Showing posts with label मेरे बाबा. Show all posts
Showing posts with label मेरे बाबा. Show all posts

Friday, June 15, 2012

ऐसे हैं मेरे बाबा...!! (संस्मरण)


(मेरे बाबा अब नहीं रहे, लेकिन आज भी 'थे' कहने की हिम्मत नहीं जुटा पायी हूँ। वो आज भी मेरे लिए 'हैं'..बस्स !!)  

बात उन दिनों की है जब मेरी उम्र शायद १४-१५ साल की होगी, मेरे पिता जी को हमलोगों को घुमाने का बहुत शौक़ था, हर छुट्टी में कहीं न कहीं हमारा परिवार घूमने जाया करता था....उनदिनों भी गर्मियों की छुट्टियां थी...राँची के पास ही डाल्टेनगंज से १० किलोमीटर पहले बेतला में 'बेतला नेशनल पार्क' है, जहाँ वन्य प्राणियों की भरमार थी तब, जैसे, हाथी, बाघ, भालू, बईसान, कई प्रकार के हरिण, और भी तरह-तरह के जानवर.. पिताजी की बड़ी इच्छा थी कि हमलोग जू में जानवर देखने की जगह, प्राकृत रूप से रहते हुए जानवर देखें...

फिर क्या था गर्मी की छुट्टियां आईं और हम सभी तैयार होकर, सफ़ेद अम्बेसेडर गाड़ी में चल पड़े, जंगली जानवर देखने...हमलोग मुँह अँधेरे ही निकल गए थे वहाँ के लिए, और पहली बेला में ही पहुँच गए..

मेरे एक फूफाजी बेतला नेशनल पार्क के रेंजर थे...कोई दिक्कत नहीं हुई...उनको पहले ही पता था कि हमारा परिवार आ रहा है, मुझे याद है हमलोगों को गेस्ट हाउस में ठहराया गया, फूफा जी का भी क्वाटर वहीँ था, दिन का खाना तैयार था, खाना गेस्ट हाउस के खानसामा ने बनाया था, खाने में हिरण का मीट  दिया गया था, मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था, मैं तो खा ही नहीं पाई...पहला कारण,  गेस्ट हाउस के पीछे ही जाने कितने सुन्दर-सुन्दर हिरण घूम रहे थे, दौड़ो और छू लो उनको, उनकी सुन्दरता देखते बन रही थी...इतने सुन्दर प्राणी को खाना !..मेरे बालमन को नहीं भाया था...दूसरी बात उसका मीट ही अजीब था...लगता था जैसे रबड़ खा रहे हैं....

ख़ैर, खाना खा कर हम लगभग २ बजे खुली जीप में निकल गए वन्य प्राणी देखने ...लेकिन वो समय तो जानवारों के लिए भी खा-पीकर आराम करने का होता है...इसलिए वन्य प्राणी नज़र तो आए लेकिन कुछ कम नज़र आए...

हमलोग घूम कर वापिस आ गए ...फूफा जी ने बताया कि रात में जाना और अच्छा होगा, जानवार  रात में ज्यादा निकलते हैं, हमलोग रात में चलेंगे....वैसे ११ बजे के बाद जंगल में जाने की इजाज़त नहीं है लेकिन हमारे साथ तो जंगल के मालिक ही थे....सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का...

तो जी हम सभी लगभग ११ बजे तैयार होकर, पीछे से खुली जीप में चल पड़े...जीप के पिछले हिस्से में हम सभी खड़े थे, मैं मेरे तीनों भाई, माँ और एक अर्दली..क्योंकि वहाँ से देखने में आसानी होती...गर्मी के दिन, ऊपर खुला आसमान, और आगे घना जंगल...बड़ा ही रोमांचकारी था सबकुछ, बीच-बीच में किसी जानवर की बोली या फिर झींगुर की आवाज़... 

सामने की सीट पर, ड्राइवर, बीच में फूफा जी और किनारे खिड़की के पास पिता जी यानी मेरे बाबा बैठे थे...पीछे खुली जीप में,  सबसे किनारे मैं खड़ी थी...गाड़ी जगह-जगह रूकती अँधेरे में पशुओं की चमकती आँखें नज़र आती, गाड़ी का इंजिन बंद कर दिया जाता, कुछ दूर तक गाड़ी लुढ़कती, और सर्चलाईट की रौशनी से हमें जानवर दिखाया जाता, हमलोग साँस रोके देखते....बाघ, चीतल, साम्भर, बड़े बड़े सींघ वाला बाईसन और न जाने क्या-क्या....यही होता जा रहा था...जानवरों की आँखें चमकती, गाड़ी रूकती, ड्राइवर इंजिन बंद कर देता,  सर्चलाईट का निशाना पशुओं पर पड़ता और हम देखते....

