Saturday, May 12, 2012

हमारी दोस्ती हमेशा के लिए..!!

चेहरों की किताब है, 
दोस्ती का सैलाब है,
जमघट लगे चेहरों का,
अजीब सा अज़ाब है,
'दोस्ती' की नहीं 
'दोस्तों' का हिसाब है,  
शुक्र है मैंने इस नदी में 
पाँव नहीं डाला 
वरना जाने कहाँ बह जाती 
हज़ारों दोस्त बनाती 
फिर...
इतनों से भला कैसे निभाती ?
अब... 
बाक़ी कैनवस ख़ाली है
सिर्फ़ एक शक्ल लगा ली है 
तुम और मैं 
और हमारी दोस्ती 
हमेशा के लिए..!! 

सुहानी चांदनी रातें हमें सोने नहीं देतीं।..आवाज़ 'अदा' की 

Friday, May 11, 2012

कन्या भ्रूण की हत्या करके बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं, माँ-बाप उस अजन्मी कन्याओं पर....उनका अहसान मानना चाहिए हमें...हम तो उनसे कहेंगे ...कीप ईट अप..!

आज कल कन्या भ्रूण हत्या का बाज़ार गर्म है, लोग इसके विरोध में अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, जो बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लग जाने से लडकियां, महिलाएं सुरक्षित हो जायेंगी ? दहेज़ एक कारण हो सकता है, भ्रूण हत्या का लेकिन सिर्फ वही कारण नहीं हो सकता....आये दिन अखबारों में टी.वी पर बलात्कार, अपहरण, दहेज़ उत्पीडन ये सब कुछ देखने के बाद किसी भी भावी माता-पिता को यह ज़रूर लगता होगा...लड़की का होना ही एक मुसीबत है...कौन इस झंझट में पड़े....और यही सबसे बड़ा कारण है कि इस मुसीबत से बचने के लिए कन्या भ्रूण की हत्या हो रही है...सोचनेवाली बात ये है क्या सचमुच भारत इस योग्य है कि वहां लडकियां पैदा हों ? क्या वास्तव में भारत जैसे देश में लडकियां, महिलाएं सुरक्षित हैं....जब वहां का administration ही सुरक्षा देने की बात पर sure नहीं है तो फिर कोई क्या कह सकता है...शीला दीक्षित का यह कहना  कि क्या ज़रुरत है लड़कियों को रात में बाहर निकलने की, या फिर एक डी.आई. जी का यह कहना कि अगर उसकी बेटी भाग जाए तो उसे जान से मार कर खुद ख़ुदकुशी कर लेना उसे मंज़ूर होगा...ये सब भारत की लचर सामजिक संरचना का भांडा फोड़ रहे हैं...

हम चाहे कितना भी नारा लगा लें 'भारत महान का' ...दिल में हर भारतीय इस बात को अच्छी तरह जानता है, भारत में लडकियां सुरक्षित नहीं हैं...बौद्धिक  एवं आर्थिक रूप से अगर लडकियां सबल भी हो जाएँ, तब भी क्या समाज में रहने वाले भेड़ियों से वो बच सकतीं हैं...उसपर से तुर्रा है आज का फैशन जिसने लड़कियों को और भी वेल्नेरेब्ल बना दिया है...भारत चाहे कितना भी संस्कारों की ढोल पीटता रहे...इस तरह के हादसों के आंकड़े उनके संस्कारों की पोल-पट्टी खोल दे रहे हैं...जब रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं, तो फिर संस्कार जैसी बात और संस्कृति की दुहाई क्या मायने रखती है ???...भारत का ऐसा कोई पुलिस स्टेशन नहीं जहाँ रेप नहीं हुआ है, भारत के अधिकतर मंत्री रेप या अवैध सम्बन्ध से जुड़े हैं..यहाँ तक कि राहुल गाँधी भी रेप केस का मुजरिम है...और ये बनेंगे भारत की नारियों के प्रणेता...

संस्कारी कितने हैं भारतीय, इसका किस्सा ये हैं कि बीच सड़क पर लड़की को गुंडे नंगा करते हैं, ऐसा नहीं कि सब भाग कर छुप गए, या डर गए...नहीं जी, पूरी भीड़ इकट्ठी होकर आखें फाड़-फाड़ कर देखती है ये सबकुछ लेकिन कोई आगे नहीं आता उसे बचाने...नपुंसकता की पराकाष्ठा ये कि पुलिस वाले भी इस रियालिटी शो का आनंद उठा रहे थे...हुनंह संस्कार की बात करते हैं...!!!!

