Thursday, September 16, 2010

मैं ज़िन्दगी जलाकर, बार-बार, छोड़ जाऊँगी........



इक ज़ुनून, 
कुछ यादें,
थोड़ा प्यार,
छोड़ जाऊँगी,
इन हवाओं में मैं 
इंतज़ार,
छोड़ जाऊँगी,
ले जाऊँगी साथ,
कुछ महकते रिश्ते,
मेरे नग़मों की बहार 
छोड़ जाऊँगी,
कहीं तो होंगे,
मेरे भी कुछ ग़मगुसार,
जलाकर इक दीया
प्रेम का यहीं कहीं, 
ये मज़ार,
छोड़ जाऊँगी,
कहाँ-कहाँ बुझाओगे,
मेरी सदाओं की मशाल,
मैं ज़िन्दगी जलाकर,
बार-बार,
छोड़ जाऊँगी,
मैं लफ्ज़-लफ्ज़ यक़ीं हूँ,
तुम भी यक़ीन कर लो,
मैं हर्फ़-हर्फ़ 
एतबार,
छोड़ जाऊँगी....!

अब एक नग़मा आपकी नज़र ...

Wednesday, September 15, 2010

tum jaise logon ne hi blogging ki Maa....kar rakhi hai....

एक कमेन्ट आया है ईमेल से....सोचा आपलोगों के साथ  साझा कर लूँ...हो सकता है इनका कहना सही हो....

tum jaise logon ne hi blogging ki Maa....kar rakhi hai , band karo blogging , raham karo blogging par, hindi par , gazalon par , insaaniyat par


इनका कहना है कि मेरे जैसे लोगों की वजह से ही, ब्लॉग जगत गड्ढे में जा रहा है...मैं ब्लॉग्गिंग बंद कर दूँ, क्योंकि मुझे लिखना ही नहीं आता है, न मैं हिंदी भाषा के लिए सही हूँ, न ब्लॉग्गिंग के लिए, न ही इंसानियत के लिए...और न ही ग़ज़लों के लिए ...
 

एक बात स्पष्ट कर दूँ...मैंने कभी भी दावा नहीं किया है कि मैं ग़ज़ल लिखती हूँ...जो भी ख्याल मेरे ज़ेहन में आते हैं ..बस उन्हें एक तरतीब देने की कोशिश करती हूँ..वो बेशक 'ग़ज़ल जैसे' होने का भान देते हैं...लेकिन ग़ज़ल नहीं हैं...न ही आज तक ब्लॉग जगत के माने हुए ग़ज़लकारों ने मेरी पोस्ट्स पर कमेन्ट किया है...ज़ाहिर सी बात है, उनके पास मेरी रचनाओं के लिए कुछ भी कहने को नहीं होता, हो सकता है मेरी रचनाओं को 'ग़ज़ल' संबोधन मिलने से किसी के मन को ठेस लगती हो... तो आज सारे ग़ज़लकारों से क्षमा चाहती हूँ ...और आप सबसे विनती करती हूँ, मेरी रचनाओं को 'ग़ज़ल' न कहें...
न मैं कभी ग़ज़लगो थी, न हूँ और न ही अब होने की मेरी कोई इच्छा है...

बाकी रही हिंदी की बात तो, आज के 'हिंदी दिवस' के दिन मैं भी सोचने पर मजबूर हो गई हूँ, कि क्या सचमुच अंशमात्र ही सही, हिंदी के ह्रास में मैं योगदान कर रही हूँ..??
यदि मेरे आलेख सचमुच हिंदी ब्लॉग जगत के स्तर को नीचे लाने में योगदान कर रहे हैं तो मुझे बताया जाए, क्योंकि हम जैसों के होने से हिंदी ब्लॉग जगत का भला अगर नहीं हो रहा परन्तु चले जाने से होगा तो मैं ख़ुशी से तैयार हूँ..
 

