काँच के रिश्तों
का टकराना
टूटना,
और दूरियाँ, बढ़ जाना
न जाने
ये सिलसिला
कब रुकेगा
शायद तब
जब
रिश्ते
टूट जायेंगे
फिर, इतने काँच हम कैसे
समेट पायेंगे ?
कोई न कोई तो चुभेगा
और
तब !
एक रिश्ता बनेगा
जिसमें
दरार होगी
और यकीन मिट
जाएगा
रिश्ता
शक़ में लिपट
जाएगा !