Sunday, November 15, 2009

नफरत के बीज तूने लाखों लगाए


नफरत के बीज तूने लाखों लगाए
अब इनमें ज़हरीले इन्सां उग आए

एटम बम का है जो मसनद बनाये
काहे फ़िर बैठ उसपे दीपक राग गाये ??

रहते हो संदल के घर में जब बाबू
काबू रख शम्मां पर वो आग न लगाए

धर्म कभी प्रान्त कभी भाषा भड़काए
इक मामूली सा मंजर खूनी हो जाए

ऐसा नही हैं हम सिर्फ़ गँवायें पराये
देखा करीब से थे कुछ अपनों के साए

खायी थी तूने जो आज की वो रोटी
आंसुओं में मेरे वो गए थे पकाए

स्विस की तिजोरी में जो सोना धर आए
मत भूलो 'उसने' भी कई लंके ढहाए

19 comments:

  1. खायी थी तूने जो आज की वो रोटी
    आंसुओं में मेरे वो गए थे पकाए

    aam aadmi ke jajbaaton ka chitran

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  2. नफरत के बीजो से तो जहर ही उगेंगे
    बेहतरीन रचना

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  3. खायी थी तूने जो आज की वो रोटी
    आंसुओं में मेरे वो गए थे पकाए

    waah bahut sunder sher

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  4. आपसी निपुणता नहीं है इसलिए कुछ दिन एक छोटी सी कहानी में लग गए.
    ग़ज़ल और कार्टून बहुत खूब हैं. और ये स्विस बैंक का कोई जुगाड़ बैठ सकता है क्या किसी का खाता अपने नाम हो जाये...

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  5. नफरत के बीज तूने लाखों लगाए
    स्विस की तिजोरी में जो सोना धर आए
    क्या खूब। एक शे'र याद आ गया --
    नफ़रतों के इस धुएं से सांस मेरी घुट गयी,
    सोचता हूं इस जहां में काश! मैं आता नहीं।

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  6. इनकी लंका भी जलेगी जरूर जलेगी !!
    सटीक भावना ...सटीक शब्द
    हमेशा की तरह !

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  7. यही नफरत के बीज देख रहे हैं हम चारों तरफ पौधे बनकर लहलहाते हुए । इन नफरत पैदा करने वालों की रोटियाँ सचमुच आँसुओं से ही पकाई जा रही हैं ।
    खायी थी तूने जो आज की वो रोटी
    आंसुओं में मेरे वो गए थे पकाए

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  8. अच्छा लिखा है आपने । सहज विचार, संवेदनशीलता और रचना शिल्प की कलात्मकता प्रभावित करती है ।

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

    कविता का ब्लाग है-
    http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

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  9. बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाए ....नफरत के जो विष बीज उगाये थे ...फसल तो ऐसी ही लहलहाएगी ...
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...!!

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  10. जबरदस्त और बेहतरीन!!

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  11. "धर्म कभी प्रान्त कभी भाषा भड़काए
    इक मामूली सा मंजर खूनी हो जाए"


    यही तो इस देश की दुखती रग है।

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  12. बेहतरीन रचना ...पसंद आई यह बहुत

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  13. खायी थी तूने जो आज की वो रोटी
    आंसुओं में मेरे वो गए थे पकाए
    याद रखते हैं कभी ये इन आंसुओं के अंगारों पर रोटियाँ सेंकने वाले??...व्यवस्था पर चोट करती एक प्रभावशाली कविता.

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  14. क्या मिलेगा किसी को किसी से,
    आदमी है जुदा, आदमी से...
    हमने सीखा अंधेरों में जीना,
    आप घबरा गए रौशनी से...

    जय हिंद...

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  15. Bhav Paksha : Awesome !!

    एटम बम का है जो मसनद बनाये
    काहे फ़िर बैठ उसपे दीपक राग गाये ??

    kala paksha: No comments !!
    aDaDi Do you know the best part of your writing is that it has same words with different usages.
    "Kinda Nayi Bottel Purani sharab."

    hahaha.

    Bachwa !!
    PS: Aaj kai dino baad comment kar raha hoon sabse pehla aap ke uppar.
    (time dekh lo)

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  16. नफरत के बीज तूने लाखों लगाए
    अब इनमें ज़हरीले इन्सां उग आए
    LAJWAAD RACHNA

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  17. समाज के पतन को व्यंग्यात्मक रूप में उजागर करती सशक्त रचना.
    नीरज जी की पंक्तियाँ याद आतीं है -
    "अब तो कोई मजहब ऐसा भी बनाया जाये,
    जिसमें इन्सान को इन्सान बनाया जाये." .

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