1950 के बाद से, गंगा और हुगली जैसी नदियों के किनारे, आबादी और उद्योग दोनों में ही नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। दोनों नदियों के किनारे बसे नगरों के, नगर निगमों ने भी विषैले औद्योगिक अवशेषों और सीवेज की बहुत बड़ी मात्रा का रुख़, इन नदियों की ओर कर दिया। इन नदियों में कचरा प्रतिदिन 1 अरब लीटर तक समाहित होता है। इतना ही नहीं हिन्दू धार्मिक मान्यताओं का भी, इन नदियों को प्रदूषित करने में बहुत बड़ा हाथ रहा है। हर साल इन नदियों में लाखों की तादाद में मूर्ति विसर्जन, प्रतिदिन फूल, बेलपत्र इत्यादि का विसर्जन भी इनको कलुषित करने में अच्छा ख़ासा योगदान करते रहे हैं। एक और बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है, हिन्दू संस्कृति में मृतकों का दाह संस्कार अक्सर नदियों के तट पर ही किया जाता है। चिता में जली हुई लकडियाँ और अधजले शव भी नदियों में प्रवाहित किये जाते रहे हैं। इनसे भी नदियाँ दूषित होतीं रहीं हैं। पशुओं की लाशें भी बड़ी संख्या में इन नदियों को प्रदूषित करने में योगदान करतीं रहीं हैं। महाकुम्भ जैसे महापर्व में लाखों श्रद्धालू, जब इन नदियों में स्नान करते हैं तो वो भी इन नदियों के पक्ष में नहीं होता है। इन सब कारणों से इन नदियों का जल स्तर न सिर्फ रसातल में चला गया है, इनका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया। बल्कि इन नदियों की स्थिति इतनी गंभीर है कि इनमें स्नान तक करना ख़तरनाक हो सकता है।
गंगा, जमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ हमारे ही जीवन काल में, या तो लुप्त हो गयीं या नदी से नाला बन गयीं। इसका कारण यह है कि हम परम्पराओं को जीवन से ज्यादा महत्त्व देते हैं। परम्परायें कभी भी जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकतीं हैं। परम्परायें समय, परिवेश और आवश्यकताओं के साथ बदलनी चाहियें। कोई भी परंपरा हमारे बच्चों के भविष्य और जनसमूह की आवश्यकताओं से बड़ी हो ही नहीं सकती। जो भी हमारी परम्पराएं बनी हैं वो उस काल, परिवेश और आवश्यकता के अनुसार बनी थीं। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकीं हैं इसलिए परम्पराओं को भी बदलना चाहिए। मूर्ति विसर्जन, फूल-पत्ती विसर्जन, नदी के तीर पर दाह संस्कार, श्मशान घाट, महाकुम्भ स्नान ये सब बंद होना चाहिए। लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए और अपनी धरोहरों को बचाते हुए, कुछ दुसरे विकल्प तलाशने चाहिए। वर्ना प्राकृतिक सम्पदा के नाम पर भारत के पास कुछ भी नहीं बचने वाला है। और एक दिन ऐसा आएगा कि पानी के लिए लोग एक-दुसरे के खून के प्यासे हो जायेंगे।
