काव्य मंजूषा
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बस गंगा जल हो.....
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Monday, January 4, 2010
बस गंगा जल हो....
तेरा आना
पागल दिल हो
झलक दीखाना
ख़ुशी का पल हो
छुप छुप रहना
दर्द-ए-दिल हो
हाथ ना आना
बीता कल हो
नैन मिलाना
एक ग़ज़ल हो
नज़र में मेरी
ताजमहल हो
उम्र का हासिल
नूर महल हो
पाक़ हो जैसे
तुलसी दल हो
अंत समय में
बस गंगा जल हो
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