Monday, September 7, 2009

बंदिशें जाने कितनी हम बिरासत में ले आये हैं

बंदिशें जाने कितनी हम बिरासत में ले आये हैं
अपने दिल की बात हम कहाँ तुम्हें कह पाए हैं

हुकुमरानों की शर्तों पर कहाँ तक कोई जीता है
मेरी हसरतों ने भी अब इन्कलाबी सर उठाएं हैं

आरजूओं को हम अपनी वहीँ दबा कर आये थे
जहाँ तेरे अरमानों ने नए पैर बनवाये हैं

है मुश्किल बड़ा तेरे दिल की जमीं पर अब चलना
क्या जाने किस मोड़ पर तूने कितने रकीब छुपाये हैं

सबने तुझे बे-बहरी का खिताब दे दिया है 'अदा'
क्या हुआ बे-बहर लिखती है सुर में तो तू गाये है

Sunday, September 6, 2009

आज वो "अमर" हो गया

कल !
चमचमाती बोलेरों के काफिले में,
सैकडों बाहुबली,
कभी हुंकार,
तो कभी जयनाद करते हुए,
हथियारों के ज़खीरे के बीच,
कलफ लगी शानदार, गांधीविहीन धोती
और आदर्श रहित, खद्दर के कुर्ते में
एक मुर्दे को लाकर खड़ा कर गए

जिसके विवेक, स्वाभिमान
और अंतःकरण ने बहुत पहले,
ख़ुशी से खुदकुशी कर ली थी

बिना विवेक के वो
दीन-हीन लगता था,
बिना स्वाभिमान के
उसके हाथ जुड़ गए थे,
बिना अंतःकरण के
उसकी गर्दन झुकती ही जा रही थी,
दाँत निपोरे वो याचक बना रहा

हमने वहीँ खड़े होकर,
बिना सोचे,
उसे अभयदान दे दिया,
अगले ही पल उसके दाँत
हमारी गर्दन पर धँस गए

और देखो !
आज वो "अमर" हो गया

ऐसा हो नहीं सकता

मैं ठोकर खाके गिर जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता
गिर कर उठ नहीं पाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

तुम हँसते हो परे होकर, किनारे पर खड़े होकर
मैं रोकर हँस नहीं पाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

अभी जीना हुआ मुश्किल, घायल है बड़ा ये दिल
मैं टूटूँ और बिखर जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

खिजाँ का ये मंज़र है, कभी बादल घना-घन है
मैं छीटों में ही घुल जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

कश्ती की बात रहने दे , समन्दर भी डुबो दे तू
किनारे तैर न पाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

गिरी है गाज हमपर अब, कभी बिजली डराती है
मैं साए से लिपट जाऊँ , ऐसा हो नहीं सकता

सभी सपने कुम्हलाये, तमन्ना रूठे बैठी है
मैं घुटनों पर ही आ जाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता

तू मेरा हैं मैं जानू, ये कायनात तेरी है
मैं तेरा हो नहीं पाऊँ, ऐसा हो नहीं सकता



अगर विडियो देखने की इच्छा है तो बस ....ज़रा सा दायी ओर देखिये 'सुर के साथ' बस यही है जी...

Saturday, September 5, 2009

उसका नज़र आता है

आईने में जब भी हम अपना चेहरा देखें हैं
तेरे चेहरे से क्यों लिपटा नज़र आता है

खुशनसीबी ढूंढ़ते फिरते हैं हम हाथों में
बदनसीबी का क्यों पहरा नज़र आता है

लगा डाले हैं कई पैबंद हमने नासूरों पर
जाने क्यूँ फिर भी कुछ उधड़ा नज़र आता है

इश्क में लुटने का ग़म कौन कमबख्त करता है
ग़म ये है तू मेरा है, पर उसका नज़र आता है

नाखुदा से भी अब हम लगाये क्या उम्मीद
वो ख़ुद ही लहरों से जब डरा नज़र आता है

भीड़ की भीड़ गुम गयी है इस शहर में आज
और ये शहर भी अब लापता नज़र आता है

अब 'अदा' पीछा करे तो कहो किसका करे
वक़्त जब ख़ुद ही यहाँ ठहरा नज़र आता है

Friday, September 4, 2009

बिंदास गुजरती रही...

जोड़कर टुकड़े कई आईने के आज तक
अपने ही अक्स से दरारें मैं भरती रही

सामने मेरे खड़ी है ताबूत सी मेरी ज़िन्दगी
शोर कर रहा है जिस्म पर रूह उतरती रही

दोस्ती है हौसले से और यारी बे-बाकपन से
रोज इनका साथ है पर मन ही मन डरती रही

बह गईं रातें कई और घुल गए कितने ही दिन
पास थे पत्थर के शरर मैं इंतज़ार करती रही

अश्क कुम्हला गए 'अदा' दीद की थी कोटर वहीँ
याद तेरी किरकिरी बन बिंदास गुजरती रही

Wednesday, September 2, 2009

खुद को खड़ा हम पाते हैं

चाल लहू की नसों में जब धीमे से पड़ जाते हैं
मन आँगन के पोर पोर में सपने ज्यादा चिल्लाते हैं

धुंधली आँखों के ऊपर जब, मोटे ऐनक चढ़ जाते हैं
तब अपने बिगड़े भविष्य के साफ़ दर्शन हो जाते हैं

हर सुबह झुर्रियों के झुरमुट,और अधिक गहराते हैं
रोज लटों में श्वेत दायरे और बड़े हो जाते हैं

कुछ देर तो बेटी बेटे जम कर शोर मचाते हैं
फिर एकापन जी भर कर,आपसे चिपट ही जाते हैं

हमसे पहले की पीढी अब विदा लेती ही जाती है
उनके पीछे अब कतार में खुद को खड़ा हम पाते हैं