गंगा, जमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ हमारे ही जीवन काल में, या तो लुप्त हो गयीं या नदी से नाला बन गयीं। इसका कारण यह है कि हम परम्पराओं को जीवन से ज्यादा महत्त्व देते हैं। परम्परायें कभी भी जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकतीं हैं। परम्परायें समय, परिवेश और आवश्यकताओं के साथ बदलनी चाहियें। कोई भी परंपरा हमारे बच्चों के भविष्य और जनसमूह की आवश्यकताओं से बड़ी हो ही नहीं सकती। जो भी हमारी परम्पराएं बनी हैं वो उस काल, परिवेश और आवश्यकता के अनुसार बनी थीं। लेकिन अब परिस्थितियाँ बदल चुकीं हैं इसलिए परम्पराओं को भी बदलना चाहिए। मूर्ति विसर्जन, फूल-पत्ती विसर्जन, नदी के तीर पर दाह संस्कार, श्मशान घाट, महाकुम्भ स्नान ये सब बंद होना चाहिए। लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए और अपनी धरोहरों को बचाते हुए, कुछ दुसरे विकल्प तलाशने चाहिए। वर्ना प्राकृतिक सम्पदा के नाम पर भारत के पास कुछ भी नहीं बचने वाला है। और एक दिन ऐसा आएगा कि पानी के लिए लोग एक-दुसरे के खून के प्यासे हो जायेंगे।
ये तो हुई नदियों पर हो रहे अत्याचार की बात, अब आते हैं हम मानवीय मूल्यों की बात पर :
उन दिनों हम पटना में थे, जाड़े के दिन थे, हम अपनी मामी के घर जा रहे थे। रास्ते में लकड़ी के कोयले की आंच में पंखा हिल-हिला कर भुट्टा भुनती एक गोरी नज़र आई। भुट्टे की सोंधी ख़ुशबू ने ज़बरदस्त आकर्षित किया था, इसलिए ६-७ गरमा-गर्म भुट्टे हम खरीद ही लिए। सोचे तो थे कि मामा-मामी खुश हो जायेंगे। लेकिन ऐसा काहे होता, हमसे तो सब कामवे उलटा होता है :) घर पहुँच कर सारे भुट्टे मामी जी के हाथ में पकड़ा दिए हम । मामी जी पूछने लगीं कहाँ से ला रही हो इतने भुट्टे ? हम बता दिया फलाने जगह से। उन्होंने बिना एक पल गँवाए, सारे भुट्टे कूड़े में फेंक दिए। कहने लगीं इस इलाके में तो क्या, पटना में ही भुने हुए भुट्टे कभी मत खरीदना। मेरे पूछने पर बताया कि पास ही शमशान घाट है। जिस लकड़ी के कोयले में ये भुट्टे भुने जा रहे हैं, वो कोयला उसी श्मशान घाट की चिताओं से आता है। उसी में भुट्टे भून-भून कर बेचा जाता है। हमको तो ऐसा लगा, जैसे हम आसमान से गिर गए !
दिल्ली के हर रेड लाईट पर छोटे-छोटे बच्चे क्यू टिप्स (कान साफ़ करने के लिए रूई लगे हुए तिनके ) बेचते हैं। भरी दुपहरी में बच्चों को पसीना बहाते हुए, कातर नज़रों से ख़रीदने की मनुहार करते देख दया आ ही जाती है। मैंने भी उनका मन रखने के लिए दो-चार डब्बे ले लिए। लेकिन मुझे बताया गया कि इसमें जो रूई है वो 'AIIMS या 'सफदरजंग' जैसे अस्पतालों में ओपरेशन, खून मवाद साफ़ करने के लिए, जो प्रयोग में लाये जाते हैं, वही रूई है। इन अस्पतालों से खून-मवाद आलूदा रूई के ढेर जमा किये जाते हैं और उनको सिर्फ ब्लीच के घोल में में डुबो कर सफ़ेद कर दिया जाता है। उसी ब्लीच्ड रूई को दोबारा प्रयोग में लाया जाता है। हैं न हैरानी की बात !
जितने फूल आप देखते हैं, इन रेड लाईट्स पर बिकते हुए, वो सारे किसी मज़ार, किसी कब्रिस्तान में कब्रों पर या किसी डेड बोडी पर डाले गए या किसी मंदिर में चढ़ाये गए फूल होते हैं। आपको मालूम होना चाहिए, इसलिए बता रहे हैं। इन कामों को अंजाम देने के लिए बहुत बड़ा नेटवर्क है लोगों का। बच्चों का उपयोग इसलिए किया जाता है ताकि हमलोग उल्लू बन सकें। आपका पैसा आपकी अंटी से निकलवाने के लिए क्या-क्या गुर चलाये जाते हैं, ये हम आप कभी सोच भी नहीं सकते।
