैंस का दूध....शाकाहार है ???


आज सोचे कुछ अलग हो जावे... बस इसी बहाने पहुँच गए बचपन में...जब हमारे घर गाय बियाई थी...
सुबह-सुबह ग्वाला आता था गाय दुहने और हम होते थे, उनके पीछे पीछे ...नन्हा सा बछड़ा और हमरा हाथ उसकी गर्दन पर सहलाता हुआ...ग्वाला का नाम था 'करुवा'...अब करुवा गाय दुह रहा था ..हमको मालूम था कि कुछ दिन तक उ गाय का दूघ हम लोग नहीं पी सकते हैं ..नई बियाई थी न..उसके दूध से 'खिरसा' बनेगा....
हम बस लटके रहे बछिया  के साथ और देखते रहे गाय दुहना, कि अच्च्क्के हमरा मन कैसा-कैसा तो हो गया देख कर...दूध की जगह लहू की धार निकल गयी थी....करुवा रुक गया ..का जानी का किया फिर दुहने लगा और अब दूध ही निकला...
लेकिन उ लहू की धार हमरे मन में अइसन  बैठी की बस हमरा दूध पीना बंद..और जो ऊ  दिन हमरा दूध पीना बंद हुआ उ आज तक बंद ही है...
इ बात हम सोचते-सोचते अब बुढ़ाने लगे हैं, आज कल शाकाहार की बड़ी तेज़ हवा चल रही है,  तो सोचे कि आज बोल ही देवें....

सोचिये...कोई भी जानवर हो या मनुष्य, दूध किसके लिए देता है ??? पक्की बात है प्रकृति ने हर जानवर या मनुष्य को दूध जैसी चीज़ दी है, तो उसी जीव के बच्चे के लिए ही दी है, किसी दूसरे जानवर के लिए नहीं। गाय किसके लिए दूध देती है...??? अपने बच्चे के लिए ही न !!, लेकिन हम मनुष्य उस बछडे के मुँह  से दूध छीन कर पी लेते हैं क्या यह सही है ?
क्या यह पाप नहीं है ???

भगवान् ने हम मनुष्यों को भी, माँ का दूध दिया है लेकिन एक उम्र तक के लिए ही....अगर दूध पीना इतना ही ज़रूरी होता तो, हर माँ सारी उम्र दूध देती और हम सब सारी उम्र दूध पीते.. लेकिन ऐसा नहीं है....इसका मतलब यह हुआ कि दूध सिर्फ एक उम्र तक ही ज़रूरी है...फिर भी हम दूध पीते हैं, वो भी किसी और जानवर का और किसी और के हिस्से का दूध छीन कर...

अब आते हैं इस बात पर कि क्या वो दूध सही है हमारे शरीर के लिए....गौर कीजिये....यह दूध गाय या भैंस  या किसी भी जानवर का है ...उस दूध में उस जानवार के जीवाणु हैं और उसी प्रजाति के लिए होने चाहिए, हम मनुष्यों के लिए नहीं। गाय के दूध में प्रोटीन, मानव दूध प्रोटीन से भिन्न होता है,  गाय या भैंस के दूध में मिलने वाले हारमोंस का मनुष्य के शरीर में कोई काम नहीं है, लेकिन हम उसे जान-बूझ कर अपने शरीर में डाल लेते हैं, क्या यह हमारे स्वस्थ्य के लिए ठीक होता होगा...?? आप बताइए आप क्या सोचते हैं ???

अब बात करते हैं...क्या गाय या भैंस का दूध....शाकाहार है ???
मैं एक बात कभी स्वीकार नहीं कर पाई,  वो है...'दूध' को शाकाहारी मानना...दूध एक जैविक पदार्थ है...वो पशु के शरीर से निकाला जाता है, उसका सीधा संपर्क एक जानवर से है...उसमें उस जीव के रक्त के अंश हैं, बैक्टेरिया है, हारमोंस हैं, वसा है...फिर भी उसे शाकाहारी के नाम पर हर मांगलिक अवसर पर प्रयोग में लाया जाता है...जबकि भारत को छोड़ कर बाकी जितने भी देशों में मैं गई हूँ इसे ..'मांसाहार' माना जाता है...दही की बात करें तो, बिना बैक्टेरिया के दही का जमना ही नहीं हो सकता, और क्योंकि वो बैक्टेरिया नज़र नहीं आ रहे इसका अर्थ यह हरगिज़ नहीं कि, वो हैं ही नहीं ...

मेरे विचाए से दूध शाकाहार नहीं है, दूध में काफी मात्रा में, एनिमल फैट होता है, जो सैचुरेटेड फैट के रूप में होता है, और वसा का अर्थ है, चर्बी या तेल, जो उसी जानवरके शरीर का होता है, उनमें जो सैचुरेटेड वसा होती है, वो मनुष्य के शरीर के वसा से भी भिन्न होगी, तो कहने का अर्थ यह हुआ कि  हमारे शरीर में इन जानवरों के शरीर से जीवाणु, हारमोंस, प्रोटीन्स, रक्त के अंश और वसा सीधे-सीधे चले जाते हैं, फिर भी हम कहते हैं कि दूध शाकाहारी है ....  
और अगर कोई ज़बरदस्ती कहे कि दूध शाकाहार है तो क्यूँ और कैसे भला ????
सोचिये और आप जवाब दीजिये न.....

