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Thursday, July 26, 2012

कोई तो बात है, जो हिंदुत्व बहुत कम अपने पंख फैला पाया ...




सारे चित्र हिन्दू विधि-विधान से चर्च में मॉस दर्शाते हैं 
इनदिनों एक खबर सुनने में आ रही है 'असाम' में बंगलादेशी मुसलमानों का आतंक और आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है, जिसके लिए प्रशासन कुछ भी नहीं कर रही है। लगता है, वो दिन अब दूर नहीं कि, ऐसा ही कुछ भारत के अन्य  राज्यों में भी हो । भारतीय जनता और भारत सरकार बैठे हैं, कानों में तेल डाल कर । उनकी बला से जो होना है वो हो जाए ।

कई बार सोचती हूँ, आखिर हिन्दू धर्म का उतना विस्तार क्यों नहीं हुआ ? कोई तो बात है, जो हिंदुत्व बहुत कम अपने पंख फैला पाया ।

सोचने पर जो बात समझ में आती है, वो कुछ ऐसा लगता है :

हिन्दू धर्म, सरल नहीं है, कम से कम, जो हमें और दुनिया को देखने को जो मिलता है । इतने देवी-देवता हैं कि कोई भी परेशान हो जाए। फलतः सबको खुश करने के चक्कर में, हम किसी को खुश नहीं कर पाते । मन्त्र सुनने में अवश्य पवित्र लगते हैं, लेकिन कितने हैं जो इन मन्त्रों का, सही अर्थ समझ पाते हैं, फिर जब अर्थ ही नहीं पता तो आत्मसात क्या करेंगे ? इनका सरलीकरण बहुत आवश्यक है । धर्म पुस्तकों का पठन-पाठन सरल भाषा में होना चाहिए, जिसे सभी समझ सकें । 

हिन्दू धर्मावलम्बियों की सबसे बड़ी ख़ामी है, दुसरे धर्मावलम्बियों को खुल कर नहीं अपनाना। अगर बेटे ने किसी गैर धर्म की लड़की को पसंद कर लिया तो, ये नहीं होगा कि उसे अपना लें और उसे वही प्रतिष्ठा दें, जो अपने धर्म की लड़की को देते। अगर खुदा न खास्ते ऐसा हो भी गया, तो सारी उम्र वो लड़की स्वयं को अपनावाने के लिए संघर्ष करती रह जाती है, और मजाल नहीं कि कोई, उसे सचमुच दिल से अपना ले, शक की तलवार, सारी उम्र उसकी गर्दन पर झूलती ही रह जाती है । नतीज़ा यह, कि वो कभी अपनी हो ही नहीं पाती है। जबकि दुसरे धर्मों में ठीक इसके उलटा है । वो खुश-ख़ुशी जश्न मनाते हुए, लड़की को अपनायेंगे, उसे इतना मान सम्मान मिलेगा, कि वो हंड्रेड परसेंट श्योर हो जायेगी, कि शायद भगवान् ने गलती से उसे ग़लत जगह पैदा कर दिया था , और अब मैं सही जगह आ गयी है ।

इस मामले में ईसाई धर्म प्रचारक बहुत परिपक्व और मेथोडिकल और ओर्गनाइज्द हैं, इनके धर्म-परिवर्तन का तरीका बहुत ही सधा हुआ है। सच पूछिए तो, ये यह काम बहुत प्रेम से करते हैं। और प्रेम से तो किसी को भी जीता जा सकता है ! इस मामले में इनकी स्ट्रेटीजी बहुत सफल है। इन्होने धर्म परिवर्तन के काम के लिए, बहुत छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया है। इस काम के लिए, ये अपनी पूजा-उपासना के तरीकों में भी फेर-बदल करते रहते हैं। ये वक्त, जगह, परिवेश और संस्कृति के अनुसार, खुद के अनुष्ठानों को ढाल लेते हैं। ये अपनी हर चीज़ इतनी बदल देते हैं कि, जिसका धर्म-परिवर्तन होता है, उसे पता ही नहीं चलता, कि उसका धर्म-परिवर्तन हो गया। उसके लिए सब कुछ वैसा ही सामान्य रहता है । 

