Saturday, July 28, 2012

ज़िन्दगी आ रही हूँ मैं....!

ज़िन्दगी आ रही हूँ मैं....!

अब आप लोगों से 2 महीने तक शायद बात न हो पाए....
लेकिन फिर हमरा कोई भरोसा भी तो नहीं...
शायद आपके बीच हम कहीं नज़र आ जायें :)

बेल्जियम, दिल्ली, राँची , बनारस, कुनकुरी, कटक, गोवा से होते हुए, का पता हम कहाँ प्रकट हो जाएँ :)
मिलते हैं जी फिर आपसे, एक लम्बे  ब्रेक के बाद ।

आप सबको खूब ढेर सारा, हैपी ब्लॉग्गिंग !!!

Friday, July 27, 2012

आखिर लडकियाँ अपने साथी (प्रेमी या पति) में कौन सी खूबियाँ देखना चाहतीं हैं...

प्यार, इश्क, मोहब्बत इन शब्दों में, एक अलग सी धनक होती है । कोई, किसी भी उम्र में हो, मन रूमानी ख्यालों से भर उठता है । इश्क का असर कुछ ऐसा होता है, कि दुनिया खूबसूरत हो जाती है। मौसम रंगीन और समा बस सुहाना-सुहाना हो जाता है। प्यार के इस रंगीन एहसास को महसूस करने के लिए जरुरत होती है, एक अदद उस शख्स की, जिसे देख कर दिल बरबस बोल उठता है, यही तो है वो, जिसका मुझे इंतजार था।

मुझे नहीं मालूम लड़कों को क्या अहसास होता है, शायद लड़के पहली नज़र में प्यार कर बैठते होंगे, लेकिन अधिकतर लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता है । सपने देखना लड़कियों की आदत है, और सपनों में सपनों का  राजकुमार का होना लाज़मी। बेशक वो किसी रियासत का राजकुमार न हो, लेकिन अपने राजकुमार की एक छवि,  हर लड़की के मन में होती ही है, जिसे वो हकीक़त में भी देखना चाहती है । अपने मन में बनाई, इस छवि के अनुरूप ही वह, अपने प्यार को तलाशती है। अक्सर पढ़ती हूँ, नारी के मन की बात तो, ब्रह्मा भी नहीं जानते, तो आइए आज कम से कम, इस बारे में जानने की कोशिश करते हैं, आखिर लडकियाँ अपने साथी (प्रेमी या पति) में कौन सी खूबियाँ देखना चाहतीं हैं ।

1. ईमानदारी और विश्वास, ये वो दौलत है, अगर आपने कमा लिया, तो आपसे बड़ा अमीर कोई नहीं, ये दोनों गुण, हमेशा से ही एक अच्छे रिश्ते की रीढ़ है। हर लड़की चाहती है, कि उसका साथी ऐसा हो, जिस पर सारी  दुनिया, आँख बंद करके यकीन करे । जहाँ तक हो सके, अपनी प्रेमिका के सामने, किसी और से भी, कभी  झूठ मत बोलिए, लड़की के मन में एक आशंका तो आ ही जाती  हैं, जब ये इतनी सफाई से मेरे सामने झूठ (किसी और से ही सही)  बोल सकता है, तो क्या पता कल मुझसे भी बोल ही सकता है, कुछ ऐसे ही ख्याल मन में आ जाते हैं । आपके बिना जाने ही, रिश्ते में हेयर लाइन फ्रैक्चर आ जाता है । हर लड़की चाहती है, कि उसका साथी उनके अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार रहे । लेकिन ऐसी बातों से, विश्वास दरक जाता है । याद रखिये, ईमानदार और विश्वासी पुरुष लड़कियों को बहुत पसंद हैं ।

