चाल लहू की नसों में जब धीमे से पड़ जाते हैं
मन आँगन के पोर पोर में सपने ज्यादा चिल्लाते हैं
धुंधली आँखों के ऊपर जब, मोटे ऐनक चढ़ जाते हैं
तब अपने बिगड़े भविष्य के साफ़ दर्शन हो जाते हैं
हर सुबह झुर्रियों के झुरमुट,और अधिक गहराते हैं
रोज लटों में श्वेत दायरे और बड़े हो जाते हैं
कुछ देर तो बेटी बेटे जम कर शोर मचाते हैं
फिर एकापन जी भर कर,आपसे चिपट ही जाते हैं
हमसे पहले की पीढी अब विदा लेती ही जाती है
उनके पीछे अब कतार में खुद को खड़ा हम पाते हैं