थोड़ी देर बाद बहुत जोर से रटरटरट... रटरटरट.... रटरटरट की आवाज़ आने लगी, जैसे कोई कुछ तोड़ रहा हो...देखा तो बड़े-बड़े जंगली हाथियों का झुण्ड था....जो बांस के पेड़ों को तोड़ता हुआ ,आ रहा था, गाड़ी रुकी, इंजिन बंद हुआ, सर्चलाईट का प्रकाश उनपर पड़ा तो उनका भी ध्यान हमारी तरफ हुआ....वो कुछ दूरी पर थे...लेकिन ऐसे विशाल जानवर, वो भी झुण्ड में ...हमने पहली बार देखा था....गाड़ी रुकी हुई थी...जब हमने देख लिया और चलना चाहा तो, गाड़ी ने स्टार्ट होने से ही मना कर दिया, ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट करता, इंजिन घों घों करता और रुक जाता, जंगली हाथियों का झुण्ड अब भी हमारी तरफ बढ़ता चला आ रहा था... इंजिन फिर स्टार्ट किया गया..वो स्टार्ट नहीं हुआ...ड्राइवर पसीने से तर-बतर हो रहा था...फूफा जी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं थी...जाने क्या बात थी, सर्चलाईट या इंजिन की आवाज़ ..जंगली हाथी नाराज़ लग रहे थे...अब वो हमारी तरफ दौड़ने लगे थे, बाँस के झुरमुट अब ज्यादा आवाज़ से टूटने लगे थे....तड़-तड़ाक की तेज़ आवाजें आने लगीं थी, और  बड़े-बड़े काले साए गुस्से में चिंघाड़ने लगे थे, ड्राइवर जुम्मन अब भी गाड़ी स्टार्ट कर रहा था...वो पूरा हिला हुआ था, वो बार-बार कभी हाथियों को देखता कभी गाड़ी को कोसता...फूफाजी की हालत बहुत खराब हो रही थी....और हमलोग सभी अपनी जगह पर ख़ामोश खड़े थे...इतने में बाबा ने अपनी साइड का दरवाज़ा खोला...फूफा जी कहने लगे अरे आप क्या कर रहे हैं...मत जाइए...लेकिन वो उतर गए ..वो चलते हुए पीछे आए..पीछे आकर जीप पर ऊपर चढ़ गए, मुझे पीछे कर दिया और सामने खड़े हो गए...बिल्कुल ऐसे खड़े हो गए, जैसे कह रहे हों...मेरे बच्चों से पहले मुझसे होकर तुम्हें गुजरना होगा 'गणेश जी', वो बिल्कुल शांत थे...उनके चेहरे पर ज़रा भी उद्विग्नता नहीं थी...न ही वो परेशान थे, एक भी शब्द उन्होंने नहीं कहा था, बस हम सबको पीछे करके सामने, जीप की रेलिंग पकड़ कर खड़े हो गए...

हाथियों का झुण्ड अब भी दौड़ता चला आ रहा था....मौत बिल्कुल सामने थी बस कुछ ही मीटर की दूरी पर,  ड्राइवर और फूफा जी गाड़ी स्टार्ट करने में लगे हुए थे, हमारे और मौत के बीच का फासला बस १०-११ मीटर का रह गया था, कि अचानक गाड़ी स्टार्ट हो गई...हमें तो जैसे भगवान् ने अपने हाथों में ले लिया हो ऐसा लगा, ड्राइवर ने तो और कुछ देखा ही नहीं बस गाड़ी दौडानी शुरू कर दी...हमें तो ऐसा  लग रहा था जैसे, किसी मरने वाले से कहा गया हो, अगर बचना है तो जितनी दूर ,जितनी जल्दी भाग सकते हो भागो, और वो बस भागना शुरू कर देता है,  शायद  जुम्मन ने ज़िन्दगी में कभी भी इतनी तेज़ गाड़ी न चलाई होगी, जितनी तेज़ उसने उस दिन चलाई थी.....मगर हाथियों का झुण्ड अब भी हमारी जीप के पीछे भाग रहा था...और ड्राइवर की स्पीड बढ़ती ही जा रही थी..फूफा जी चीखते जाते, जुम्मन स्पीड बढाओ....वो मुड़-मुड़ कर हाथियों से जीप की दूरी का मुआयना करते जाते ...और मेरे बाबा चट्टान की तरह जीप की रेलिंग पकड़े ..शांत भाव से हाथियों की आँखों में आँखें डाले उनकी तरफ देखते रहे...हम सभी जीप की रफ़्तार से अपने शरीर का ताल बनाये रखने की कोशिश में जुटे रहे... अब हाथियों के झुण्ड और जीप के बीच की दूरी बढ़ती जा रही थी...हाथी अब भी पीछे थे...