2. लडकियाँ चाहती हैं कि उनका पार्टनर उसकी और उसके परिवार की इज्ज‍त करने वाला हो। साथ ही उसके मन में अन्य लड़कियों के प्रति भी आदर का भाव हो। दूसरी लड़कियों के प्रति सिर्फ 'आदर' का ही भाव हो, 'फ्लर्ट' का भाव न हो । फ्लर्ट-व्लर्ट जैसी बातें, लडकियाँ ज़रा कम झेलतीं हैं । 'किसी भी कीमत' पर अपनी प्रेमिका या पत्नी के सामने, आप किसी दूसरी लड़की को अहमियत न दें। अगर आप ऐसा करते हैं, तो आप अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं, कुल्हाड़ी पर पैर मार रहे हैं । इन मोस्ट ऑफ़ दी केसेस, जब लड़की, किसी लड़के से प्रेम करती है, तो वो. 200% डेडीकेटेड होती है । उसके डेडीकेशन का हजारवां हिस्सा भी, लड़के में नहीं होता है, और ऐसे में, किसी दूसरी लड़की को तवज़्ज़ो देना, आपकी प्रेमिका के भाग जाने के लिए काफी है । लड़कियाँ, 100% अटेंशन चाहतीं हैं, और अपने प्रेमी का 200% प्यार । अब वो ज़माना भी नहीं रहा कि, आपने मन-ही-मन प्रेम कर लिया औए लड़की को टेलेपैथी से पता चल गया, आप उससे प्रेम करते हैं। जी नहीं, सिर्फ मन ही मन प्यार करने की आदत से भी आपको, बाहर निकलना पड़ेगा, और लड़की सिर्फ प्रेम नहीं, प्रेम का इज़हार भी चाहती है, आपको अपनी प्रेमिका से कहना पड़ेगा, आप उससे प्यार करते हैं, बल्कि उसे महसूस भी कराना पड़ेगा । लडकियाँ, बहुत जल्दी शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना चाहतीं, और अगर आपने ऐसा करने के लिए दबाव डाला तो, आपकी प्रेमिका के बिदकने के बहुत चांस हैं । लडकियाँ, रोमांस ज्यादा पसंद करतीं हैं, बनिस्पत क्रूड शारीरिक सम्बन्ध के ।

3. आज की लडकियाँ चाहती हैं, कि उनका पति या प्रेमी उसे समानता की नजर से देखे। भा‍रत मुख्यत: पुरूष प्रधान देश है। बचपन से ही लड़कियों को अपने पति के अधीन रहने की सीख दी जाती है। बदलते परिवेश के साथ लड़कियों की सोच में भी, आमूल परिवर्तन हुआ है। उनका मानना है, कि पति-पत्नी जीवन रथ के दो पहिए की तरह हैं, जिनका समान होना जरुरी है । आपका बहुत ज्यादा कंट्रोलिंग होना, शुरू-शुरू में लड़की मान भी लेगी, लेकिन बहुत जल्दी ऊब जायेगी, वो चाहेगी, कि आप उसके सपने पूरे करने में उसका, ख़ुशी-ख़ुशी साथ दें । कई बार ऐसा भी होता है, पति या प्रेमी कह देता है, जो तुम्हारे जी में आये करो, लेकिन पत्नी या प्रेमिका, ये नहीं चाहती हैं ।  वो चाहतीं हैं, उनके हर फैसले में आप शामिल हों । आपको नहीं पसंद है, फिर भी आपको पसंद करना होगा और साथ भी देना होगा, अब ये आप कैसे करते हैं, ये सोचिये । लेकिन ऐसा ही है :):)

4. लडकियाँ चाहती हैं कि उसका प्रेमी या पति, उनकी भावनाओं की कद्र करे और हमेशा एक मजबूत आधार की तरह उसका साथ दे । कितनी भी सक्षम लड़की हो, चाहे वो रज़िया सुलतान हो, परन्तु भावनात्मक रूप से लड़की, अपने प्रेमी या पति के सामने , एक साधारण, नाज़ुक सी लड़की ही बनी रहना चाहती है । लड़की अपने प्रेमी या पति को एक मजबूत पेड़ की तरह देखना चाहती है, जिससे लता लिपटी होती है । लेकिन लता अपना वजूद खोना नहीं चाहती । वो यह भी चाहती है, कि जब आप कभी कमज़ोर हो रहे हों आपके लिए 'टेक' बन जाए। 

