Wednesday, January 20, 2010

ये ज़मीं खून से नहाई है



ये ज़मीं खून से नहाई है
देख अब आसमाँ की बारी है

लाशों के ढेर से मैं लिपटी रही
उसमें क़िस्मत मेरी बेचारी है

नींद आ जायेगी सुकूँ से मुझे
दिल में उसने छुरी उतारी है

है मकानों का क्या वो बनते रहे 
संग तेरे जीयें जिद्द हमारी है

आँखें काजल बिना हसीं हैं 'अदा'
इन में तस्वीर जो तुम्हारी है


26 comments:

  1. "नींद आ जायेगी सुकूँ से मुझे
    दिल में उसने छुरी उतारी है"


    वाह!

    ReplyDelete
  2. नींद आ जायेगी सुकूँ से मुझे
    दिल में उसने छुरी उतारी है

    बेहतरीन,
    ये तो चीर निद्रा की तैयारी है

    बसंत पंचमी की शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  3. ये ज़मीं खून से नहाई है
    देख अब आसमाँ की बारी है

    बहुत खूब ग़ज़ल कही है.....खूबसूरत अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  4. है मकानों का क्या वो बनते रहे
    संग तेरे जियें जिद्द हमारी है
    हज शे’र उत्तम है। पर यह विशेष पसंद आया क्यूं कि यह ज़िद मैं भी पालता हूं।

    ReplyDelete
  5. Namaste,

    Adaa ne jiss adaa se likha hai wo kaabil-e-tareef hi nahi parr ruuh tak ko hila deta hai...

    Puri tasveer mann mein bann jati hai padne ke baad... issi ko shayad khoobsurati kehte honge :)
    Bahut sundar likha hai...

    Prem Sahit,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

    ReplyDelete
  6. प्रणाम अदा जी बहुत ही खूब हर लायन सारगर्भित सी अपने में अनेक अर्थ (वैसे मेरे देखने का नजरिया भी हो सकता है )समेटे हुए
    खाश कर ये लायन
    नींद आ जायेगी सुकूँ से मुझे
    दिल में उसने छुरी उतारी है
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर रचना. वसन्तपंचमी की शुभकामनायें.

    ReplyDelete
  8. आँखें काजल बिना हसीं हैं 'अदा'
    इन में तस्वीर तुम्हारी है
    kya khoob likha di..

    ReplyDelete
  9. गजल पढूं की चित्र देखूं -शफ्फाक ये शब्द कौंध रहा है मन में अभी तो आफिस में हूँ घर जाकर देखता हूँ इसके मतलब क्या है -आप हैं इसलिए रिस्क लेता हूँ दुसरे के ब्लॉग पर तो खदेड़ लिया जाउंगा

    ReplyDelete
  10. बेहतरीन गज़ल ! ये लाइनें ज्यादा सुन्दर लगीं -
    "है मकानों का क्या वो बनते रहे
    संग तेरे जियें जिद्द हमारी है ।"
    आभार ।

    ReplyDelete
  11. मै कोई काव्य का विश्लेषक नही लेकिन पढ कर जो मुझे सकून देता है वही मेरे लिये अच्छा है और आपकी कविताये सच मे दिल के करीब होती है

    ReplyDelete
  12. बहुत सुन्दर तरीके से आपने एक व्यथा का वर्णन किया है. अति सुन्दर.

    ReplyDelete
  13. बहुत सुंदर रचना सच सी लगती है.
    बसंत पंचमी की शुभकामनाएं

    आज कल आप का ब्लांग खुलने मै बहुत समय लेता है कभी कभार हेंग भी हो जाता है.

    ReplyDelete
  14. आँखें काजल बिना हसीं हैं 'अदा'
    इन में तस्वीर जो तुम्हारी है

    ek la-jawaab sher.....waah !!
    aur ye..
    लाशों के ढेर से मैं लिपटी रही
    उसमें क़िस्मत मेरी बेचारी है
    ...??....??
    jane kyu...(??)aisa hote hue bhi
    achhaa lagaa...
    ):

    ReplyDelete
  15. तेरी हर अदा पे कुर्बान ,
    समझा नहीं अब तक मैं,
    कौन सी कम , और ,
    कौन सी ज्यादा प्यारी है ॥

    अजय कुमार झा

    ReplyDelete
  16. बह्र में है अदा जी..
    ९९.९९ %...बह्र में.
    रदीफ़ काफिये कि तो हम कोई परवाह नहीं करते हैं...

    लेकिन जरा जल्दी में कही गयी है...

    ReplyDelete
  17. bahut khubsurat gazal hai Adaji ! bahut hi badhiya.

    ReplyDelete
  18. है मकानों का क्या ...बनते रहे ...
    संग तेरे जिए जिद हमारी है ...
    यही तो है मकानों को घर बनाने वाली अदा ....

    आँखें काजल बिन कारी हैं ...कोई कारा बसा है नैनन में ..:)

    ReplyDelete
  19. है मकानों का क्या वो बनते रहे
    संग तेरे जीयें जिद्द हमारी है

    Extremely profound thoughts!
    And the verse saahab kya kahana!
    Sir you have told more than what you wrote.
    Namaste!

    ReplyDelete
  20. आपकी ये ख़ूनी अदा भी ज़बरदस्त है...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  21. है मकानों का क्या वो बनते रहे
    संग तेरे जीयें जिद्द हमारी है

    आँखें काजल बिना हसीं हैं 'अदा'
    इन में तस्वीर जो तुम्हारी है
    अदाजी,
    पंक्तिया बांधने वाली और कुछ उदासी लिए भी थी.तस्वीर में संगमरमर सी मूरत किसकी है!

    ReplyDelete
  22. है मकानो का क्या वो बनते रहे ..अच्छी पंक्ति है ।

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर रचना.

    ReplyDelete