
हरकीरत हकीर......
नाम बोलो तो लगता है कुछ बोला है.....
रचनाएँ पढो तो लगता है कुछ पढ़ा....
तस्वीर देखो तो लगता हैं कुछ देखा .......
और चोरी करो तो लगा कि कुछ चुराया......
यकीन कीजिये यहाँ से चुराने के लिए सोचना भी कित्ता खतरनाक था आप सोच भी नहीं सकते......अरे दूसरी जगहों से तो चुराना मेरे लिए ऐसे था जैसे.....अपने ड्रेसिंग टेबल पर जाना और काज़ल लगाना..... लोग अगर नाराज़ भी होते न तो हम सम्हाल लेते.....कैसे ???? अरे Experience,,,, confidence !!!!!
लेकिन ये मामला थोड़ा टेढा है.....आपलोग समझ रहे हैं न.....अब क्या हैं अच्छी चीज़ें हमेशा कुर्बानियां लेतीं ही रहतीं हैं, शायद इस खूबसूरत रचना को भी ज़रूरत थी एक कुर्बानी की ...तो भाई मैं हाज़िर हो गई.... अब अगर कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी और मुझे कुछ हो गया तो कृपया १ मिनट का मौन ज़रूर रखियेगा....
हरकीरत जी का परिचय उनकी जुबानी...
क्या कहूँ अपने बारे में...? ऐसा कुछ बताने लायक है ही नहीं बस - इक-दर्द था सीने में,जिसे लफ्जों में पिरोती रही दिल में दहकते अंगारे लिए, मैं जिंदगी की सीढि़याँ चढती रही कुछ माजियों की कतरने थीं, कुछ रातों की बेकसी जख्मो के टांके मैं रातों को सीती रही। ('इक-दर्द' से संकलित)
और अब पढिये एक नायब कृति, जिसे अनगिनत लोगों ने सराहा है......और आज एक बार फिर मौका मिल रहा है पढने का और सराहने का......
(१)
बोलते पत्थर ........
जब कभी छूती हूँ मैं
इन बेजां पत्थरों को
बोलने लगते हैं
ज़िन्दगी की अदालत में
थके- हारे ये पत्थर
भयग्रसित
मेरी पनाह में आकर
टूटते चले गए
बोले......
कभी धर्म के नाम पर
कभी जातीयता के नाम पर
कभी प्रांतीयता के नाम पर
कभी ज़र,जोरू, जमीन के नाम पर
हम ..............
सैंकडों चीखें अपने भीतर
दबाये बैठे हैं ........!!
(२)
मन्दिर मस्जिद विवाद ....
वह ....
कुछ कहना चाह रहा था
मैंने झुक कर
उसकी आवाज़ सुनी
वह कराहते हुए धीमें से बोला......
मैं तो बरसों से चुपचाप
इन दीवारों का बोझ
अपने कन्धों पर
ढो रहा था
फ़िर......
मुझे क्यों तोड़ा गया ....?
मैंने एक ठंडी आह भरी
और बोली, मित्र .......
अब तेरे नाम के साथ
इक और नाम जुड़ गया था
'मन्दिर' होने का नाम ......!!
(३)
भ्रूण हत्या ......
मन्दिर में आसन्न भगवान से
मैंने पूछा .......
तुम तो पत्थर के हो ....
फ़िर तुम्हें किस बात गम ....?
तुम क्यों यूँ मौन बैठे हो......??
वह बोला .......
जहां मैं बसता हूँ
उन कोखों में नित
न जाने कितनी बार
कत्ल किया जाता हूँ मैं .....!!
(४)
आतंक के बाद ......
सड़क के बीचो- बीच
पड़े कुछ पत्थरों ने ...
मुझे हाथ के इशारे से रोका
और कराहते हुए बोले.....
हमें जरा किनारे तक छोड़ दो मित्र
मैंने देखा .....
उनके माथे से
खून रिस रहा था
मैंने पूछा ....
'तुम्हारी ये हालत....?'
वे आह भर कर बोले .....
तुम इंसानों के किए गुनाह ही
इन माथों से बहते हैं .....!!
हरकीरत जी के लिए... .
यह रचना साभार निम्नलिखित लिंक से ली गयी है.....
http://harkirathaqeer.blogspot.com/