कुछ दूर जाने के बाद उनके झुण्ड को वापिस मुड़ते देखा था मैंने ...जीप ने भी गेस्ट हाउस आकर ही दम लिया था...फूफा जी बार-बार भगवान् का शुक्र अदा कर रहे थे, हम सब एक दूसरे को बस देख रहे थे, माँ ने हम सब को समेट लिया था..उस दिन लगा कि मारने वाले से बचाने वाले के हाथ ज्यादा लम्बे  होते हैं...मैं बस अपने बाबा को देख रही थी, मेरे लिए तो मेरे भगवान् मेरे बाबा ही थे, हैं और रहेंगे...मैं अपने बाबा से लिपट गई थी...वो मंजर मैं कभी नहीं भूलती, आज भी जब वो साथ होते हैं..तो मुसीबतें, पास आने की हिम्मत नहीं करतीं हैं...क्योंकि हम सबके जीवन की इस ढाल से टकराने की हिम्मत किसी मुसीबत में नहीं है...ऐसे हैं मेरे बाबा...!! 

Sunday, March 25, 2012

इंसान ग़लतियों का पुलिंदा ...! (एक संस्मरण)


कहते हैं इंसान ग़लतियों का पुलिंदा होता है...उस हिसाब से, हम सभी पुलिंदे हैं...क्योंकि ग़लती हर इंसान से होती है...
जानते बूझते हुए, जो ग़लती बार-बार की जाए उसे 'आदत' कहते हैं...जिसके लिए आप खुद जिम्मेदार होते हैं..लेकिन अनजाने में की गई ग़लती को पहचान लेना, उसपर पछतावा करना...और उसे दोबारा नहीं दोहराने की कोशिश करना अच्छे इंसान की पहचान है और सबसे महत्वपूर्ण बात भी ...
ऐसी ही एक ग़लती मेरे बाबा ने की थी...उस गलती ने उन्हें हिला कर रख दिया था...मैंने अपने बाबा को पहली और आखरी बार..थर-थर काँपते हुए देखा था...

मेरी उम्र शायद ७-८ साल की रही होगी...हमारे घर में भी हर जमींदार घर की तरह कई बंदूकें थीं ...जिन्हें उन दिनों 'स्टेटस सिम्बल' भी माना जाता था...शिकार का शौक मेरे दादा जी को बहुत था, लेकिन मेरे बाबा को कम...मेरे दादा, चाचा, बाबा निकल जाया करते थे, तीतर-बटेर, खरगोश, हरिला मारने, हर वीक एंड पर...अगर कुछ ना मिलता, तो कम से कम अपने निशाने को ही पजा कर वो लोग वापिस घर आ जाया करते थे...घर आकर बंदूकों की डिसमेंटल किया जाता था, कारतूसों को चमड़े के बैग में करीने से रखा जाता था...जिंदा कारतूसों की कतार एक तरफ होती थी और जो कारतूस नहीं चलते उनको एक अलग बैग में, निशान लगा कर रख दिया जाता था...निशान होता था 'NW' यानी Not Working'

हफ्ते-पंद्रह दिनों में बंदूकों की सफाई भी, एक महत्वपूर्ण काम हुआ करता था...सारे अपनी-अपनी बन्दूक साफ़ करने बैठ जाया करते थे...लम्बी तार में मुलायम मलमल का टुकड़ा बाँध कर...बन्दूक की नली में डाल कर...अन्दर तक सफाई की जाती थी...फिर पोलिश करके...करीने से सारे पुर्जे अलग करके रख दिए जाते थे...हमारे घर में बन्दूक कभी भी..बिना डिसमेंटल किये नहीं रखी जाती थी...बल्कि ये एक हास्य का विषय भी हो जाया करता था...कि अगर कभी कोई चोर-डाकू आ जाए तो...इससे पहले कि बदूकों को जोड़ा जाए..वो सब लूट कर, जा भी चुके होंगे...