सबसे अहम् बात है इनकी पूजा-अर्चना, जो हमेशा लोकल भाषा में होती है । दुनिया में आप कहीं भी, किसी भी चर्च में चले जाइए, 'मॉस' उस जगह की स्थानीय भाषा में ही होता हुआ आप देखेंगे । चाहे लन्दन हो, रोम हो, पेरिस हो या झुमरीतलैया । और यह तो बहुत ही सरल मानवीय गुण है, हरेक इंसान अपनी ज़मीन, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा से हमेशा जुड़ा रहना पसंद करता है। इन सबके साथ वो ज्यादा सहज रहता है। पूजा या मॉस में सम्मिलित लोग, जब अपनी भाषा में ईश्वर की अराधना करते हैं, तो वो ईश्वर उनको अपना लगता है और वो खुद को ईश्वर के ज्यादा करीब पाते हैं । उन्हें महसूस होता है, कि ये वही, उनका अपना ईश्वर है, जिसकी अराधना वो करते आये हैं, ये येरुसलम या रोम से आया हुआ कोई अजनबी ईश्वर नहीं है । प्रार्थना स्थल का माहौल ही ऐसा बना दिया जाता है, कि कहीं कुछ बदला हुआ नहीं लगता है। काफी दिनों से, ख़ास करके भारत के, कस्बों, गाँव में, जहाँ भारतीय संस्कृति की पकड़ थोड़ी मजबूत हैं, कथोलिक चर्च ने इस तरह के हथकंडों से भारी संख्या में धर्म-परिवर्तन करवाए हैं ।

मैंने स्वयं, गिरजा घरों में, पूरे हिन्दू रीति से उपासना होते हुए देखा है, बल्कि मैं उस मॉस में शामिल हुई हूँ, जिसमें, भगवा वस्त्र, धोती, ज़मीन पर पूजा की वेदी, कलश, आरती ,पादरी के माथे पर तिलक, और कंधे पर भगवा अंगोछा था। धर्म के प्रसार के लिए यह तरीका सबसे कारगर है, और बहुत ज़रूरी भी । व्यक्ति को धर्म के योग्य नहीं,  बल्कि धर्म के अनुष्ठान को इस योग्य होना चाहिए ताकि, लोग उसे आसानी से अपना सकें। आज के युग में धरम-प्रचार का सबसे अचूक तरीका यही है । पूजा अर्चना करते वक्त भक्त को अजनबियत का अहसास न हो, धर्म उनको अपना लगे, पराया नहीं, । 

वैटिकन इस बात को बहुत अच्छी तरह समझना है, अगर गरीब, कमज़ोर तबके को अपने धर्म में लाना है, तो न सिर्फ उनकी भाषा में , बल्कि उनकी संस्कृति के अनुरूप ही, पूजा-अर्चना करनी होगी, तभी वो इसमें शामिल होंगे, अगर वो लैटिन (LATIN ) पूजा करेंगे, तो ये कम पढ़े-लिखे लोग, क्या समझेंगे भला,उल्टा बिदक जायेंगे ।  कथोलिक धर्म समाज अपने प्रिस्ट्स और सिस्टर्स को इसी बात की ट्रेनिंग भी देता है, लोगों की इस नब्ज़ को बहुत अच्छी तरह पहचान लो, और इसी बात का उपयोग करो धर्म परिवर्तन के लिए ।

ईसाई धर्मप्रचारकों में एक और बहुत अच्छी बात है, वो हमेशा लोगों के घरों तक जाते हैं, और बार-बार जाते हैं । सामने वाले को महसूस कराते हैं कि वो महत्वपूर्ण है । कम से कम तब तक, जब तक वो धर्म-परिवर्तन नहीं कर लेता, उनमें कोई अहंकार नहीं होता, वो गरीब से गरीब इंसान के समकक्ष आकर उनसे अपनत्व से बात करते हैं । उनकी परेशानियों को दूर करने की इतनी कोशिश करते हैं, कि सामने वाले को लगता है, अगर कोई तारनहार है मेरा तो यही है । व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उसे, उतना ही महत्व उनसे मिलता है, जितना किसी उच्च जाति के व्यक्ति को वो देते हैं । उनका व्यवहार सबके साथ बराबर होता है, यह बहुत ही अच्छी नीति है उनकी । एक और अच्छी बात यह भी है, किसी भी गिरजा घर में कोई भी, कभी भी जा सकता है, कोई मनाही नहीं है न ही कोई रोक-टोक है ।

