Friday, July 31, 2009

किसने कहा हुजूर के तेवर बदल गए

जनाब रिफ़त 'सरोश' साहब की ये ग़ज़ल है, ये ग़ज़ल मुझे बहुत बहुत बहुत पसंद है.....
बहुत साल पहले उन्होंने मुझसे कहा था 'बेटा ये मेरी किताब है, और अब तुम्हारी है मैं चाहता हूँ आप इसमें से अपनी पसंद की ग़ज़लों को धुन में ढालें और गायें' वो दिन और आज का दिन नहीं कर पायी मैं, अब जाकर पता चला की वो इस दुनिया में रहे ही नहीं...बस मन कुछ बैठ सा गया...एक कच्ची-पक्की सी धुन बनायीं है...जो अभी बन ही रही है......अब पता नहीं कब बने.... जो भी बनी है सुन लीजिये...
शायर : जनाब रिफ़त 'सरोश'
संगीत : संतोष शैल
आवाज़ : स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा'


किसने कहा हुजूर के तेवर बदल गए
रुख की शिकन गयी है न माथे के बल गए

उलटी पड़ी है आज मोहब्बत की हर बिसात
ये शातिराने दैहर अजब चाल चल गए

उस अंजुमन में जब उठे सरगराँ उठे
उस अंजुमन में जब भी गए सर के बल गए

क्या लेके जाएँ बज़्म-ए-सुख़न में सिवा-ए-दिल
अल्फाज़ फ़िक्र-ओ-फन की तमाज़त से जल गए

मंजिल पुकारती ही रही ठहरिये 'सरोश'
हम बे-खुदी-ए-शौक़ में आगे निकल गए

Thursday, July 30, 2009

फिरंगी रामायण...

(यह व्यंग मैंने लिखा है, पाश्चत्य सन्दर्भ में, अगर यह घटना आज पश्चिम में हो तो कैसी होगी , पात्रों के नाम हैं
सैम, रीटा, लकी, उर्सुला और रेवन, कहानी शुरू होती है कि सैम और रीटा को वनवास प्रस्थान की आज्ञा मिल गयी है )

हलकी चिकोटी काटी उसने
ले गई किनारे धकिया कर
फिर 'सैम' से बोली 'रीटा'
अपनी बात इठलाकर

कितनी क्यूट स्टेप-मॉम है
डैड भी कितने प्यारे हैं
फोर्टीन वीक्स का वेकेशन दिया है
किस्मत के चमके सितारे हैं

ऐसी शुभ घड़ी में हनी !
तुम कोई पंगा मत डालो
पिकनिक का डब्बा पैक करो
और ट्रेलर की चाभी उड़ा लो

अब अडल्ट हो गए हैं हम, हनी
इन-लास् का हर वक़्त झगड़ा है
मेरा मूड, यहाँ नहीं रहने का
पिअर-प्रेशर भी तगड़ा है

इतनी सी तो शर्त हैं उनकी
गहने-कपड़े छोड़ जाओ
वैसे भी वेकेशंस का रुल है
कच्छा-बनियान ही पाओ

दंडक-लैंड के कॉटेज की
चाभी अगर मिल जाती
तो वेकेशन की खुशियाँ भी
चार-गुनी बढ़ जातीं

एक बात और कहती हूँ
'लकी' को लेकर मत आना
साफ़ साफ़ मना कर देना
या फिर कर देना कोई बहाना

प्राइवेसी में हमारी
बड़ा खलल पड़ जाता है
जब देखो तो वह काटेज के
आगे-पीछे मंडराता है

'उर्सुला' बेचारी यहाँ पर
निपट अकेली रह जावेगी
जब लौट कर हम आवेंगे
कितनी बातें सुनावेगी ?

इस बार सिर्फ हम दोनों ही
वेकेशन मनाने जावेंगे
हो सके तो 'रेवन' को भी
वहाँ पर बुलवावेंगे

कित्ता ब्लैक और टाल है
कित्ता हेंडसम लगता है
काली शर्ट और जींस में
डेन्जल वाशिंगटन लगता है

पिछले सारे डीफ्रेन्सेस भूला कर
उससे हाथ मिलाना है
इस बार वेकेशन में मेरे सैम
पिछला लोचा सुलझाना है

पैरोडी--बॉलीवुड रे तेरा रंग कैसा

यूँहीं दिल किया कुछ पैरोडी देखने का, तो कुछ ऐसा नज़र आया कि सोचा आप सब से भी इसे share कर लिया जाए...
देखिये ज़रा बॉलीवुड का जादू कैसे सर चढ़ कर बोलता है...
अगर आप नहीं झूम गए तो फिर क्या ?????
youtube से साभार...