लड़कियों को बहादुर लड़के पसंद हैं, अपने प्रेमी या पति में वो पौरुष देखना चाहतीं हैं । उनका दिल करता है कि, उनका प्रेमी या पति, हिंदी फिल्म के हीरो की तरह , उसके सम्मान के लिए, हर किसी से टकरा जाए, उसे बचा कर निकाल लाये, फिर चाहे वो भावनात्मक मुसीबतें हों, या दस-बीस गुण्डे  :)

5. अधिकतर लडकियाँ, लड़कों की सूरत से ज्यादा सीरत पर मरती हैं, इसलिए वे चाहतीं हैं कि उनका पार्टनर देखने में चाहे जैसा भी हो, लेकिन इंटेलिजेंट हो, वाचाल नहीं हो, लेकिन वाक्-पटु हो । वो एक शरीफ इंसान ज़रूर हो । शरीफ का मतलब ये नहीं, कि वो 'मुंडू' हो, ज़रुरत पड़ने पर उसे एग्रेसिव भी होना चाहिए । इधर-उधर दिल फेंकने वाले लड़के, लड़कियों को बिलकुल नहीं पसंद । और जो लड़के सिर्फ लड़कियों से ही दोस्ती करते रहते हैं, उनके सामने गिरे-पड़े रहते हैं, ऐसे लड़के तो लड़कियों को पसंद ही नहीं होते । ऐसे लड़कों को समझदार लडकियाँ "भैया" बना कर निकल लेतीं हैं । कई लड़कों को ये खुशफहमी होती है, कि लडकियां बदमाश लड़कों को पसंद करतीं हैं, जो, कूल, नाटी, धुरफंदरई करने में उस्ताद होते हैं, वो इस मुगालते में होते हैं, कि लड़कियाँ, उनसे बहुत इम्प्रेस्ड रहतीं हैं । सच्चाई ये है कि, लडकियाँ सिर्फ इम्प्रेस्ड, ही होतीं हैं, वो भी बहुत क्षणिक, उनसे प्रेम या शादी, नहीं करतीं ।

6. लड़कियों को बहुत बोलने वाले लड़के नहीं पसंद, क्योंकि लडकियाँ खुद बहुत बोलतीं हैं, अगर दोनों बोलने लगे तो सुनेगा कौन ? लड़कियों को सागर की तरह शांत और गहरे लड़के पसंद हैं ।  अगर कोई बोलने वाला भी हो तो अनाप-शनाप बोलने वाला नहीं, बस यूँ समझ लीजिये कि 'जंजीर' फिल्म का अमिताभ या 'आनंद' का राजेश खन्ना, लड़कियों के फेवरेट हैं । लड़कियों को ह्यूमर पसंद आता है, लेकिन छिछोरापन नहीं । जहाँ तक हो सके गालियों से दूर रहे । गालियाँ लड़कियों को 'पुट ऑफ़' कर देतीं हैं । जो लड़के हर वक्त अपनी तारीफ करते हैं, ऐसे लड़के, लड़कियों को पसंद नहीं । लडकियाँ, लड़कों से अपनी तारीफ सुनना चाहतीं हैं, उनकी अपनी नहीं । लेकिन याद रखिये अपनी प्रेमिका या पत्नी की तारीफ़ इतनी भी मत कर दीजिये, कि उसे लगने लगे आप झूठ बोल रहे हैं । बस इतनी ही कीजिये कि उसमें बनावट न झलके, आपकी पत्नी या प्रेमिका, को लगे, आप सच कह रहे हैं । 

कुछ टिप्स आपको दे रही हूँ, इनको आजमाईये सुखी रहेंगे । अगर आप किसी पार्टी में गए, वहां आपने बहुत सुन्दर सी स्त्री या लड़की देखी, आपने उसपर ध्यान भी दिया। घर लौट कर आपकी पत्नी या प्रेमिका ने आपसे पूछ लिया, तुम्हें याद है उस लड़की ने क्या पहन रखा था ? आप सीधे नकार जाईये, कह दीजिये मैंने तो देखा ही नहीं, आप सुखी रहेंगे । अगर जो आपने उसके परिधान और मेकप का सप्रसंग व्याख्या करना शुरू कर दिया तो आपकी क्लास लगने से कोई नहीं रोक सकता :):):)

सुन्दरता के टिप्स लडकियाँ अपने प्रेमी के मुँह से सुनना पसंद नहीं करतीं, ये सब लड़कियों का काम है, वो कहते हैं 'जिसका काम उसी को साजे', इसलिए प्लीज मत दीजियेगा ।

अधिकतर लडकियाँ सीधा-सरल, गंभीर, बहुत प्यार करनेवाला, उसकी कदर करने वाला ही प्रेमी या पति चाहतीं हैं । मिले तो ठीक वर्ना ठोक-पीट के वो भी बना देतीं हैं :):)

हाँ नहीं तो !

