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Friday, January 15, 2010

हिंदी समृद्ध है..


  

(इन दिनों थोड़ी सी व्यस्तता है..इस आलेख को अभी छापने का कोई इरादा नहीं था ..लेकिन यह स्वयं  ही छपने को तत्पर हो गया ..पता नहीं कैसे मेरी इच्छा के विरुद्ध छप गया...मुझे इसपर और थोड़ा काम करना था...दुर्भाग्यवश नहीं कर पायी हूँ....अब जब छप ही गया है, तो मैंने इसे स्वीकार कर लिया ....आप भी कर लीजिये ...धन्यवाद..)

 

हम सभी जानते हैं कि .....भाषा अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जान  सकता है, इस संसार में अनेक भाषाएँ हैं, जैसे-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच , चीनी, जर्मन इत्यादि...

 

हमारी भाषा है ...'हिंदी'.....हिंदी अत्यंत  ही सजीव और प्रगतिशील भाषा रही है....क्योंकि  जन्मकाल से ही यह जनभाषा रही है...

 

विशुद्ध हिंदी का अर्थ यह नहीं कि सिर्फ़ 'तत्सम' और 'तद्भव' शब्दों का प्रयोग हो और 'विदेशज' शब्दों का बहिष्कार.... 

हिंदी ने  दूसरी भाषाओँ  के शब्दों को अपनाने में कभी कोई कोताही नहीं की है...

और यही ...हिंदी की समृद्धि का  बहुत बड़ा कारण है..

 

अक्सर हमलोग अपनी बोल चाल में ऐसे कितने ही शब्दों को प्रयोग में ले आते हैं...जिनका अविर्भाव या व्युत्पत्ति कहाँ से हुई है, हम जानते ही नहीं हैं...आज मेरे आलेख का उद्देश्य है ऐसे ही शब्दों  की पहचान कराना  और आपके समक्ष प्रस्तुत करना....साथ ही आप सब से अनुरोध है कि इस आलेख में आप अपनी तरफ से भी ऐसे शब्दों का योगदान करें...ताकि हमारे पाठक इससे लाभ उठा सकें...


विशेष रूप से विदेशज शब्दों की पहचान अगर हम करें तो ...समझ पाएँगे कि हिंदी का हृदय कितना विशाल है....जिसने अपने आँचल में कितनी ही भाषाओँ को जगह दी है...

जैसा कि आप सभी जानते हैं...उत्पत्ति के आधार पर शब्द के निम्नलिखित चार भेद हैं-:


१ . तत्सम- जो शब्द संस्कृत भाषा से हिन्दी में बिना किसी परिवर्तन के ले लिए गए हैं वे तत्सम कहलाते हैं। जैसे-अग्नि, क्षेत्र, वायु, रात्रि, सूर्य, गृह  आदि...


२ . तद्भव- जो शब्द रूप बदलने के बाद संस्कृत से हिन्दी में आए हैं वे तद्भव कहलाते हैं। जैसे-आग (अग्नि), खेत(क्षेत्र), रात (रात्रि), सूरज (सूर्य), घर (गृह) आदि...


३ . देशज- जो शब्द क्षेत्रीय प्रभाव के कारण परिस्थिति व आवश्यकतानुसार बनकर प्रचलित हो गए हैं वे देशज कहलाते हैं। जैसे-पगड़ी, गाड़ी, थैला, पेट, खटखटाना आदि..


४ . विदेशी या विदेशज- हिंदी को विदेशियों के संपर्क में आने के कई अवसर मिले हैं और इस कारण उनकी भाषा के बहुत से शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे हैं.. ऐसे शब्द विदेशी अथवा विदेशज कहलाते हैं.. जैसे-स्कूल, अनार, आम, कैंची,अचार, पुलिस, टेलीफोन, रिक्शा आदि...


ऐसे कुछ विदेशी या विदेशज शब्दों की सूची नीचे दी जा रही है :


अंग्रेजी- कॉलेज, पैंसिल, रेडियो, टेलीविजन, डॉक्टर, लैटरबक्स, पेन , टिकट, मशीन, सिगरेट, साइकिल, बोतल, ब्लॉग, चैनल, वेबसाईट  आदि...


फारसी- अनार,चश्मा, जमींदार, दुकान, दरबार, नमक, नमूना, बीमार, बरफ, रूमाल, आदमी, चुगलखोर, गंदगी, चापलूसी आदि...


अरबी- औलाद, अमीर, क़त्ल , कलम, कानून, ख़त , फ़क़ीर , रिश्वत, औरत, क़ैदी , मालिक,  ग़रीब आदि...


तुर्की- कैंची, चाकू, तोप, बारूद, लाश, दारोगा, बहादुर आदि...


पुर्तगाली- अचार, आलपीन, कारतूस, गमला, चाबी, तिजोरी, तौलिया, फीता, साबुन, तंबाकू, कॉफी, कमीज आदि...


फ्रांसीसी- पुलिस, कार्टून, इंजीनियर, कर्फ्यू, बिगुल आदि...


चीनी- तूफान, लीची, चाय, पटाखा आदि...


यूनानी- टेलीफोन, टेलीग्राफ, ऐटम, डेल्टा आदि...


जापानी- रिक्शा आदि...