और रही बात इंसानियत की तो, मेरे पास इसके लिए कोई जवाब नहीं है, जब तक आप मुझसे मिलते नहीं हैं, यह साबित नहीं हो सकता...

मैं चाहती तो इस ईमेल को पूरी तरह इग्नोर कर सकती थी, लेकिन मैं स्वयं भी जानना चाहती हूँ, अगर किसी एक भी व्यक्ति के मन में, मेरे लेखन को लेकर कोई असहजता (मैं असहमतियों की बात नहीं कर रही हूँ, वह मेरा अधिकार है) है तो मैं सहज नहीं महसूस करती हूँ...
कहीं सचमुच मेरी लेखनी से, कोई भूल तो नहीं हो रही है...कहीं मैं अनजाने कुछ ऐसा ग़लत तो नहीं कर रही हूँ...?
और अगर ऐसा है, तो मैं स्वयं को बदलने के लिए तैयार हूँ...
आशा है, आप गुणीजन मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...
हाँ नहीं तो...!!


Tuesday, September 14, 2010

तिनका ही था कमज़ोर सा, उसका मुक़द्दर, देखना ....


किस्मत की वीरानियों का, मेरा वो मंजर, देखना 
हैराँ हूँ घर की दीवार के, उतरे हैं सब रंग, देखना 

उड़ता रहा आँधियों में वो, जाने कितना दर-ब-दर 
तिनका ही था कमज़ोर सा, उसका मुक़द्दर, देखना

पोशीदा है ज़मीन के, हर ज़र्रे पर दिलकश बहार 
उतरो ज़रा आसमान से, आएगी नज़र वो, देखना

सोया किया क़रीब ही, फ़रिश्ता दश्त-ए-दिल का 
ख़ुशबू सी उसकी बस गई, महका है शजर, देखना 

है चमक गौहर की कोई, या नज़र में मेरी आब है...






ये थका-थका सा है जोश मेरा, ये ढला-ढला सा शबाब है
तेरे होश फिर भी उड़ गए, मेरा हुस्न क़ामयाब है

ये शहर, ये दश्त, ये ज़मीं तेरी, हवा सरीखी मैं बह चली 
तू ग़ुरेज न कर मुझे छूने की, मेरा मन महकता गुलाब है

ये कूचे, दरीचे, ये आशियाँ, सब खुले हुए तेरे सामने 
है निग़ाह मेरी झुकी-झुकी, ये ग़ुरूर मेरा हिज़ाब है

ये दिल कभी तो धड़क गया, कभी बिखर गया गुलाब सा   
है ख़ुमार तारी क्यूँ 'अदा', क्या जगा हुआ कोई ख़्वाब है ?

है बसा हुआ कोई शऊर है, मेरे ज़ह्न के किसी कोने में 
है चमक गौहर की कोई, या नज़र में मेरी आब है

 

Monday, September 13, 2010

संजोया दुश्मनों को भी, खज़ाना ही बना डाला .....


लिया इक हर्फ़ हाथों में, फ़साना ही बना डाला
थे पत्थर से इन्सां वो, दीवाना ही बना डाला  

निभाई दुश्मनी हमने, बड़ी शिद्दत से दुनिया में
संजोया दुश्मनों को भी, खज़ाना ही बना डाला  

रखा था इक दीया हमने, हमारे घर की चौखट पर
लगी जब आग, शोलों से, तराना ही बना डाला


कई मजबूरियाँ आईं, जफ़ाओं को निभाने में
कहाँ तक उनको समझाते, बहाना ही बना डाला

छुप कर वार करना 'अदा', अच्छा काम नहीं होता
अंधेरों में छुपे थे वो, निशाना ही बना डाला 


ब्लॉग जगत एटम पर बैठा....


छल-कपट, खोट को त्याग
अब झूठ की लंका से भाग

ब्लॉग जगत एटम पर बैठा
छेड़ रहा है दीपक राग

खोल के रखो सोच की खिड़की
डंस लेंगे गफ़लत के नाग

सावन भी अब जल जाएगा
चारों तरफ इशक की आग