(डिस्क्लेमर : हम कोई इश्क-उश्क एक्सपर्ट नहीं हूँ, इसको पढने के बाद अगर आप अपने में कोई बदलाव लाते हैं, और अगर ऊ बदलाव काम नहीं करता है तो हम कोई जिम्मेवारी नहीं लेंगे । आपसे कोई ऐसी लड़की टकरती है, जो कुछ और ही राग अलापती है, तो ऊ अपनी पोस्ट लिखे, और अगर कोई ऐसी टकरती है जो बिलकुल ऐसा ही सोचती है तो ई महज संजोग होगा । ई हमरी अपनी एकदम खाँटी सोच है, ईहाँ लिखने की जिम्मेवारी हम लेते हैं, बाकी इसके चलते कहीं कोई पंगा होता है तो उससे हमरा कोई लेना देना नहीं है...बोल दे रहे हैं  )

Thursday, July 26, 2012

कोई तो बात है, जो हिंदुत्व बहुत कम अपने पंख फैला पाया ...




सारे चित्र हिन्दू विधि-विधान से चर्च में मॉस दर्शाते हैं 
इनदिनों एक खबर सुनने में आ रही है 'असाम' में बंगलादेशी मुसलमानों का आतंक और आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है, जिसके लिए प्रशासन कुछ भी नहीं कर रही है। लगता है, वो दिन अब दूर नहीं कि, ऐसा ही कुछ भारत के अन्य  राज्यों में भी हो । भारतीय जनता और भारत सरकार बैठे हैं, कानों में तेल डाल कर । उनकी बला से जो होना है वो हो जाए ।

कई बार सोचती हूँ, आखिर हिन्दू धर्म का उतना विस्तार क्यों नहीं हुआ ? कोई तो बात है, जो हिंदुत्व बहुत कम अपने पंख फैला पाया ।

सोचने पर जो बात समझ में आती है, वो कुछ ऐसा लगता है :

हिन्दू धर्म, सरल नहीं है, कम से कम, जो हमें और दुनिया को देखने को जो मिलता है । इतने देवी-देवता हैं कि कोई भी परेशान हो जाए। फलतः सबको खुश करने के चक्कर में, हम किसी को खुश नहीं कर पाते । मन्त्र सुनने में अवश्य पवित्र लगते हैं, लेकिन कितने हैं जो इन मन्त्रों का, सही अर्थ समझ पाते हैं, फिर जब अर्थ ही नहीं पता तो आत्मसात क्या करेंगे ? इनका सरलीकरण बहुत आवश्यक है । धर्म पुस्तकों का पठन-पाठन सरल भाषा में होना चाहिए, जिसे सभी समझ सकें । 

हिन्दू धर्मावलम्बियों की सबसे बड़ी ख़ामी है, दुसरे धर्मावलम्बियों को खुल कर नहीं अपनाना। अगर बेटे ने किसी गैर धर्म की लड़की को पसंद कर लिया तो, ये नहीं होगा कि उसे अपना लें और उसे वही प्रतिष्ठा दें, जो अपने धर्म की लड़की को देते। अगर खुदा न खास्ते ऐसा हो भी गया, तो सारी उम्र वो लड़की स्वयं को अपनावाने के लिए संघर्ष करती रह जाती है, और मजाल नहीं कि कोई, उसे सचमुच दिल से अपना ले, शक की तलवार, सारी उम्र उसकी गर्दन पर झूलती ही रह जाती है । नतीज़ा यह, कि वो कभी अपनी हो ही नहीं पाती है। जबकि दुसरे धर्मों में ठीक इसके उलटा है । वो खुश-ख़ुशी जश्न मनाते हुए, लड़की को अपनायेंगे, उसे इतना मान सम्मान मिलेगा, कि वो हंड्रेड परसेंट श्योर हो जायेगी, कि शायद भगवान् ने गलती से उसे ग़लत जगह पैदा कर दिया था , और अब मैं सही जगह आ गयी है ।

