जोड़कर टुकड़े कई आईने के आज तक
अपने ही अक्स से दरारें मैं भरती रही
सामने मेरे खड़ी है ताबूत सी मेरी ज़िन्दगी
शोर कर रहा है जिस्म पर रूह उतरती रही
दोस्ती है हौसले से और यारी बे-बाकपन से
रोज इनका साथ है पर मन ही मन डरती रही
बह गईं रातें कई और घुल गए कितने ही दिन
पास थे पत्थर के शरर मैं इंतज़ार करती रही
अश्क कुम्हला गए 'अदा' दीद की थी कोटर वहीँ
याद तेरी किरकिरी बन बिंदास गुजरती रही