एक बार दिल्ली में जमुना नदी, जो अब नाला बन चुकी है, में पता नहीं क्या हुआ था, दुनिया भर के कछुवे हो गए थे और पानी कम होने के कारण सब बाहर निकल आये थे। जमुना के किनारे कछुवो ने अण्डों की भरमार कर दी थी। आपको बता दूँ कि कछुवों के अण्डे भी, देखने में मुर्गी के अण्डों जैसे ही नज़र आते हैं। उन दिनों दिल्ली के बाज़ार में कछुवों के ही अण्डे मिलने लगे थे। लोगों ने ये मौका भी नहीं छोड़ा था पैसा बनाने का।
कोई ये ना कहे आकर ' इतना सन्नाटा क्यों है भाई ??' :), इसलिए अब हम शुरू करते हैं, कुछ इधर-उधर की :
अभी पिछले साल ही हम गए थे अजमेर शरीफ, अपने दोस्तों के साथ। उनको अजमेर शरीफ के दर्शन का शौक था तो हम भी साथ हो लिए। सबने कहा, वहाँ चादर ज़रूर चढ़ाना है। तो जी, हम भी ले लिए एक बढ़िया सी चादर। मज़ार के बाहर ही एक दूकान में टंगी हुई थी। अपने हिसाब से हमने बेष्टेशट चादर ली थी। फिर हम सभी लग गए चादर चढ़ाने के लिए लाईन में। बड़ी मुश्किल से रेलम-रेल और ठेलम-ठेल में जूझते हुए, हम पहुँचे मज़ार तक। सच्ची बात कहें, तो हम पहुँचे नहीं थे, पहुँचा दिए गए थे । भीड़ ही इतनी थी। हम तो सोच रहे थे, पहुँचेंगे पीर बाबा के सामने और इत्मीनान से, दिल से पीर बाबा से बात-चीत करेंगे। लेकिन हाय री किस्मत ! पीर बाबा से गप्प-शप्प का कोई चान्से नहीं था। वहाँ एक मिनट भी रुकने की किसी को कोई इजाज़त नहीं थी। बस आप को चल-चल रे नौजवान, रुकना तेरा काम नहीं चलना है तेरी शान, की तर्ज़ पर चलते ही रहना था। ई भी कोई दर्शन हुआ भला ! रुकने का तो नाम भी मत लो। जैसे तैसे पीर बाबा के असिस्टेंट को हमने अपनी टोकरी पकडाई। उन्होंने यूँ उसे लिया जैसे हम पर अहसान किया हो। खैर हम पर तो अहसान किया ही था उन्होंने। लेकिन जिस तरह से चादर और फूल पत्ती उन्होंने पीर बाबा पर फेंका, वो तो पीर बाबा पर भी अहसान कर रहे हैं सुबह-शाम, तो हमरी का बिसात भला !! ख़ैर, इतना चुन कर, मन से खरीदी गयी हमरी चादर शायद एक सेकेण्ड के लिए भी न चढ़ी थी, पीर बाबा पर और चढ़ते साथ ही उतर भी गयी। हमारी आखों के सामने हमरी चढ़ी हुई चादर, देखते ही देखते उसी दूकान में दोबारा बिकने के लिए, उसी जगह टंग गयी, जहाँ हमारे ख़रीदने से पहले, वो टंगी हुई थी। ऐइ शाबाश ! युंकी इसको कहते हैं, आम के आम और गुठलियों के दाम।
वहीँ, दर्शन करने में एक बात और हुई, हमलोग जैसे ही मज़ार के चारों तरफ लगे रेलिंग तक पहुँचे, पता नहीं क्यों, शायद हम शक्ल से ही उल्लू नज़र आते हैं या क्या बात है, एक भाई साहब जो सबको, झाड़ू नुमा चीज़ से झाड रहे थे, उन्होंने हम पर भी झाडू फेर दिया और एक भाई साहब ने फट से मेरे गले में एक धागा डाल दिया। हम समझे पीर बाबा की स्पेशल कृपा हुई है, हम पर। अगले ही पल हमसे पैसों की दरियाफ्त होने लगी। हमने कहा किस बात के पैसे ? कहने लगे झाडू खाने के और धागा गले में पाने के। हम बोले, ई सब हम तो मांगे नहीं थे, पीर बाबा ने अपनी मर्ज़ी से दिया है। इतना ही बोल पाए थे बस, बाकी का काम, भीड़ के रेले ने ही कर दिया। हम भीड़ के साथ बाहर धकिया दिए गए। उन दोनों भाई साहबों के क्रोध भरे चेहरे अब भी याद हैं। अब सोचते हैं, कभी-कभी भीड़ भी काम की चीज़ होती है। वर्ना कोई न कोई पंगा हो ही जाता :)