इस मामले में ईसाई धर्म प्रचारक बहुत परिपक्व और मेथोडिकल और ओर्गनाइज्द हैं, इनके धर्म-परिवर्तन का तरीका बहुत ही सधा हुआ है। सच पूछिए तो, ये यह काम बहुत प्रेम से करते हैं। और प्रेम से तो किसी को भी जीता जा सकता है ! इस मामले में इनकी स्ट्रेटीजी बहुत सफल है। इन्होने धर्म परिवर्तन के काम के लिए, बहुत छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया है। इस काम के लिए, ये अपनी पूजा-उपासना के तरीकों में भी फेर-बदल करते रहते हैं। ये वक्त, जगह, परिवेश और संस्कृति के अनुसार, खुद के अनुष्ठानों को ढाल लेते हैं। ये अपनी हर चीज़ इतनी बदल देते हैं कि, जिसका धर्म-परिवर्तन होता है, उसे पता ही नहीं चलता, कि उसका धर्म-परिवर्तन हो गया। उसके लिए सब कुछ वैसा ही सामान्य रहता है । 

सबसे अहम् बात है इनकी पूजा-अर्चना, जो हमेशा लोकल भाषा में होती है । दुनिया में आप कहीं भी, किसी भी चर्च में चले जाइए, 'मॉस' उस जगह की स्थानीय भाषा में ही होता हुआ आप देखेंगे । चाहे लन्दन हो, रोम हो, पेरिस हो या झुमरीतलैया । और यह तो बहुत ही सरल मानवीय गुण है, हरेक इंसान अपनी ज़मीन, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा से हमेशा जुड़ा रहना पसंद करता है। इन सबके साथ वो ज्यादा सहज रहता है। पूजा या मॉस में सम्मिलित लोग, जब अपनी भाषा में ईश्वर की अराधना करते हैं, तो वो ईश्वर उनको अपना लगता है और वो खुद को ईश्वर के ज्यादा करीब पाते हैं । उन्हें महसूस होता है, कि ये वही, उनका अपना ईश्वर है, जिसकी अराधना वो करते आये हैं, ये येरुसलम या रोम से आया हुआ कोई अजनबी ईश्वर नहीं है । प्रार्थना स्थल का माहौल ही ऐसा बना दिया जाता है, कि कहीं कुछ बदला हुआ नहीं लगता है। काफी दिनों से, ख़ास करके भारत के, कस्बों, गाँव में, जहाँ भारतीय संस्कृति की पकड़ थोड़ी मजबूत हैं, कथोलिक चर्च ने इस तरह के हथकंडों से भारी संख्या में धर्म-परिवर्तन करवाए हैं ।

मैंने स्वयं, गिरजा घरों में, पूरे हिन्दू रीति से उपासना होते हुए देखा है, बल्कि मैं उस मॉस में शामिल हुई हूँ, जिसमें, भगवा वस्त्र, धोती, ज़मीन पर पूजा की वेदी, कलश, आरती ,पादरी के माथे पर तिलक, और कंधे पर भगवा अंगोछा था। धर्म के प्रसार के लिए यह तरीका सबसे कारगर है, और बहुत ज़रूरी भी । व्यक्ति को धर्म के योग्य नहीं,  बल्कि धर्म के अनुष्ठान को इस योग्य होना चाहिए ताकि, लोग उसे आसानी से अपना सकें। आज के युग में धरम-प्रचार का सबसे अचूक तरीका यही है । पूजा अर्चना करते वक्त भक्त को अजनबियत का अहसास न हो, धर्म उनको अपना लगे, पराया नहीं, । 