बोलीवुड ने कोई कमी नहीं छोड़ रखी है...शीला की जवानी हो या चिकनी चमेली..भारत आज कल उत्तेजना का बाज़ार बना हुआ है....कोई चैनल, कोई गाना, कोई प्रोग्राम ऐसा नहीं है जिसमें जिस्म की नुमाईश या भोंडे हास्य नहीं हैं...इन चिकनी चमेली के लिए तो बॉडी गार्ड्स हैं, उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता..लेकिन अपना जिस्म दिखा-दिखा कर वो जो उत्तेजित भीड़ खड़ी करतीं हैं उनका कहर बरपता है, समाज से सबसे कमजोर वर्ग की नारियों या बच्चियों पर...जिनमें से ज्यादतर चुप रह जातीं हैं, और जो बोलतीं हैं, उनका बलात्कार सिस्टम बार-बार करता है....

भारत के टी.वी.प्रोग्राम्स अब देखने लायक ही नहीं रहे.... इतने बड़े माध्यम का उपयोग लोग सिर्फ व्यक्तिगत आर्थिक लाभ और गलत बातों को मॉस तक पहुंचाने के लिए कर रहे हैं....मैंने एक भी साईंस का प्रोग्राम, या एडुकेशन के प्रोग्राम्स, बाल सुलभ प्रोग्राम नहीं देखा  है...हर बात फिल्म या क्रिकेट से शुरू होती है और उनमें ही ख़तम हो जाती है...जैसे माहौल आज कल बना हुआ है, ऐसे माहौल में लड़की तो क्या लड़कों की भी क्या ज़रुरत है...आखिर वो बड़े होकर क्या बनने वाले हैं...????

पिछले साल मैं अपनी बेटी को लेकर भारत गयी थी, भारत वो पहली बार गयी थी, लेकिन जिस तरह से लोग उसे देख रहे थे...उसके लिए बड़ा अजीब अनुभव था, वो बार-बार पूछती थी यहाँ लोग इतना घूरते क्यों हैं..क्या बताती उससे क्यों घूरते हैं...!!

कितनी भी रैलियाँ निकाल लीजिये, कितना भी शोर मचा लीजिये...एक बात बिलकुल सच है...भारतीय समाज कन्या, स्त्री, महिला जो भी आप कह लें इनके लायक नहीं है..इसलिए अच्छा ही हो रहा है, जो बेटियाँ पैदा होने से पहले ही मार दी जा रहीं हैं, वैसे भी वो किसी बलात्कार का शिकार होकर रोज़-रोज़ मरतीं, पुलिस स्टेशन जातीं तो पुलिस वाले बलात्कार करते, वकील के पास जाती तो वकील फायदा उठता , मंत्री के पास गुहार लगाती तो मंत्री बलात्कार करता, माँ-बाप की मर्ज़ी से शादी करती तो ससुराल वाले मार देते, अपनी मर्ज़ी से करती तो माँ-बाप मार देते...इतना सबकुछ झेलने से बेहतर है पैदा ही नहीं होना...कन्या भ्रूण की हत्या करके बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं, माँ-बाप उस अजन्मी कन्याओं पर....उनका अहसान मानना चाहिए हमें...हम तो उनसे कहेंगे ...कीप ईट अप..!

Thursday, May 10, 2012

जिन्हें मंदिर की पहचान नहीं, वो रंग महल कह देते हैं....


रुख़  को कभी फूल कहा, आँखों को कवँल कह  देते हैं
जब जब भी दीदार किया, हम यूँ ही ग़ज़ल कह देते हैं

वो परवाना लगता है,  और कभी दीवाना  सा
जल कर जब भी ख़ाक हुआ, शम्मा की चुहल कह देते हैं

जब आकर खड़े हो जाते हैं वो, सादगी लिए उन आँखों में
वो पाक़ मुजस्सिम लगते हैं,  हम ताजमहल कह देते हैं

लगता तो था आज नहीं, हम तो अब उठ पायेंगे
सीने में जो दर्द उठा, चलो उसको अजल कह देते हैं

कितने ही पत्थर क्या जाने हम पर बरसे आज 'अदा'
जिन्हें मंदिर की पहचान नहीं, वो रंग महल कह देते हैं
अजल=मौत

पिया ऐसो जीया में समाय गयो रे...आवाज़ 'अदा' की...