Tuesday, July 28, 2009

नीम हकीम ख़तरा-ऐ-जान....

'समीर लाल उड़नतश्तरी वाले' लेख पढ़ कर उनके नाम की विवेचना करते करते, मुझे एक कहावत ही कहते है शायद याद आ गयी :
'नीम हकीम ख़तरा-ऐ-जान' बचपन से इसका मतलब यही जाना की जिसे आधा ज्ञान हो उससे खतरा होता है, अंतरजाल की ख़ाक छान ली कहीं मिला:
नीम हकीम खतरा जान (A little knowledge is a dangerous thing.)
कहीं मिला :
Neem Hakeem = Means = A physician lacking in full knowledge of his profession OR A half baked physician . Khatra - e - Jaan = Means = Danger ...
लेकिन हर बार मुझे लगा कही कुछ ठीक नहीं है, कहीं हम उस बेचारे हाकिम के साथ तो ज्यादती नहीं कर रहे, काफी जद्दो-जहद के बाद मुझे इसका असली मतलब समझ में आया है,
वैसे मुझे सबने कहा आप ऐसे ताबड़-तोड़ पोस्टिंग करती हैं.......अच्छा नहीं लगता है......हमें कमेन्ट करने के भी तो सोचना पड़ता है......हुम्म्म्म्म...सॉरी...माफ़ी...बस last chance दे दीजिये please अब ऐसी गलती नहीं करुँगी.... इसके बाद की पोस्टिंग कल ही करुँगी...... हे हे हे ही ही ही ही.... नहीं करुँगी
खैर, तो मैंने जो 'नीम हकीम ख़तरा-ऐ-जान' का सही अर्थ समझा है, सोचा आपलोगों को भी बता ही दूँ, क्योंकि आइन्दा आप भी तो यही इस्तेमाल करेंगे....और मेरे हिसाब से यही इसका असली अर्थ भी है,
वो है:

वो हकीम जो नीम के पेड़ के नीचे सो रहा है, उसकी जान को खतरा है.......

अब आप सब बताइए यही सही अर्थ है या नहीं ??????
और यह अर्थ मैं समीर जी और विवेक जी को समवेत समर्पित करती हूँ, अग्रिम गुरु दक्षिणा के रूप में .....
'अदा'

Sunday, July 26, 2009

प्रतिष्ठा पांचाली की...

पांचाली तुम्हें किस रूप में करुँ मैं स्मरण ?
भार्या कहूँ तुम्हें, पर किसकी कहूँ ?
या मातृतुल्य सोच कर करूँ मैं नमन ?
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

पाँच पति पाकर हुआ तुम्हें अभिमान !
एक ने भी भार्या का क्या दिया तुम्हें सम्मान ?
सम्मानित जीवन का बस दे दो उदाहरण !
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

चौपड़ की गोटी बनी, रिक्त सा जीवन पाया
बिन सोचे-समझे पांडवों ने तुझपर दाँव लगाया
अब बनो वस्तु से नारी और करो मनन
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

फिर नहीं देखा कुलवधुओं को दाँव पे चढ़ते
बस देखा पति को प्रिया की आन पर मरते
सोच द्रौपदी सोच ! अरे कुछ तो करो चिंतन
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

कोई सुभद्रा किसी सभा में कभी न बुलवाई गयी
किसी हिडिम्बा की साड़ी किसी दुर्योधन के हाथ न आई
अपमान की पराकाष्ठा कितनी थी गहन
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

पाँचों के प्रति तेरा समर्पण, कहाँ प्रतिष्ठित माना गया ?
यह तिरस्कार इतिहास में फिर कहाँ जाना गया ?
इस अनुचित रीति का चल न पाया चलन
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

सब बनने की लालसा में तू कुछ न बन पाई !
पत्नी का स्थान रिक्त रहा, तू माता भी न कहलाई !
भोग्या से भार्या तक की दूरी थी कठिन
पांचाली तुम्हें किस रूप में करूँ मैं स्मरण ?

खुदाई...

दिखाया जाहिरा से खूब मंज़र आशनाई का
अजब फिर खेल खेला है,खुदी जम के खुदाई का

दिखाए तूने क्या-क्या कारनामे,क्या जवाब उनका
खुला हैरत से बस मुंह रह गया है तमाशाई का

कहा आँखों ने क्या और दिल न जाने क्या समझ बैठा
कमाल ऐसा भी हमने देखा है तेरी खुदाई का

न नजरें जब रहीं रोशन, न जिस्मों में गठीलापन
लिया बस नाम इन्सां है तब तेरी खुदाई का