विष वृक्ष की तरह फैलते
इस डाह में,
भर दो अणु अस्त्रों की आग,
जिसकी लपट से
झुलसे चेहरों को,
अपनी असलियत पर आने दो,
गलाने पर जो तुले हैं
हमारी अस्मिता-तरु को,
उन सांप्रदायिक डालियों को काट डालो।
ख़ूब लड़ें हम आओ मिलकर,
मगर टूटने की बात न करें ।
हो जाने दो हाहाकार,
बस एक बार,
कर लो हर फसाद,
बह जाने दो हर मवाद,
द्वेष की काली काई निकल जाने दो,
उज्जवल स्फटिक पथ बन जाने दो,
आलोकित हो जाएगा
रास्ता उत्थान का,
फिर हो जाएगा नव-निर्माण
हमारे मन के वृन्दावन का...