Wednesday, May 9, 2012

चाँद बनना मेरी किस्मत, है मुक़द्दर चाँदनी.....


दिल के बाहर चाँदनी, दिल के अन्दर चाँदनी
चाँद बनना मेरी किस्मत, मेरा मुक़द्दर चाँदनी

बिखरे हुए गुल-बूटे हर सू, फ़ैल गए टीले कई
दश्त में अब कैसे बिछाए, नर्म बिस्तर चाँदनी 

बंद कमरों में अँधेरा,
सीलन भी घुटती हुई 
ऊब कर सोने लगी है, घर के छत पर चाँदनी

हमलावर हैं तेरी यादें, बचना ज़रा मुश्किल मेरा 
तभी तो लेकर है उतरी, फ़लक से खंजर चांदनी

दश्त=जंगल
गुल-बूटे=फूल, कलियाँ
फ़लक=आकाश


और अब एक गीत....
अभी न जाओ छोड़ कर ....ये गीत  सिर्फ़ २ मिनट ४६ सेकेंड का है...बाकी ख़ाली है..असुविधा के लिए खेद है...







Monday, May 7, 2012

गहवारा-ए -अदब , कनाडा में मुशायरे का आयोजन...

गहवारा-ए -अदब , कनाडा ने मुशायरे का आयोजन कल, मई ६, २०१२ को, ओट्टावा में किया गया था...इस आयोजन में हिन्दुस्तान के नामचीन और मशहूर शायरों ने शिरक़त की, जिनमें जनाब वसीम वरेल्वी, जनाब मंज़र भोपाली और जनाब इकबाल अशर ख़ास थे...जिन्हें सुनने का हमें मौका मिला...शाम ६ बजे से रात १ बजे तक लोग अपनी-अपनी जगह से हिल नहीं पाए...मुझे भी इन मशहूर हस्तियों के साथ मंच साझा करने का न सिर्फ मौक़ा मिला, बल्कि उनकी दाद भी भरपूर मिली...जो मेरी ख़ुशकिस्मती थी...और उपरवाले का करम..कुछ तसवीरें साझा कर रही हूँ...

जनाब वसीम बारेल्वी 

जनाब मंज़र भोपाली

जनाब इकबाल अशर


और ये मैं हूँ....
(जब हम तस्वीर लेती हूँ तो सब ठीक रहता है लेकिन जब हमरी ली जाती है तो कैमरा घबरा जाता है....:):))

गुमशुदा.....

क्या तुमने देखा है ?
एक श्वेतवसना तरुणी को,
जो असंख्य वर्षों की है,
पर लगती है षोडशी 
इस रूपबाला को देखे हुए
बहुत दिन हो गए,
मेरे नयन पथराने को आये
परन्तु दर्शन नहीं हो पाए
मैंने सुना है,
उस बाला को कुछ भौतिकवादियों ने
सरेआम ज़लील किया था 
अनैतिकता ने भी,
अभद्रता की थी उसके साथ
बाद में भ्रष्टाचार ने उसका चीरहरण
कर लिया था 
और ये भी सुना है,
कि कोई बौद्धिकवादी,
कोई विदूषक नहीं आया था
उसे बचाने 
सभी सभ्यता की सड़क पर
भ्रष्टाचार का यह अत्याचार
देख रहे थे 
कुछ तो इस जघन्य कृत्य पर खुश थे,
और कुछ मूक दर्शक बने खड़े रहे 
बहुतों ने तो आँखें ही फेर ले उधर से
और कुछ ने तो इन्कार ही कर दिया
कि ऐसा भी कुछ हुआ था 
तब से,
ना मालूम वो युवती कहाँ चली गयी 
शायद उसने अपना मुँह
कहीं छुपा लिया है,
या कर ली है आत्महत्या,
कौन जाने ?
अगर तुम्हें कहीं वो मिले,
तो उसे उसके घर छोड़ आना
उसका पता है :
सभ्यता वाली गली,
वो नैतिकता नाम के मकान में रहती है
और उस युवती को हम
"मानवता" कहते हैं 


आज फिर एक गीत आपकी नज़र..बेकरार दिल तू गाये जा...आवाज़ 'अदा' की...