आज सोचे कुछ अलग हो जावे... बस इसी बहाने पहुँच गए बचपन में...जब हमारे घर गाय बियाई थी...
सुबह-सुबह ग्वाला आता था गाय दुहने और हम होते थे, उनके पीछे पीछे ...नन्हा सा बछड़ा और हमरा हाथ उसकी गर्दन पर सहलाता हुआ...ग्वाला का नाम था 'करुवा'...अब करुवा गाय दुह रहा था ..हमको मालूम था कि कुछ दिन तक उ गाय का दूघ हम लोग नहीं पी सकते हैं ..नई बियाई थी न..उसके दूध से 'खिरसा' बनेगा....
हम बस लटके रहे बछिया के साथ और देखते रहे गाय दुहना, कि अच्च्क्के हमरा मन कैसा-कैसा तो हो गया देख कर...दूध की जगह लहू की धार निकल गयी थी....करुवा रुक गया ..का जानी का किया फिर दुहने लगा और अब दूध ही निकला...
लेकिन उ लहू की धार हमरे मन में अइसन बैठी की बस हमरा दूध पीना बंद..और जो ऊ दिन हमरा दूध पीना बंद हुआ उ आज तक बंद ही है...
इ बात हम सोचते-सोचते अब बुढ़ाने लगे हैं, आज कल शाकाहार की बड़ी तेज़ हवा चल रही है, तो सोचे कि आज बोल ही देवें....
सोचिये...कोई भी जानवर हो या मनुष्य, दूध किसके लिए देता है ??? पक्की बात है प्रकृति ने हर जानवर या मनुष्य को दूध जैसी चीज़ दी है, तो उसी जीव के बच्चे के लिए ही दी है, किसी दूसरे जानवर के लिए नहीं। गाय किसके लिए दूध देती है...??? अपने बच्चे के लिए ही न !!, लेकिन हम मनुष्य उस बछडे के मुँह से दूध छीन कर पी लेते हैं क्या यह सही है ?
क्या यह पाप नहीं है ???
भगवान् ने हम मनुष्यों को भी, माँ का दूध दिया है लेकिन एक उम्र तक के लिए ही....अगर दूध पीना इतना ही ज़रूरी होता तो, हर माँ सारी उम्र दूध देती और हम सब सारी उम्र दूध पीते.. लेकिन ऐसा नहीं है....इसका मतलब यह हुआ कि दूध सिर्फ एक उम्र तक ही ज़रूरी है...फिर भी हम दूध पीते हैं, वो भी किसी और जानवर का और किसी और के हिस्से का दूध छीन कर...
अब आते हैं इस बात पर कि क्या वो दूध सही है हमारे शरीर के लिए....गौर कीजिये....यह दूध गाय या भैंस या किसी भी जानवर का है ...उस दूध में उस जानवार के जीवाणु हैं और उसी प्रजाति के लिए होने चाहिए, हम मनुष्यों के लिए नहीं। गाय के दूध में प्रोटीन, मानव दूध प्रोटीन से भिन्न होता है, गाय या भैंस के दूध में मिलने वाले हारमोंस का मनुष्य के शरीर में कोई काम नहीं है, लेकिन हम उसे जान-बूझ कर अपने शरीर में डाल लेते हैं, क्या यह हमारे स्वस्थ्य के लिए ठीक होता होगा...?? आप बताइए आप क्या सोचते हैं ???
अब बात करते हैं...क्या गाय या भैंस का दूध....शाकाहार है ???
मैं एक बात कभी स्वीकार नहीं कर पाई, वो है...'दूध' को शाकाहारी मानना...दूध एक जैविक पदार्थ है...वो पशु के शरीर से निकाला जाता है, उसका सीधा संपर्क एक जानवर से है...उसमें उस जीव के रक्त के अंश हैं, बैक्टेरिया है, हारमोंस हैं, वसा है...फिर भी उसे शाकाहारी के नाम पर हर मांगलिक अवसर पर प्रयोग में लाया जाता है...जबकि भारत को छोड़ कर बाकी जितने भी देशों में मैं गई हूँ इसे ..'मांसाहार' माना जाता है...दही की बात करें तो, बिना बैक्टेरिया के दही का जमना ही नहीं हो सकता, और क्योंकि वो बैक्टेरिया नज़र नहीं आ रहे इसका अर्थ यह हरगिज़ नहीं कि, वो हैं ही नहीं ...
मेरे विचाए से दूध शाकाहार नहीं है, दूध में काफी मात्रा में, एनिमल फैट होता है, जो सैचुरेटेड फैट के रूप में होता है, और वसा का अर्थ है, चर्बी या तेल, जो उसी जानवरके शरीर का होता है, उनमें जो सैचुरेटेड वसा होती है, वो मनुष्य के शरीर के वसा से भी भिन्न होगी, तो कहने का अर्थ यह हुआ कि हमारे शरीर में इन जानवरों के शरीर से जीवाणु, हारमोंस, प्रोटीन्स, रक्त के अंश और वसा सीधे-सीधे चले जाते हैं, फिर भी हम कहते हैं कि दूध शाकाहारी है ....
और अगर कोई ज़बरदस्ती कहे कि दूध शाकाहार है तो क्यूँ और कैसे भला ????
सोचिये और आप जवाब दीजिये न.....
तो हो गए तीन प्रश्न ...
१. क्या किसी जानवर के बच्चे के हिस्से का दूध उससे छीन कर हम मनुष्यों का पीना सही है ?
क्या Animal Protection Act इसके लिए काम करेगा...?
२. दूध पीने से क्या दूसरे जानवर के जीवाणु, हारमोंस, बैक्टेरिया, वसा इत्यादि हमें नुक्सान पहुंचा सकते हैं ?
३. क्या दूध वास्तव में शाकाहार है ??