Showing posts with label खुद को खड़ा हम पाते हैं. Show all posts
Showing posts with label खुद को खड़ा हम पाते हैं. Show all posts

Wednesday, September 2, 2009

खुद को खड़ा हम पाते हैं

चाल लहू की नसों में जब धीमे से पड़ जाते हैं
मन आँगन के पोर पोर में सपने ज्यादा चिल्लाते हैं

धुंधली आँखों के ऊपर जब, मोटे ऐनक चढ़ जाते हैं
तब अपने बिगड़े भविष्य के साफ़ दर्शन हो जाते हैं

हर सुबह झुर्रियों के झुरमुट,और अधिक गहराते हैं
रोज लटों में श्वेत दायरे और बड़े हो जाते हैं

कुछ देर तो बेटी बेटे जम कर शोर मचाते हैं
फिर एकापन जी भर कर,आपसे चिपट ही जाते हैं

हमसे पहले की पीढी अब विदा लेती ही जाती है
उनके पीछे अब कतार में खुद को खड़ा हम पाते हैं