तो हो गए तीन प्रश्न ...

१. क्या किसी जानवर के बच्चे के हिस्से का दूध उससे छीन कर हम मनुष्यों का पीना सही है ?
क्या Animal Protection Act इसके लिए काम करेगा...?

२. दूध पीने से क्या दूसरे जानवर के जीवाणु, हारमोंस, बैक्टेरिया, वसा इत्यादि हमें नुक्सान पहुंचा सकते हैं ?

३. क्या दूध वास्तव में शाकाहार है ??

Saturday, October 27, 2012

ज़बरन चले आये तुम भी, यहाँ कहाँ ! (Repeat)


वो जश्न, वो रतजगे, वो रंगीनियाँ कहाँ 
आये निकल वतन से, हम भी यहाँ कहाँ

महबूब मेरा चाँद, मेरा हमनवां कहाँ 
इस बेहुनर शहर में, कोई कद्रदां कहाँ 

कोई बुतखाना,परीखाना, कोई मैक़दा नहीं 
ढूँढें इन्हें कहाँ और अब जाएँ कहाँ कहाँ 

बस रहे खेमों में, हम जैसे हैं जो लोग 
फिर सोचेंगे जाएगा, ये कारवाँ कहाँ 

जाना था तुमको भी तो, उस दूसरी गली
ज़बरन चले आये तुम भी, यहाँ कहाँ !

Thursday, October 25, 2012

अगर बलात्कार की शिकार लड़की/महिला गर्भवती हो जाए तो ??

जीवन कब किस करवट बैठे, कौन जानता है ? हमारे जीवन की अधिकतर घटनाओं-दुर्घटनाओं को हम ईश्वर की इच्छा मान कर आत्मसात कर लेते हैं, लेकिन कुछ घटनाओं को विधि का विधान मानना इतना आसान नहीं, जैसे 'बलात्कार'। 

बलात्कार एक ऐसा हादसा है, जिसे ईश्वर की मर्ज़ी हम नहीं कह सकते, यह सिर्फ और सिर्फ किसी की कुत्सित भावनाओं का परिणाम होता है। जिसे ता-उम्र झेलना, इसकी शिकार नारी का भाग्य।


और अगर, उस बलात्कार के परिणाम स्वरुप, वो लड़की/महिला गर्भवती हो जाए तो क्या उस बच्चे को ईश्वर का वरदान समझा जाएगा ??? अगर ऐसा माना जाएगा तब तो इस जघन्य कृत्य को भी ईश्वर की ही इच्छा माना जाएगा ....


मेरा प्रश्न आपसे, अगर बलात्कार की शिकार लड़की/महिला गर्भवती हो जाए तो :


1. क्या उस बच्चे को वो लड़की/महिला ईश्वर का वरदान समझ कर जन्म दे और पालन-पोषण करे, जो उस जघन्य कृत्य और अन्याय का दुखद परिणाम है ? 


2. या फिर उस बच्चे से वो नफरत करे, जो मानवीय मूल्यों के विरुद्ध होगा ?

3. या फिर गर्भपात करवा दे, जो जीव हत्या जैसे घोर पाप के रूप में  आजीवन अंतरात्मा को झिंझोड़ता रहेगा ?

बलत्कार की शिकार नारी, अगर गर्भवती हो जाए तो, उसे क्या करना चाहिए ? ...जरा आप भी सोचें ...





Tuesday, October 23, 2012

सभ्यता, संस्कृति और सुरुचि



मनुष्य की आधारभूत,
भावनाओं पर, 
चढ़ते-उतरते,
नित्य नए, 
पर्दों का नाम ही,
'संस्कृति' है,
समाज के, एक वर्ग के लिए, 
दूसरा वर्ग,
सदैव ही 'असभ्य' और 'असंस्कृत',
रहेगा...
फिर क्यों भागना 
इस 'सभ्यता और संस्कृति',
के पीछे...??
जहाँ तक 'सुरुचि' का प्रश्न है..
वो अभिजात्य वर्ग की,
'असभ्यता' का... 
दूसरा नाम है..!! 
और उसे अपनाना,
हमारी 'सभ्यता'...??

हाँ नहीं तो  !!
    

Saturday, October 13, 2012

मेरे कदम...


न वो चिनार के बुत,
न शाम के साए,
एक सहज सा रस्ता,
न पिआउ, न टेक |
बस तन्हाई से लिपटे,
मेरे कदम,
चलते ही जाते हैं
न जाने कहाँ ।
मिले थे चंद निशाँ,
कुछ क़दमों के,
पहचान हुई,
चल कर कुछ कदम,
अपनी राह चले गए,
फिर मैं और
तन्हाई से लिपटे
मेरे कदम
चल रही हूँ न...
मैं अकेली.. !!