ख्याल आते रहे
सोहबत में
ज़रुरत के
ज़िन्दगी गुज़रती रही
इशारों को कैसे
जुबां दे दें हम
मोहब्बत बच जाए
दुआ निकलती रही
रेत के बुत से
खड़े रहे सामने
पत्थर की इक नदी
गुज़रती रही
रूह थी वो मेरी
लहू-लुहान सी
बदन से मैं अपने
निकलती रही
बेवजह तुम
क्यों ठिठकने लगे हो
मैं अपने ही हाथों
फिसलती रही
आईना तो वो
सीधा-सादा था 'अदा
मैं उसमें बनती
संवरती रही