Thursday, June 10, 2010

फिर भी बनाऊँगी मैं, एक नशेमन हवाओं में........



मेरे इश्क का जुनूँ,
रक्स करता है फिजाओं में,
तेरे फ़रेब मसलते हैं मुझे
मेरे ही ग़म की छाँव में,
हर साँस से उलझती है
हर लम्हा ज़िन्दगी की, 
लिपटती जाती है देखो
उम्र की ज़ंजीर पाँव में,
ये पागलपन मेरा,
बरामद करवाएगा मुझे,
कब तक छुपूँगी कहो 
सदियों की गुफाओं में,
आंधियाँ मुझसे अब भी 
दुश्मनी निभातीं हैं,
फिर भी बनाऊँगी मैं
एक नशेमन हवाओं में...!

रक्स=नृत्य
नशेमन=घोंसला



30 comments:

  1. शानदार अभिव्यक्ति!!

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  2. सुंदर प्रस्तुति..आभार

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  3. मेरे भोले मासूम मन को इतनी गहरी बात समझ नहीं आ रही
    रक्स और नशेमन क्या होता है ??
    उर्दू के शब्दों का ज्ञान कम मात्रा में है

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  4. नशेमन आँधियों में भी आबाद रहे ...
    हौसला कायम रहे ...!!

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  5. शब्दों का अर्थ बताने हेतु धन्यवाद
    मैं भी यही कहूँगा....."हौसला कायम रहे"
    कविता का अर्थ जान कर बहुत अच्छा महसूस हो रहा है

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  6. हवाओं में घोसला बनाने की बात तो वही करता है जो धारा के विपरीत बहने की कला जानता है। मुझे रचना की आखिरी लाइन बेहद अच्छी लगी क्योंकि यही लाइन शायद बहुत से लोगों का सच है... शायद मेरा भी।

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  7. गज़ब की दीवानगी है, गज़ब की आवारगी,
    आपका ज़ज़्बा नहीं लगता, फ़कत एकबारगी ।

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  8. वाह वाह

    प्रस्तुति...प्रस्तुतिकरण के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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  9. विशुद्ध रूप से प्रेरणादायक...

    कुंवर जी,

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  10. आंधियाँ मुझसे अब भी
    दुश्मनी निभातीं हैं,
    फिर भी बनाऊँगी मैं
    एक नशेमन हवाओं में...!

    बहुत सुंदर !

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  11. आंधियाँ मुझसे अब भी
    दुश्मनी निभातीं हैं,
    फिर भी बनाऊँगी मैं
    एक नशेमन हवाओं में...

    बहुत खुद्दारी है इस रचना में जो बहुत अच्छी लगी .... इश्क़ जब जुनू बन जाता है तो सिर चड़ कर बोलता है ....

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  12. फिर भी बनाऊँगी मैं
    एक नशेमन हवाओं में...
    Thats the spirit.बहुत बढ़िया.

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  13. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  14. बहुत ही ओजपूर्ण रचना...

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  15. आप तो वो हैं जो आंधियों में भी नशेमन को सुरक्षित रखना जानती हैं और दुनिया को दिखाती हैं कि देखो मुझे देखो। बहुत अच्‍छी रचना।

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  16. badhiya abhivyaki.

    aapki post kal 11/6/10 ki charcha munch ke liye chun li gayi he.

    abhaar

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  17. sundar abhivyakti.......badhiyaa

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  18. sundar abhivyakti.......badhiyaa

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  19. हर साँस से उलझती है
    हर लम्हा ज़िन्दगी की,
    लिपटती जाती है देखो
    उम्र की ज़ंजीर पाँव में,
    वाह अति उत्तम बधाई

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