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Sunday, December 27, 2009

फांसी या उम्र क़ैद that is the question ???

आज यहाँ कनाडा/अमेरिका में बोक्सिंग डे है...कहने पर ऐसे लगता है जैसे कहीं अखाड़े में मल्ल युद्ध या कुश्ती होने वाली हो....लेकिन ऐसा कुछ नहीं है....दरअसल क्रिसमस इन देशों का एकमात्र सबसे बड़ा त्यौहार है....जाहिर सी बात है सबसे ज्यादा खरीदारी भी इसी उपलक्ष में लोग करते हैं...इसलिए सारी दुकानें नए सामानों से खचा-खच भरी होती है....लोग आखरी समय तक खरीदारी करते हैं यानी २४ दिसम्बर तक...२५ दिसम्बर को सभी कुछ बंद होता है....और २६ दिसम्बर से सारे दूकानदार सीजनल सामानों को समेटना शुरू कर देते हैं...लेकिन उसके पहले वो चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा इन्वेंटरी से छुट्टी पा लें...इसलिए सेल पर सामानों को निकालने की होड़ शुरू हो जाती है....तो बोक्सिंग डे का अर्थ हुआ...समानों को बोक्स में डालने से पहले की सेल......इस समय कुछ अच्छी डील मिल जाती इसलिए हम भी निकल लिए शौपिंग स्प्री में....वैसे भी मृगांक को अपने लिए कुछ न कुछ खरीदना था ५ जनवरी को वापिस जो जा रहा है हॉस्टल.....


खैर....हम सभी गाड़ी में लदे हुए चले जा रहे थे...रात हम सबने 'कुर्बान' फिल्म देखी थी और उसी की विवेचना भी करते जा रहे थे....'कुर्बान' फिल्म अपने आप में technicaly बहुत ही अच्छी फिल्म लगी हम सबको.....हमलोग फिल्म के शाट्स और कैमरा मूवमेंट्स, सेट्स इत्यादि से बहुत प्रभावित हुए थे....कुछ शूटिंग्स पब्लिक जगहों पर भी हुई थी और बहुत अच्छी हुई....कुल मिला कर पूरी फिल्म काबिल-ए-तारीफ है...

क्योंकि यह फिल्म आतंकवाद और आतंकवादियों पर बनी है ..बातों का रुख मुंबई हादसे की तरफ मुड़ गया और आतंकवादी 'कसाब' पर आकर बात ठहर गयी.....कसाब का ज़िक्र होते ही....मेरा मन आंदोलित होगया गुस्से के अतिरेक में मैंने कहा कि 'कसाब' को तुरंत फांसी दे दी जानी चाहिए.... परन्तु मेरे बच्चों की सोच बिलकुल ही अलग है.....दोनों लड़के.....मयंक और मृगांक फाँसी जैसी सजा के बिलकुल विरुद्ध हैं....
मृगांक का कहना है....अगर कसाब ने लोगों की हत्या की और आप उस गुनाह की सजा उसे, उसकी हत्या करके दे रहे हैं तो आप भी वही गलती कर रहे हैं, फिर आपका गुनाह कैसे कम हो जाता है....हत्या के बदले हत्या ?? किसी भी दृष्टि से यह न्याय नहीं हो सकता है....

न्यायपालिका का काम है अनुशासन बनाए रखना ना कि दहशत फैलाना....अगर कानून को अपना काम सही तरीके से करने दिया जाए और कानून का सही मायने में पालन हो तो....तो समाज को अनुशासित होने में बिलकुल भी समय नहीं लगेगा ..हां लेकिन शर्त यह है की कानून का पालन सभी करें....मसलन.....सड़क पर अगर सभी गाड़ियां ट्राफिक के नियम का पालन करतीं हुई चलें तो क्या आपको लगता है कि लाल बत्ती की भी ज़रुरत है ??? उसका सवाल सही था......और मेरा जवाब.....नहीं अगर सचमुच सभी ट्राफिक के नियमों का पालन करेंगे तो भला लाल बत्ती कि क्या जरूरत !!!! बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है...जैसे यहाँ कनाडा में...कभी-कभी कहीं ट्राफिक लाईट ख़राब हो जाती है तो ट्राफिक खुद-ब-खुद automatic अनुशासित हो जाती है और सभी गाड़ियां नियम का पालन करती हुई चलने लगतीं हैं...

बात भटक कर ट्राफिक पर चक्कर काट रही थी...मैंने बात का रुख फिर से कसाब की ओर और 'फांसी' की सजा की ओर किया ...मयंक का कहना था अगर कसाब को फांसी दे दी गयी तो बात एक ही झटके में ख़तम ही हो जायेगी....और ऐसा नहीं होना चाहिए.....दरअसल अगर हम उसे फांसी देते हैं तो हम उसपर अहसान कर रहे हैं, हम उसकी मदद कर रहे हैं....उसे कभी भी महसूस नहीं हो पायेगा कि उसने क्या गलती की है.....वो कभी भी इंसानी जीवन का मूल्य समझ नहीं पायेगा.....इसलिए फांसी की सजा उसके इतने बड़े गुनाह के लिए बहुत कम है....

कसाब ने जघन्य कृत्य किया है...और वो कठोर से कठोर सजा का हक़दार है.....ऐसी सजा जो अमानवीय ना हो लेकिन कठोरतम हो.... मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी कौन सी सजा होगी जो इतनी कठोर होगी ...और कसाब के घोर पाप के लायक होगी.....आखिर मैंने पूछ ही लिया तो तुम्हें क्या लगता है कैसी सजा होने चाहिए.....मृगांक का कहना था 'उम्र' क़ैद'.....मैंने मुस्कुरा कर उसे देखा और कहा ये तो कुछ भी नहीं है.....उम्र क़ैद कि सज़ा १४ साल होती है.....जेल में हर सुविधा के साथ १४ साल आराम से रहेगा...और फिर १४ साल बाद बाहर आ जाएगा ...और अपने देश लौट जाइएगा ...या तो बात ख़त्म हो जायेगी या फिर उसे इंडिया का terrorism specialist बना कर फिर किसी हमले में लगा दिया जाएगा......ये कोई सज़ा नहीं हुई ...

मृगांक ने कहा नहीं ये उम्र क़ैद वैसी नहीं होने चाहिए...उसे पूरे solitary में रखा जाए पूरे १४ साल...नितांत अकेला....इतना अकेला कि अकेलेपन को भी घबडाहट हो.....इन १४ सालों में उसे किसी एक इंसान से मिलने की आज्ञा नहीं मिलनी चाहिये.....बस वो और ८ x ८ का कमरा ....यहाँ तक कि उसे जेल के कार्यकर्ताओं के भी बस दूर से ही झलक दिखे......तब उसे इंसान और इंसानी रिश्तों का मूल्य समझ में आएगा......इंसान की क्या कीमत है इसको समझाने के लिए इससे अच्छी सजा कोई नहीं हो सकती और मम्मी एक गुमराह नौजवान के लिए ये सजा फांसी से बहुत बड़ी होगी.....और यही सज़ा उसे मिलनी चाहिए......उसके बाद जब वो बाहर आएगा......तो एक मक्खी भी मारने के लायक नहीं रहेगा....मैं सच कहता हूँ....!!!
आप क्या सोचते हैं....मृगांक क्या सही कहता है ????