वैटिकन इस बात को बहुत अच्छी तरह समझना है, अगर गरीब, कमज़ोर तबके को अपने धर्म में लाना है, तो न सिर्फ उनकी भाषा में , बल्कि उनकी संस्कृति के अनुरूप ही, पूजा-अर्चना करनी होगी, तभी वो इसमें शामिल होंगे, अगर वो लैटिन (LATIN ) पूजा करेंगे, तो ये कम पढ़े-लिखे लोग, क्या समझेंगे भला,उल्टा बिदक जायेंगे ।  कथोलिक धर्म समाज अपने प्रिस्ट्स और सिस्टर्स को इसी बात की ट्रेनिंग भी देता है, लोगों की इस नब्ज़ को बहुत अच्छी तरह पहचान लो, और इसी बात का उपयोग करो धर्म परिवर्तन के लिए ।

ईसाई धर्मप्रचारकों में एक और बहुत अच्छी बात है, वो हमेशा लोगों के घरों तक जाते हैं, और बार-बार जाते हैं । सामने वाले को महसूस कराते हैं कि वो महत्वपूर्ण है । कम से कम तब तक, जब तक वो धर्म-परिवर्तन नहीं कर लेता, उनमें कोई अहंकार नहीं होता, वो गरीब से गरीब इंसान के समकक्ष आकर उनसे अपनत्व से बात करते हैं । उनकी परेशानियों को दूर करने की इतनी कोशिश करते हैं, कि सामने वाले को लगता है, अगर कोई तारनहार है मेरा तो यही है । व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उसे, उतना ही महत्व उनसे मिलता है, जितना किसी उच्च जाति के व्यक्ति को वो देते हैं । उनका व्यवहार सबके साथ बराबर होता है, यह बहुत ही अच्छी नीति है उनकी । एक और अच्छी बात यह भी है, किसी भी गिरजा घर में कोई भी, कभी भी जा सकता है, कोई मनाही नहीं है न ही कोई रोक-टोक है ।

जो आर्थिक रूप से जो निर्बल होते हैं, और हिन्दू वर्ण-विभाजन के अनुसार, जिनका अनुक्रम नीचे है, उनके पास उनका स्वाभिमान और उनकी प्रतिष्ठा बहुत बड़ी होती है । उसके साथ जो खिलवाड़ करता है उसे वो माफ़ नहीं करते और जो उनको मान देता है, उनके साथ वो हो लेते हैं । कथोलिक धर्म-प्रचारक इनलोगों का साथ प्यार से देते हैं, और ये उनके साथ चले जाते हैं।

जबकि, हिन्दू धर्गुरुओं को कभी नहीं देखा है, बाहें फैला कर न्यून वर्णों के लोगों को अपनाते हुए । हाँ उनको पाँच हाथ दूर से खुद को बचाते हुए जाते ही देखा है । हिन्दू पण्डितों का अहम् इतना बड़ा होता है कि प्रेम, दया, सेवा जैसे गुण बिरले ही नज़र आता है । हिन्दू धर्मगुरुओं ने हमेशा इन वर्णों की अवहेलना की है, इनको हेय समझा है, यह बहुत बड़ा कारण है कि हिन्दू अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों में, हिन्दू धर्म से दुसरे धर्मों में धर्म परिवर्तन अत्यधिक देखने को मिलता है ।

हिन्दू धर्मगुरुओं का अहंकार हमेशा आड़े आता रहा है, वो जिससे भी बात करते हैं आसमान में बैठ कर बात करते हैं । पहले मंदिरों में निम्न वर्ण-जाति के लोगों को जाना वर्जित था, सामूहिक कुँवों पर जाना वर्जित था, इनके स्पर्श मात्र से पण्डित अशुद्ध हो जाते थे, जबकि  होना उल्टा चाहिए था, अगर ब्रह्मण शुद्र का स्पर्श कर दे, तो शुद्र ब्रह्मण बन जाए, क्योंकि ब्रह्मण श्रेष्ठ ही माने जाते हैं । थेयोरीटीकली, जो श्रेष्ठ होता है वह पावरफुल होता है । यहाँ अगर ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं तो, उनको पावरफुल होना चाहिए न ! लेकिन यहाँ तो शुद्र के छूने से ब्रह्मण अपवित्र हो जाते थे, फिर पावरफुल कौन हुआ, ब्रह्मण या शुद्र ??

