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Friday, July 13, 2012

मैं ! दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती ???



मैं !  
अनादि काल से
दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती
बन कर जन्मती रही हूँ , 
करोड़ों सर
झुकते रहे
मेरे चरणों में,
और दुगुने हाथ
उठते रहे 
मेरी गुहार को,
झोलियाँ भरती रही मैं,
कभी दुर्गा, 
कभी लक्ष्मी,
और कभी सरस्वती बन कर ,
मेरे भक्त, 
कभी साष्टांग तो 
कभी नत मस्तक 
होते रहे 
मेरे सामने 
और मैं भी,
बहुत सुरक्षित रही
तब तक, जब तक
अपने आसन पर
विराजमान रही
लेकिन,
जिस दिन मैंने  
आसन के नीचे 
पाँव धरा  
मैं दुर्गा;
जला दी गई,
मैं लक्ष्मी;
बेच दी गई,
और मैं सरस्वती;
ले जाई गई
किसी तहख़ाने में
जहाँ,
नीचे जाने की सीढ़ियाँ तो बहुत थीं
पर ऊपर आने की एक भी नही...