काव्य मंजूषा
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Monday, August 17, 2009
मेरा बनवास
ज़िन्दगी है रूह से
जिस्म एक लिबास
दूर रहना तुमसे
है मेरा बनवास
तेरी ख़ुशी मेरे नगमें
दीद की है आस
तेरी नज्र क्या करूँ
ख़ाली दामन पास
फूल यादों के खिले
पहनूँ खुशबू लिबास
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