भारत में सारे गुरुओं, माताओं, देवियों को बैन कर देना चाहिए, सबसे ज्यादा गंद इन्होने ही मचाया हुआ है। जितने भी गुरु हुए हैं, अधिकाँश फ्रोड ही निकले हैं, फिर वो सत्य साई बाबा हों, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हों या फिर रजनीश हों । ऐसे जीते जागते भगवानों पर सरकार की तरफ से, प्रतिबन्ध आवश्यक है। जीते-जागते भगवानों से, भारत की भोली जनता को निजात मिलना ही चाहिए । क्योंकि इनके चक्कर में आम जनता, गरीब होती जाती है और इन गुरुओं के बैंक अकाउन्ट मोटे होते जाते हैं । बड़ा अजीब लगता है, जब भोली-भाली जनता ऐसे ढोंगी साधुओं को, सिंहासन पर बिठा कर, भगवान् का दर्ज़ा दे देती है । ऐसी ही बातें हिन्दू धर्म के प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं । यह भी एक बहुत बड़ा कारण है, कि  हिन्दू धर्म का ज्यादा प्रसार नहीं ही हो पाया । हिन्दू धर्मगुरुओं की ये जिम्मेदारी बनती है, कि वो हिन्दू घर्म की अच्छाइयों को सरल रूप में दुनिया के सामने लायें, उनका प्रचार करें, और थोथी मान्यताओं को तिलांजलि देकर, हिंदुत्व का मार्ग प्रशस्त करें।

आज सिर्फ इतना, बाकी फिर कभी।
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए... आवाज़ 'अदा' की..

Wednesday, July 25, 2012

वर्ना तुम अपना रास्ता नापो....!

मैं...! 
एक लड़की हूँ, तो क्या हुआ ??
माना... मैं, किसी की बेटी हूँ, किसी की बहन हूँ । कल मैं किसी की पत्नी बनूँगी, बहु बनूँगी, माँ बनूँगी। मुझे ये सब बनने से कोई इनकार नहीं । लेकिन ये मत भूलो, कुछ भी बनने से पहले, मैं एक इंसान हूँ । मेरे अपने कुछ लक्ष्य हैं, मेरी अपनी कुछ इच्छाएँ हैं, मेरे अपने कुछ सपने हैं, जो सिर्फ और सिर्फ मेरे हैं । और मेरा जीवन सिर्फ मेरा है। हाँ, तुम उसमें शामिल हो सकते हो । तुम्हारे साथ-साथ कुछ और भी शामिल हो सकते हैं, लेकिन मेरा जीवन, मेरा ही रहेगा ।

मुझे बहुत कुछ करना है, बहुत कुछ बनना है, जिनको पूरा करना ही मेरे जीवन का लक्ष्य हैं । ये मुझसे उम्मीद मत करना, कि इनको तिलांजलि देकर, मैं सिर्फ, तुम्हारे घर की बहु, तुम्हारी पत्नी और तुम्हारे बच्चों की माँ बन जाऊँगी । ये सारी भूमिकाएं मैं निभा जाऊँगी, लेकिन मेरी अपनी भूमिका, मैं नहीं भुलाऊँगी । मुझे मेरा अपना वज़ूद, दुनिया में बनाना है, मुझे मेरे अपने लक्ष्य को पाना है और मेरे अपने सपनों को सजाना है । 

इनको पाने से मुझे, कोई नहीं रोक सकता, तुम भी नहीं। मैं तुम्हारे सपनों को पूरा करने में, तुम्हारा साथ दूंगी, तुम भी मेरे सपनों से खिलवाड़ नहीं करोगे। अगर तुम्हें ये मंजूर है, तो मैं तुम्हारे संग जीवन भर चलने को तैयार हूँ , वर्ना तुम अपना रास्ता नापो, और मैं अपना ।


Saturday, July 21, 2012

बात थोड़ी पुरानी है....

