कुछ ठहरे लम्हों ने
पत्थर उठाये हैं
बे-पैरहन यादों पर
जम कर चलायें हैं
शब्-ऐ-खामोशी की
आवाज़ चुरा
हौसले की इक धुन
नजदीकियों ने गाये हैं
अब कैसा तकल्लुफ
तराश दिया मुज्जसिम
टूटते तारों की
रौशनी पाये हैं
कभी फलक पर
या गर्दिश के पार
फेरा मुँह आफ़ताब से
चाँद हम बुझाये हैं
उम्मीद के सामने
खड़ी है 'अदा'
रोनी सी शक्ल लिए
हाथ हम हिलाए हैं
( बे-पैरहन - बिना कपडों के)
(गर्दिश : time)
(फलक : vault of heaven)