Sunday, June 13, 2010

बिखरे हैं मसले हुए इंसानियत के फूल, जो पास ही तहज़ीब के बिस्तर पर पड़े हैं .......


मत पूछो हम कौन हैं
किस ओर चले हैं,
समझो कि मुसाफिर हैं
और सराय में पड़े हैं,
राह रोक लेते हैं  
कुछ पहचाने से लोग,
काम जिनके हैं छोटे
पर नाम बड़े हैं,
हर लम्हा हम मौत की
सरहद पर खड़े हैं,
तूफ़ान से खेल लेते
कभी बवंडर से लड़े हैं,
बिखरे हैं, मसले हुए
इंसानियत के फूल,
जो पास ही तहज़ीब
के बिस्तर पर पड़े हैं .......

25 comments:

  1. एक ग़ज़ल का एक शेर याद आ रहा है दी जो पंखुड़ी और इंसानियत दोनों की तकलीफ बताता है-
    ''खुशबू जो लुटाती है मसलते हैं उसी को,
    एहसान का ये बदला मिलता है कली को.
    डर मौत का और खौफ-ए-खुदा भूल गए हैं
    हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए हैं.''

    फिर से बेहतरीनपने का इतिहास दोहराती हुई कविता... :)

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  2. एक ग़ज़ल का एक शेर याद आ रहा है दी जो पंखुड़ी और इंसानियत दोनों की तकलीफ बताता है-
    ''खुशबू जो लुटाती है मसलते हैं उसी को,
    एहसान का ये बदला मिलता है कली को.
    डर मौत का और खौफ-ए-खुदा भूल गए हैं
    हम दोस्ती एहसान वफ़ा भूल गए हैं.''

    फिर से बेहतरीनपने का इतिहास दोहराती हुई कविता... :)

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  3. बिखरे हैं, मसले हुए
    इंसानियत के फूल,
    इंसानियत के फूल तहज़ीब के बिस्तर पर वो भी मसले हुए
    बहुत खूब ... बहुत बढिया

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  4. इंसानियत के फूल ....
    तहजीब के बिस्तर पर पड़े हैं ...
    बहुत ही खूबसूरत शब्द प्रयोग

    मत पूछो कि हम कहाँ के हैं किधर चल पड़े हैं ...
    कैसे नहीं पूछेंगे जी ...:):)

    बेहतरीन कविता ....!!

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  5. बहुत खूबसूरत पंक्तियां लिखी हैं, लेकिन बहुत जल्दी समेट दी आपने इतनी अच्छी कविता। विस्तार देना था न कुछ।

    आभार स्वीकार करें।

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  6. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

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  7. मसले हुए
    इंसानियत के फूल,
    जो पास ही तहज़ीब
    के बिस्तर पर पड़े हैं .......

    बहुत गहरे भाव
    अद्भुद चित्रण

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  8. आह! बहुत खूब....वाह वाह!

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  9. बहुत सुन्दर भाव और सुन्दर अभिव्यक्ती ....

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  10. Bahut Khoob.. Hamesha ki tarah..
    bahumulya sujhaav ke liye shukriya.. aur honsla afjaai ke liye bhi.

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  11. इंसानियत के फूल तहज़ीब के बिस्तर पर वो भी मसले हुए

    बहुत सुंदर अदा जी ।

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  12. राह रोक लेते हैं
    कुछ पहचाने से लोग,
    काम जिनके हैं छोटे
    पर नाम बड़े हैं,
    वाह
    तहजीब के बिस्तर क्या खूब कहा बधाई

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  13. मत पूछो हम कौन हैंकिस ओर चले हैं,
    समझो कि मुसाफिर हैं और सराय में पड़े हैं,

    दुनिया के सभी दुःख दर्द मिट जाते
    ग़र यही बात समझ आ जाती सभी को ।

    बहुत सुन्दर बात कही है ---आपने अदा जी ।

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  14. waah Ada ji kya baat kahi ekdam sach...aur dipak ji kya sher laaye...waah

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  15. एक छोटी रचना , फिर भी कितनी बड़ी !
    मसले हुए इंसानियत के फूल,जो पास ही तहज़ीब के बिस्तर पर पड़े हैं…
    बधाई !
    लेकिन अदाजी, मैं आपकी ग़ज़लों और गायकी का मुरीद हूं , क्योंकि ख़ुद भी वहीं रमा रचा हुआ हूं ।
    सुनता रहता हूं मैं अक्सर आपको…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  16. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  17. बहुत खूबसूरत पंक्तियां लिखी हैं,

    आभार स्वीकार करें।

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  18. adaa jee ,,namskaar ...abhi shahar se bahar hoon ...jald hi aapke blog par vaapasi hogi ...aap apani lekhani se ise sajaate rahe ....../// filhaal alvaida :(

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  19. सादर !
    फूलों से होता है इस दिल का रिश्ता
    लेकिन ये भी
    कुचले जाते हैं बस दिल के नाम पर
    रत्नेश त्रिपाठी

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  20. सराय में पड़े हैं । दर्शन की देशी अभिव्यक्ति ।

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  21. प्रभावशाली रचना के लिए बधाई!

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  22. वाह अदा जी आपकी रचनाएँ हमेशा प्रभावशाली होती हैं.

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  23. बहुत ही खुबसूरत पंक्तियाँ है, बेहतरीन!

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