वहीँ, दर्शन करने में एक बात और हुई, हमलोग जैसे ही मज़ार के चारों तरफ लगे रेलिंग तक पहुँचे, पता नहीं क्यों, शायद हम शक्ल से ही उल्लू नज़र आते हैं या क्या बात है, एक भाई साहब जो सबको, झाड़ू नुमा चीज़ से झाड रहे थे, उन्होंने हम पर भी झाडू फेर दिया और एक भाई साहब ने फट से मेरे गले में एक धागा डाल दिया। हम समझे पीर बाबा की स्पेशल कृपा हुई है, हम पर। अगले ही पल हमसे पैसों की दरियाफ्त होने लगी। हमने कहा किस बात के पैसे ? कहने लगे झाडू खाने के और धागा गले में पाने के। हम बोले, ई सब हम तो मांगे नहीं थे, पीर बाबा ने अपनी मर्ज़ी से दिया है। इतना ही बोल पाए थे बस, बाकी का काम, भीड़ के रेले ने ही कर दिया। हम भीड़ के साथ बाहर धकिया दिए गए। उन दोनों भाई साहबों के क्रोध भरे चेहरे अब भी याद हैं। अब सोचते हैं, कभी-कभी भीड़ भी काम की चीज़ होती है। वर्ना कोई न कोई पंगा हो ही जाता :)
हरिद्वार गए थे हम, वहाँ तो हम एकदमे हैरान हो गए। एक पंडा जी तो हमरे कुल-खानदान की जनम पत्री ही निकाल दिए, कि फलाने आपके बाप है और अलाने आपके दादा है। बाप रे ! हम तो फटाफट पूजा-पाठ के लिए तैयार हो गए। पूजा करके हम जैसे ही नारियल पानी में फेंके, फट से दो-तीन बच्चे कूद गए पानी में और वही नारियल किनारे ले आये। सेम टू सेम नारियल, सेम टू सेम दूकान और सेम टू सेम हम जैसे लोग, न जाने कब से ऊ नारियल रिसाईकिल हो रहा है, और न जाने कब से लोग जानबूझ कर बुड़बक बन रहे हैं :)
अब बात करते हैं पुष्कर की। कहते हैं ब्रह्मा जी का मंदिर सिर्फ एक ही जगह है और वो है पुष्कर में। पुष्कर में जो तालाब है, उसकी गन्दगी की व्याख्या करने की क्षमता हम में नहीं है। इसलिए आप कुछ भी कल्पना कर लीजिये उसकी पराकाष्ठा तक शायद आप पहुँच जाएँ। खैर, हम जैसे ही पहुँचे ब्रह्मा जी के मंदिर, कमीज-पैंट, धोतीधारी पण्डों ने धावा बोल दिया। हमको बताया गया यहाँ पुरखों के लिए, पिण्ड-दान करना अच्छा होता है। आपकी मर्ज़ी है तो आप कर सकते हैं। यहाँ एक बात बताना ज़रूरी है कि 'आपकी मर्ज़ी' वाली बात, सिर्फ कहने के लिए कही जाती है, उसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। बाकी आपकी कोई भी मर्ज़ी इन जगहों पर नहीं चलती। हम भी सोचे जब यहाँ आ ही गए हैं और इन पण्डों से बच कर जाया जा ही नहीं सकता तो काहे को बेफजूल में कोशिश भी करना, चलो कर ही दो पिण्ड-दान, शायद कुछ अच्छी ही बात होगी। हम पिण्ड-दान करने को तैयार हो गए। लेकिन उन पण्डों को तो, सारे यजमान चाहिए थे। उन्होंने ज़बरदस्ती, उर्सुला और माधुरी से भी, उनके पुरखों के लिए पिण्ड-दान करवा ही दिया, जबकि वो दोनों ही ईसाई हैं। भगवान् जाने उन पण्डों ने उर्सुला और माधुरी के कुल, गोत्र की समस्या कैसे हैंडल किया होगा।ज़रूर होगा उनके पास कोई न कोई शोर्टकट, आई एम श्योर :) । उससे भी बड़ी बात हमको जो सताती है, बेचारियों के पुरखों का क्या हाल हुआ होगा :)
