हमारा राष्ट्रीय गान क्या सच-मच राष्ट्र के लिए ही है ?
कहते हैं गुरुदेव रविन्द्र नाथ ठाकुर ने इसे जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा था...
आप क्या कहते हैं ?????
जन गण मन अधिनायक जय हे,
(हे भारत के जन गण और मन के नायक(जिनके हम अधीन हैं)
भारत-भाग्य-विधाता
(आप भारत के भाग्य के विधाता हैं)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा,
(वह भारत जो पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र,)
द्वाविड़, उत्कल, बंग
(तमिलनाडु, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश से बना है)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा,
(जहाँ विन्ध्याचल तथा हिमालय जैसे पर्वत हैं और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ हैं)
उच्छल जलधि तरंगा
(और जिनकी तरंगे उच्छश्रृंखल होकर उठतीं हैं)
तव शुभ नामे जागे
(आपका शुभ नाम लेकर ही प्रातः उठते हैं )
तव शुभ आशिष माँगे
(और आपके आर्शीवाद की याचना करते हैं )
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
(आप हम सभी जनों का मंगल करने वाले हैं, आपकी जय हो)
गाहे तव जयगाथा,
(सभी आपकी ही जय की गाथा गायें)
जन-गण-मंगलदायक जय हे
(हे जनों का मंगल करने वाले आपकी जय हो)
भारत भाग्य विधाता
(आप भारत के भाग्य विधाता हैं)
जय हे, जय हे, जय हे,
(आपकी जय हो, जय हो, जय हो,)
जय, जय, जय, जय हे
(जय, जय, जय, जय हो)
Monday, August 17, 2009
मेरा बनवास
ज़िन्दगी है रूह से
जिस्म एक लिबास
दूर रहना तुमसे
है मेरा बनवास
तेरी ख़ुशी मेरे नगमें
दीद की है आस
तेरी नज्र क्या करूँ
ख़ाली दामन पास
फूल यादों के खिले
पहनूँ खुशबू लिबास
जिस्म एक लिबास
दूर रहना तुमसे
है मेरा बनवास
तेरी ख़ुशी मेरे नगमें
दीद की है आस
तेरी नज्र क्या करूँ
ख़ाली दामन पास
फूल यादों के खिले
पहनूँ खुशबू लिबास
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Saturday, August 15, 2009
जन्नत सा एक पिंजरा बना लीजिये
रौनकें मेरे दिल की चुरा लीजिये.
देना है कुछ मुझे तो सजा दीजिये
लब हैं सूखे हुए जैसे साहिल कोई
आह की इनमें कश्ती चला लीजिये
खिल उठे हैं तसल्ली के बूटे, कई
शाखे-उम्मीद पर भी उगा लीजिये
हैं सदी की कतारों में लम्हे खड़े
गिन नहीं पायेंगे इनको सजा लीजिये
नीम-बाज आँखें कब से हैं सूनी पड़ीं
मुट्ठी भर ख्वाब इनमें छुपा लीजिये
है कहाँ कोई महफूज़ ज़माने में, तो
एक जन्नत सा पिंजरा बना लीजिये
देना है कुछ मुझे तो सजा दीजिये
लब हैं सूखे हुए जैसे साहिल कोई
आह की इनमें कश्ती चला लीजिये
खिल उठे हैं तसल्ली के बूटे, कई
शाखे-उम्मीद पर भी उगा लीजिये
हैं सदी की कतारों में लम्हे खड़े
गिन नहीं पायेंगे इनको सजा लीजिये
नीम-बाज आँखें कब से हैं सूनी पड़ीं
मुट्ठी भर ख्वाब इनमें छुपा लीजिये
है कहाँ कोई महफूज़ ज़माने में, तो
एक जन्नत सा पिंजरा बना लीजिये
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थोडी सी हँसी
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
बाँकेलाल की महफ़िल सजी है...सबको बुलाया है आप भी आइये और थोडी सी हँसी, थोडी सी मुस्कुराहट नोश फरमाइए....
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Friday, August 14, 2009
कुछ भी...
कुछ ठहरे लम्हों ने
पत्थर उठाये हैं
बे-पैरहन यादों पर
जम कर चलायें हैं
शब्-ऐ-खामोशी की
आवाज़ चुरा
हौसले की इक धुन
नजदीकियों ने गाये हैं
अब कैसा तकल्लुफ
तराश दिया मुज्जसिम
टूटते तारों की
रौशनी पाये हैं
कभी फलक पर
या गर्दिश के पार
फेरा मुँह आफ़ताब से
चाँद हम बुझाये हैं
उम्मीद के सामने
खड़ी है 'अदा'
रोनी सी शक्ल लिए
हाथ हम हिलाए हैं
( बे-पैरहन - बिना कपडों के)
(गर्दिश : time)
(फलक : vault of heaven)
पत्थर उठाये हैं
बे-पैरहन यादों पर
जम कर चलायें हैं
शब्-ऐ-खामोशी की
आवाज़ चुरा
हौसले की इक धुन
नजदीकियों ने गाये हैं
अब कैसा तकल्लुफ
तराश दिया मुज्जसिम
टूटते तारों की
रौशनी पाये हैं
कभी फलक पर
या गर्दिश के पार
फेरा मुँह आफ़ताब से
चाँद हम बुझाये हैं
उम्मीद के सामने
खड़ी है 'अदा'
रोनी सी शक्ल लिए
हाथ हम हिलाए हैं
( बे-पैरहन - बिना कपडों के)
(गर्दिश : time)
(फलक : vault of heaven)
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Thursday, August 13, 2009
यूँ हीं..
ख्याल आते रहे
सोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही
इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही
रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही
रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही
बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही
आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही
सोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही
इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही
रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही
रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही
बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही
आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही
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