ऐसी ही एक गर्मी की दोपहर थी...इतवार का दिन था, इतवार बहुत ही ख़ास दिन हुआ करता था, बचपन में...उस दिन मीट जो बनता था...बचपन का हर इतवार, पर्व सा होता था...सब कुछ ख़ास सा लगता था...स्कूल से छुट्टी, माँ की छुट्टी, बाबा की छुट्टी, और स्पेशल खाना, सुबह से ही मसाला पिसाना, मीट लाना, पकाना, घर में माहौल ही बहुत अलग हो जाता था...दोपहर होते-होते सबने खाना खा लिया था...कामवाली लडकियां या तो आराम कर रही थी या फिर बर्तन साफ़ कर रहीं थीं...हर माँ की तरह, मेरी माँ भी बचे हुए समय का सदुपयोग करने में जुटी हुई थी...माँ को बड़ी-अचार बना कर रखने का शौक था...उस दिन बड़ी बनाने की बारी थी....माँ आँगन में बैठ कर, बड़ी सी चटाई पर बड़ियाँ बना रही थी...खजूर के पत्तों से बुनी चटाई पर जब बड़ियाँ सूख जातीं हैं..तो उन बड़ियों के तले पर, चटाई का डिजाईन बन जाता है...मुझे बड़ा मज़ा आता था...बड़ियों को समेटकर..उनके नीचे डिजाईन देखने में...

इधर माँ अपने काम में मशगूल थी, और बाबा अपनी बन्दूक की सफाई में ...मैं साथ में बैठी बाबा को, बड़े मनोयोग से अपनी प्यारी बन्दूक को साफ़ करते देख रही थी...हम बच्चों को, किसी भी पुर्जे को छूने की आज्ञा नहीं थी...हाँ, पास बैठ कर देखने की आज्ञा ज़रूर थी... डिसमेंटलड पुर्जे चमकते जा रहे थे...बन्दूक की नली के अन्दर से बारूदी रंग भी, अब मलमल पर आ चुका था...बाबा बार-बार नली से एक आँख लगा कर, अन्दर तक झाँक कर तसल्ली कर लेते थे, कि अन्दर कोई अवरोध न रह गया हो...मुझे याद है, वो कहते थे, किसी भी बन्दूक, का सबसे महत्वपूर्ण पूर्जा होता है, उसकी 'मक्खी', जो बन्दूक की नली के आखरी सिरे पर, लगा हुआ, धातु का बहुत छोटा सा टुकड़ा होता है...

सफाई करने के बाद, एक बार तसल्ली ज़रूर कर ली जाती थी..कि सारे पुर्जे फिट हो रहे हैं...बाबा ने भी वही किया...सारे पूर्जे फिट हो गए...और अब बन्दूक अपने, लकड़ी के बट्टे, नली, मक्खी के साथ सम्पूर्ण नज़र आ रही थी....और बाबा संतुष्ट...

जाने क्या सोच कर बाबा ने एक 'फुस्स' हुई हुई नकारा सी गोली.. जिसपर निशान लगा हुआ था कि ये काम नहीं करती...बन्दूक की नली को झुका कर डाल दी...'खट' की आवाज़ के साथ बन्दूक, अपनी जगह वापिस आ चुकी थी, अर्थात गन लोडेड हो चुकी थी...जबकि बाबा सौ प्रतिशत श्योर थे कि, gun लोडेड होते हुए भी...बिलकुल भी लोडेड नहीं है...

जैसा मैंने बताया, माँ आँगन में, बैठी चटाई पर बड़ियों की कतार सजा रही थी, मैं बीच-बीच में बड़ियाँ बनाने की जिद्द कर जाती...लेकिन माँ मुझे भगा कर कहती...कुंवारी लडकियां बड़ियाँ नहीं बनातीं...शादी के दिन बना लेना जितना बनाना है....तुम इनपर लाल मिर्चा खोस सकती हो...जिससे किसी की नज़र न लगे....मैंने कई बड़ियों पर 'गोटा' लाल मिर्चा खोस दिया...ये लाल मिर्च मात्र मिर्च नहीं होते..ये आश्वासन होतीं हैं, बनाने वालों के लिए और खाने वालों के लिए...कि कितनी भी बुरे नज़र किसी की क्यों न हो, इन मिर्चों की धाह से पार पाना असंभव है.. मिर्चा खोसते हुए, हींग की खुशबू नथुनों में समां गयी थी, और मैं फिर एक बार जिद्द पर आ गयी थी...'माँ हमको भी बनाना है बड़ी...' 'बहुत जिद्दी है ई लड़की'...माँ बड़बड़ाई  थी...