इन सारी घटनाओं को देख कर यही सोचती हूँ, ऐसी पूजा का क्या मतलब होता है, जिसमें न पूजा करने वाले की कोई आस्था है, न करवाने वाले का ध्यान है ? पंडा जी चारों तरफ चकर-मकर खोजी नज़र से अगले शिकार की तलाश करते रहे, मन्त्र सिर्फ मुंह से झरते रहे। न उन मन्त्रों का मतलब पंडा जी को मालूम है, न ही पूजा पर बैठे हुए पूजक को। बस खानापूरी करके दूकान चलाई जा रही है। मैं दूर से दोनों लड़कियों के चेहरों पर 'कहाँ फँस गए यार ' का भाव देखती रही।
आज कल हमलोग अधिकतर पूजा ही करते हैं, प्रार्थना नहीं। मुझे पूजा से बेहतर प्रार्थना लगती है, जिसमें कोई मिडिल मैन नहीं होता। आप डाईरेक्ट अपने आराध्य से बात चीत करते हैं।सबसे अच्छा रहता है, 'ध्यान' करना या मेडिटेशन करना। इससे आप मन पर क़ाबू पाते हैं और शरीर पर संयम भी। मेरे 'वो' हर दिन डेढ़ से दो घन्टे मेडिटेशन करते हैं। हम महसूस करते हैं, बात विचार सब में वो हमसे ज्यादा संतुलित हैं। हम भी मेडिटेशन करना चाहती हूँ, बस हम कर नहीं पाती हूँ :), लेकिन अब हम सीरियसली ठान लिए हैं, कि कोशिश करेंगे मेडिटेशन करने की।
सच पूछा जाए तो दुनिया में जितने भी धर्म हैं और उनके जितने भी धार्मिक स्थल हैं, सभी अपना सही अर्थ खो चुके हैं। वो सभी के सभी तब्दील हो गए हैं, उद्योग में। जहाँ सिर्फ और सिर्फ पैसे की ही बात होती है। न भगवान् से किसी को कोई मतलब है, न भक्तों से। बल्कि इन जगहों में मैंने महसूस किया है सबसे कम ध्यान भगवान् और उसकी भक्ति की तरफ जाता है। इन जगहों पर जाने से, ऐसा लगता है जैसे भगवान् की कृपा वहाँ बिकती है। आप पैसे खर्च करके ईश्वर की कृपा खरीद सकते हैं। जो जितना पैसा खर्चेगा भगवान् की कृपा, उस पर उतनी ही होगी। कभी-कभी तो ऐसा भी महसूस कराया जाता है, इतना पैसा भी है लोगों के पास, जिसे आप दे दें तो पूरे भगवान् ही उनके हो जायेंगे।
सबसे ज्यादा हँसी आती है, मन्नत मानना। और यह हर धर्म में है। भगवान्, पीर, संत, गॉड जिस नाम से भी आप बुलाएं, इनके सामने हम जैसे मूढ़ शर्त रखते हैं, कि हे भगवान् या पीर या संत या गॉड मेरा ये काम कर दोगे तो मैं तुम्हें ये चीज़ दूँगा। ये हमारी धृष्टता की पराकाष्ठा है। हम अपनी औक़ात भूल जाते हैं, क्या सचमुच हम भगवान् को कुछ भी देने के काबिल है ?? क्या भगवान् को कुछ भी चाहिए होता होगा ??? कितने अहमक है हम, भगवान् न दे तो हम एक सांस नहीं ले सकते हैं और उसी भगवान् के सामने शर्त रख कर हम उसे देने की कोशिश करते हैं, जिसे देने की औकात भी हमें वही भगवान् देता है। गज़बे हैं हमलोग भी :)
आप किसी भी धर्म के बड़े धार्मिक स्थल में चले जाइये। वहाँ दूकान खोलने के लिए टेंडर निकलते हैं, प्रसाद सप्लाई के लिए टेंडर निकलते हैं। फूलों के टेंडर निकलते हैं। क्या है ये सब ?? और उन टेंडर्स को जीतने वाले वो लोग होते हैं, जिनको भगवान् या इंसान से कोई मतलब नहीं होता। एक आम इंसान इन बातों को नहीं जानता है, वो सिर्फ भक्ति भाव से ही इन जगहों पर जाता है, लेकिन इनके पीछे दबी-छुपी कितने तरह की धाँधली चलती है, यह कोई जान भी नहीं सकता। मैं तो कहती हूँ, इन सब बातों को समझना, भगवान् या पीर के भी बूते की बात नहीं है। ऐसे घनचक्कर वाले काम तो बस इंसान ही करते हैं !
हाँ नहीं तो !
