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Friday, July 20, 2012

बस गंगा जल हो...

तेरा आना
पागल दिल हो ,
झलक दिखाना
ख़ुशी का पल हो ,
छुप-छुप रहना
दर्द-ए-दिल हो ,
हाथ ना आना
बीता कल हो ,  
नैन मिलाना
एक ग़ज़ल हो ,
नज़र में मेरी
ताजमहल हो ,
उम्र का हासिल
साथ का पल हो,
पाक़ हो जैसे
तुलसी दल हो ,
अंत समय तुम
बस गंगा जल हो ,

ये समा, समा है ये प्यार का....आवाज़ 'अदा' की 

Thursday, December 31, 2009

कोई है वो अपना सा जो कानों में कुछ कह जाता है


जब ख़्वाब उठ कर हक़ीकत की दीवार में ख़ुद चुन जाता है
तब सात समंदर पार का सपना, सपना ही बस रह जाता है

हर दिन आईने के सामने, अब और ठहरना मुश्किल है
अक्स देखते ही ख़्वाबों का, ताजमहल ही ढह जाता है

मुड़ कर देखा जब ख़ुद को, तो खालीपन था चेहरे पर
पाने से ज्यादा खोने की कितनी कहानी कह जाता है

रिमझिम की फुहार है छाई, भीज रहे अंगना,अंगनाई
देखो न सब भीज गए हैं बस इक मेरा मन रह जाता है

तू ऐसे मत देख मुझे, हैं कई सवाल तेरी आँखों में
रुख की शिकन ठहर गयी है, न माथे से ये बल जाता है

तेरे बस में कहाँ 'अदा', जो तू कोई ग़ज़ल कहे
कोई है वो अपना सा जो कानों में कुछ कह जाता है