जो आर्थिक रूप से जो निर्बल होते हैं, और हिन्दू वर्ण-विभाजन के अनुसार, जिनका अनुक्रम नीचे है, उनके पास उनका स्वाभिमान और उनकी प्रतिष्ठा बहुत बड़ी होती है । उसके साथ जो खिलवाड़ करता है उसे वो माफ़ नहीं करते और जो उनको मान देता है, उनके साथ वो हो लेते हैं । कथोलिक धर्म-प्रचारक इनलोगों का साथ प्यार से देते हैं, और ये उनके साथ चले जाते हैं।

जबकि, हिन्दू धर्गुरुओं को कभी नहीं देखा है, बाहें फैला कर न्यून वर्णों के लोगों को अपनाते हुए । हाँ उनको पाँच हाथ दूर से खुद को बचाते हुए जाते ही देखा है । हिन्दू पण्डितों का अहम् इतना बड़ा होता है कि प्रेम, दया, सेवा जैसे गुण बिरले ही नज़र आता है । हिन्दू धर्मगुरुओं ने हमेशा इन वर्णों की अवहेलना की है, इनको हेय समझा है, यह बहुत बड़ा कारण है कि हिन्दू अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों में, हिन्दू धर्म से दुसरे धर्मों में धर्म परिवर्तन अत्यधिक देखने को मिलता है ।

हिन्दू धर्मगुरुओं का अहंकार हमेशा आड़े आता रहा है, वो जिससे भी बात करते हैं आसमान में बैठ कर बात करते हैं । पहले मंदिरों में निम्न वर्ण-जाति के लोगों को जाना वर्जित था, सामूहिक कुँवों पर जाना वर्जित था, इनके स्पर्श मात्र से पण्डित अशुद्ध हो जाते थे, जबकि  होना उल्टा चाहिए था, अगर ब्रह्मण शुद्र का स्पर्श कर दे, तो शुद्र ब्रह्मण बन जाए, क्योंकि ब्रह्मण श्रेष्ठ ही माने जाते हैं । थेयोरीटीकली, जो श्रेष्ठ होता है वह पावरफुल होता है । यहाँ अगर ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं तो, उनको पावरफुल होना चाहिए न ! लेकिन यहाँ तो शुद्र के छूने से ब्रह्मण अपवित्र हो जाते थे, फिर पावरफुल कौन हुआ, ब्रह्मण या शुद्र ??

भारत में सारे गुरुओं, माताओं, देवियों को बैन कर देना चाहिए, सबसे ज्यादा गंद इन्होने ही मचाया हुआ है। जितने भी गुरु हुए हैं, अधिकाँश फ्रोड ही निकले हैं, फिर वो सत्य साई बाबा हों, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी हों या फिर रजनीश हों । ऐसे जीते जागते भगवानों पर सरकार की तरफ से, प्रतिबन्ध आवश्यक है। जीते-जागते भगवानों से, भारत की भोली जनता को निजात मिलना ही चाहिए । क्योंकि इनके चक्कर में आम जनता, गरीब होती जाती है और इन गुरुओं के बैंक अकाउन्ट मोटे होते जाते हैं । बड़ा अजीब लगता है, जब भोली-भाली जनता ऐसे ढोंगी साधुओं को, सिंहासन पर बिठा कर, भगवान् का दर्ज़ा दे देती है । ऐसी ही बातें हिन्दू धर्म के प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं । यह भी एक बहुत बड़ा कारण है, कि  हिन्दू धर्म का ज्यादा प्रसार नहीं ही हो पाया । हिन्दू धर्मगुरुओं की ये जिम्मेदारी बनती है, कि वो हिन्दू घर्म की अच्छाइयों को सरल रूप में दुनिया के सामने लायें, उनका प्रचार करें, और थोथी मान्यताओं को तिलांजलि देकर, हिंदुत्व का मार्ग प्रशस्त करें।

आज सिर्फ इतना, बाकी फिर कभी।
छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए... आवाज़ 'अदा' की..