आज बस यूँ ही इंटरनेट खंगालते हुए कुछ नज़र आ गया। सोचा क्यूँ न इसे आपलोगों के साथ साझा  कर ही लिया जाए ।

यहाँ से पढ़ा जा सकता है इसे :


अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
09.13.2008
 
आरोही साऊथ एशियन प्रोग्राम ने हिन्दी कविता का प्रसारण

 9 दिसम्बर, 2004 - संध्या 8 बजे कैनेडा की राजधानी ओटवा से 97.9 एफ.एम चिन रेडियो के आरोही साऊथ एशियन प्रोग्रामने हिन्दी कविता का प्रसारण किया। संध्या के पाँच बजे के लगभग श्रीमती स्वप्न मंजूषा शैल ने हिन्दी चेतना के सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी जी के सम्पर्क स्थापित किया कि किसी कारणवश उनके रेडियो अतिथि नहीं आ रहे तो उस समय के दौरान वह रेडियो से हिन्दी कविता का प्रसारण करना चाहती हैं। क्या यह त्रिपाठी जी के लिए सम्भव है कि इतने कम समय में कवियों को एकत्रित कर सकें काव्यपाठ के लिये?
त्रिपाठी जी ने तुरन्त हामी भर दी क्योंकि त्रिपाठी जी जानते थे कि कवि तो अवसर ढूँढते रहते हैं कविता सुनाने के लिए और तिस पर रेडियो प्रसारण! कोई समस्या ही नहीं थी! कुछ टेलीफोन की घंटियाँ बजीं और कविगण तैयार होकर बैठ गये संध्या के 8 बजने की प्रतीक्षा में।
 आरोही कार्यक्रमके नियोजक शैल दम्पति हैं। श्री सन्तोष शैल जी टी.वी. से बहुत लम्बे अस्è से सम्बन्धित रहे हैं। डॉ. स्वप्न मंजूषा शैल स्वयं कवयित्री हैं। यह कार्यक्रम ओटवा क्षेत्र से बाहर अंतरजाल  रुरुरु.ारश्हi. पर भी सुना जा सकता है। संतोष और स्वप्न मंजूषा शैल जी ने न केवल टोरोंटो के हिन्दी चेतना से सम्बन्धित कवियों को ही आमन्त्रित किया बल्कि ओटवा क्षेत्र और माँट्रियॉल के कवियों को भी आमन्त्रित किया। परन्तु कार्यक्रम पर टोरोंटो के कवि ही हावी रहे क्योंकि यहाँ का साहित्य समाज बहुत क्रियाशील है। टोरोंटो से भाग लेने वाले कवियों में से - महाकवि हरिशंकर आदेश, राज महेश्वरी, सुरेन्द्र पाठक, भगवत शरण शरण सरोज सोनी, डॉ. शैलजा सक्सेना, सुमन कुमार घई, पाराशर गौड़ और चेतना के संपादक श्याम त्रिपाठी थे। अन्त में डॉ. स्वप्न मंजूषा शैल जी ने भी अपनी एक हास्य कविता सुनाई। सभी प्रवासी भारतीय श्रोताओं ने उस कविता में अपनी छवि देखी। कविता में मंजूषा जी ने पहली बार कैनेडा में एक प्रवासी के सम्मुख आने वाली बाधाओं का बहुत ही सुन्दरता और रोचक रूप में वर्णन किया है।
मेरी बारी आने पर सन्तोष जी ने साहित्य कुंज के विषय में कई प्रश्न पूछे तथा अपने श्रोताओं को सूचित किया कि रुरुरु.ारश्हi.च के मुख्य पृष्ठ द्वारा भी साहित्य कुंज तक पहुँचा जा सकता है। मैं उनके इस प्रयत्न के लिए आभारी हूँ।
पहली बार कैनेडा में हिन्दी कविता के रेडियो प्रसारण पर साहित्य कुंज शैल दम्पती को धन्यवाद व बधाई देता है और आशा रखता है कि भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा

शक़ मिजाज़ बन गया ...

अब..!
शक़ मिजाज़ बन गया
कुछ सबूत जुटा रही हूँ ,
अलफ़ाज़ तक ख़फा हैं
बिन आवाज़ गा रही हूँ ,
ख़ाली क्यों रहे कहो 
वरक़ कोई शजर का ,
चुप सी धडकनों की   
सुनो सदा सुना रही हूँ ,
पहचान मेरी भी यहाँ ,
डगमग सी हो गयी है ,
पानी में अपने पाँव के,
मैं निशाँ बना रही हूँ...... 

बेकरार दिल तू गाये जा...आवाज़ 'अदा' की...