बाबा आख़िर अपनी प्यारी बेटी की ऐसी तौहीन कैसे देख सकते थे भला, आख़िर कह ही दिया माँ से... 'सुनती हो, मेरी बेटी को क्यूँ डांटती हो...कोई इसको नहीं डांट सकता, डांटओगी तो ठीक नहीं होगा..' कहते हुए, बाबा ने शरारत से मुस्कुराते हुए, बन्दूक की नली माँ की तरफ तान दिया, वो अब भी मुस्कुराते जा रहे थे...उनका हाथ ट्रिगर पर था, और चुहल करते हुआ कहा...ऐ, चला दें गोली...? माँ कौन सी कम थी..उसने भी कह दिया  ''हाँ..हाँ चला दीजिये, हम कौनो डरते हैं का....'  लेकिन पता नहीं क्या बात हुई थी, किस शक्ति ने उस दिन काम किया था, उस दोनों ने अटूट प्यार ने, माँ की प्रार्थना ने, या ईश्वर के आशीर्वाद ने या फिर हम बच्चों की किस्मत ने, या कि उन लाल मिर्चों ने, जो कुछ देर पहले मैं बड़ियों को बुरी नज़र से बचाने के लिए खोस आई थी...बाबा ने हँसते-हँसते बन्दूक की नली...आँगन के खुले आसमान की तरफ कर दिया और ट्रिगर दबा दिया...'धाएँ' की आवाज़ से घर, आसमान गूँज गया...माँ आवाज़ सुन कर एकदम से चौंक गयी...मुड़ कर बाबा को देखा था उन्होंने...और आखों से ही कहा था 'जाईये-जाईये, बहुत देखे हैं निशाना लगाने वाले, हाँ नहीं तो...!' इस अप्रत्याशित अनहोनी से, मेरे बाबा का चेहरा सफ़ेद हो गया...एकबारगी वो पसीने से नहा गए थे, उनके हाथ-पाँव कांपने लगे थे, असमंजस के हज़ारों बादल उनके चेहरे पर छा गए थे... लेकिन माँ एक ज़रा विचलित नहीं थी...उसके चेहरे पर संतोष और विश्वास की आभा कायम थी...बाबा ने बन्दूक रख दी, धप्प से बैठ गए थे वो, कुछ पथराये से लग रहे थे और अपनी सांस पर काबू पाने की कोशिश में जुटे हुए थे...उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है...ये वो कह भी नहीं पा रहे थे...मैंने देखा था, उनके हाथ पत्तों की तरह काँप रहे थे, बन्दूक उनसे सम्हल नहीं रही थी,  फिर भी उन्होंने कांपती हाथों से झट से बन्दूक की नली खोली थी....कारतूस के लाल खोके को बाहर निकाल कर देखा था...उसपर अब भी काला निशान लगा हुआ था...NW  (Not Working)...वो बार-बार उस लाल सी चीज़ को देखते, चेहरे पर विश्वास-अविश्वास के अनगिनत भाव लगातार आ जा रहे थे...

अब उनकी सांस काबू में आ चुकी थी...वो बस लगातार माँ को देखे जा रहे थे...उनकी आँखों में क्या जाने क्या-क्या रंग थे...प्यार, विश्वास, दुःख, पछतावा, ग्लानी, क्षोभ, कौन जाने क्या-क्या...सारे रंग गडमड हो रहे थे...लेकिन, कुछ देर बाद, एक रंग आकर उनके चेहरे पर थम गया था..'प्रतिज्ञा' का रंग...अब उन्होंने बन्दूक को टुकड़ों में तब्दील करना शुरू कर दिया था, वो हर टुकड़े को दृढ़ता से अलग करते और, एक सौगंध के साथ उसकी पेटी में रखते, उस दिन वो बन्दूक आखरी बार, साफ़ हुई थी, और आखरी ही बार वो डिसमेटल भी हुई थी, फिर कभी वो बन्दूक जुड़ नहीं पायी...माँ अब भी मजे में , कोंहड़ा बड़ी, तिलौरी और सादा बड़ी बना रही थी...मेरी जिद्द अब भी कायम थी.. 'सुनते हैंSSSS..देखिये फिर जिद्द कर रही है मुन्ना...ले जाईये इसको यहाँ से...काम ही नहीं करने देती है, फिर हमको कब फुर्सत मिलेगा भला...कल से फिर ऑफिस जाना है..' पता नहीं बाबा सुन भी रहे थे या नहीं...!
हाँ नहीं तो...!!